तर्जः आदीश्वर स्वामी वन्दूँ मैं बारम्बार …
बाहुबली स्वामी ! वन्दूँ मैं बारम्बार ।
धन्य भाग्य प्रभु दर्शन पायो, सहज नमन अविकार ।। टेक ।।
मुक्तिपद के अनुपम साधक, प्रशममूर्ति सुखकार।
निर्विकार प्रभु सहज दिगम्बर, महिमा अपरम्पार।। 1।।
प्रथम मदन पद पायो स्वामिन्, जान्यो जगत् असार ।
छोड़ परिग्रह हो वनवासी, जिन दीक्षा अवधार।। 2।।
वामी बनाकर सर्प बसे थे, बेलों का विस्तार।
हुआ देह पर तो भी प्रभुवर, रहे अडिग अविकार ।। 3।।
शीस धरें चक्री चरणों में, ध्यान मग्न सुखकार।
ऐसे हुए मुनीश्वर प्रगट्यो, अनन्त- चतुष्टय सार।। 4।।
आदीश्वर से प्रथम सिद्ध हो, तिष्ठे मुक्ति मँझार।
प्रगट कर रहे शुद्धातम की, महिमा अपरम्पार ।। 5।।
आप मिले अपनो पद पायो, आनन्द भयो अपार ।
यही भावना जीवन बीते, जिनवर चरण मँझार ।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १३६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’