बाहर से मीचो आँख रे ।। टेक ।।
कोई आवे, कोई जावे, उदय रंग नाना दिखलावे।
पर्यायें बदलें क्षण-क्षण में, तू उनमें नहिं राच रे।। 1।।
बहिर्दृष्टि ही है संसारा, प्रतिपल दुःख का जहाँ पसारा।
तब ही पावे भव से पारा, जब निज अंतर झाँक रे।। 2।।
कर्मादिक तो बहुत दूर हैं, पर्यायों का चले पूर है।
दृष्टि हटा ले उनसे भी, नहिं तुझको किंचित् आँच रे।। 3 ।।
तेरा वैभव बाहर नाँहि, ज्ञान सुख निज अंतर माँहि ।
निज में तृप्ति अविचल पाओ, करो प्रतीति साँच रे।। 4।।
जब ही आतम अनुभव आवे, प्रभुतामय निज में रम जावे ।
होय विकास पूर्ण परिणति में, बने लोक का नाथ रे।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३९३ से ३९४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’