बड़ी भली जिनवाणी माँ, तत्त्वामृत पान कराती है | ba di bhali jinavani ma n tattvamrrita pana karati hai

बड़ी भली जिनवाणी माँ, तत्त्वामृत पान कराती है।

सदा सुलाती दुनियाँ की माँ, ये माँ हमें जगाती है।। टेक ।।

काया रूप अटारी में, कर्मों की सेज बनी सुन्दर।
ओढ़ कल्पना की चादर, मोही चेतन सोवे अन्दर ।। 1।।

बजे मौत का डंका प्रतिक्षण, विषय चाह की आग जले।
कर्मों की भयानक मार पड़े, तो भी यह नींद से नहीं ढले ।। 2 ।।

जिनवाणी ही निज पूतों की, ऐसी नींद भगाती है।
कर्मों की भयानक मारों से, छुटकारा हमें दिलाती है।। 3।।

भोगों से रोग अनेक होंय, ज्यों भोगे त्यों तृष्णा बढ़ती।
तन-मन-धन अरु लाज त्याग, परिणति उनमें ही जा रमती ।। 4 ।।

इन भोगों की कीचड़ में फँस, जो तड़फ-तड़फ दुःख पाते हैं।
नहीं निकल पाते उनमें अटके, निज धर्म गँवाते हैं ।। 5।।

उन विषयों का नग्न रूप, जिनवाणी हमें दिखाती है।
जिसको सुनने-पढ़ने से तो, स्वयमेव विरक्ति आती है।। 6।।

जग के झूठे सम्बन्धों को सच्चा माने उनमें धावे ।
अन्याय-अनीति पापादिक से, कर्म बन्ध भारी बाँधे ।। 7।।

पर जो सम्पत्ति करे इकट्ठी, उसको सब ही भोगेंगे।
अरु फल पापों का पाने को, सब तुझे अकेला छोड़ेंगे।। 8 ।।

इन हेतु नहीं अब पाप करो, जिनवाणी ही चेताती है।
अपने आकुलता-रहित अतीन्द्रिय सुख की याद दिलाती है ।। १ ।।

जड़ तन को ही निजरूप मान, उसमें ही मग्न रहा निशदिन ।
निज को भूला काया पोषण में, पाप कमाया है प्रतिक्षण ।। १० ।।

पर ये कृतघ्न काया तो, घन के इन्द्रधनुष सम अस्थिर है।
अरु महा अशुचि व्याधि, आधि रूपी, व्यालों का यह घर है ।। ११ ।।

इस काया से भी मुक्तिमार्ग, साधन करना सिखलाती है।
रत्नत्रय सुख का मार्ग बता, दुखों का अन्त सुझाती है।। १२ ।।

ऐसी उपकारी जिनवाणी माँ के, चरणों में नमन करूँ।
नित पठन-श्रवण-चिन्तवन करूँ, अरु निज स्वरूप का ध्यान धरूँ।।१३।।

जिनवाणी द्वारा दरशाये, सच्चे शिवपथ का पथिक बनूँ।
आश्रय लेकर निज आतम का, रागादि भाव का नाश करूँ ।। १४ ।।

जिनवाणी की सेवा करने से ही, सम्यक् बुधि आती है।
निज की पहिचान सु होती है, भव की फाँसी कट जाती है ।। १५ ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १४६ से १४७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’

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