Ardhamagadhi Bhasha


#1

In the Tirthankar’s 14 dev krat atishays, 1st is Ardhamagadhi bhasha, which states that devs translate the divya dwani into understandable individual languages. But is it not a quality of the divya dwani itself to be understandable by all in their own languages. Or is this not the case, and instead the devs need to convert the speech?


#2

दिव्यध्वनि को माधव देवों के द्वारा translate नहीं किया जाता है , और ना ही सभी जीव स्वयं अपनी अपनी भाषा में समझ जाते हैं, अपितु गणधर के माध्यम से सर्व जीवों को दिव्यध्वनि का लाभ होता है, क्योंकि दिव्यध्वनि बीजाक्षरों रूप में खिरती है और उन बीजाक्षरों को समझ ने की समर्थ मात्र गणधर में होती है।


#3

इसमें थोड़ा सा शास्त्रों का reference दिया गया है :
Time: 1:00hr


#4

दिव्यध्वनि ओमकार मयी होती है , ऐसी परम्परा चल रही है , परंतु वास्तव में दिव्यध्वनि बीजाक्षर रूप होती है।तथा ओमकार मयी का कोई आगम प्रमाण नहीं है, मात्र उन्होंने कहा ही है।

दिव्यध्वनि सभी जीव सीधे समझ लेते है , यह भी सही नहीं है।मात्र कहते हैं , परंतु वास्तव में गणधर के माध्यम से ही समझते हैं।


#5

फिर भगवान के देवकृत अतिशय अर्धमागधी भाषा का क्या होगा ? उसका क्या अर्थ लिया जाए?


#6

कहा है यह वीडियो में वो reference?


#7

आपका कोई शास्त्र का आधार है यह जवाब में?


#8


#9

How is it practically possible for गणधर to circulate the information to the respective person or animal in their own language?

Can anyone also describe the term - “बीजाक्षरों” in brief?

तथा ऐसा भी कहा जाता हैं की समवशरण में विद्यमान जीवों के मन में उठे प्रश्न का समाधान दिव्यध्वनि सुनते ही automatic हो जाता हैं।


#10

This is similar to the fact that तीर्थंकर को देख कर ही बहुत सारी शंकाओं का समाधान मिल जाता था |
Reference: Tattvgyan pathmala part-2


#11

जैनेन्द्र सिद्धांत कोश, भाग 1, पृ. 33


#12

गणधर के पास संभिन्नसंश्रोतृत्व ऋद्धि के कारण सभी जीवों के शंकाओं को एक साथ सुनकर सभी को एक साथ अलग अलग भाषा में उत्तर दे देते हैं।

सामान्य जीव गणधर देव से ही शंका - समाधान करते हैं । वे सीधे तीर्थंकर देव से अपनी शंकाएँ करें ; इतनी उनमें सामर्थ्य ही नहीं होती है। इस संदर्भ में आदिपुराण के प्रथम सर्ग में ऐसा ही प्रसंग आया है कि भरत चक्रवर्ती तीर्थंकर ऋषभ देव के समवशरण में गए, वहाँ उन्हें प्रश्न पूछने की जिज्ञासा हुई "मेरे हृदय में कुछ पूछने की इच्छा उठ रही है और इस इच्छा का कारण आपके वचन रूपी अमृत के निरन्तर पान करते रहने की लालसा ही समझनी चाहिए। हे देव ! यद्यपि लोग कह सकते हैं कि गणधर को छोड़कर साक्षात् आपसे पूछने वाला यह कौन है ? तथापि मैं इस बात को कुछ नहीं समझता ; आपकी सातिशय भक्ति ही मुझे आपसे प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित कर रही है।

इस प्रसंग का पढ़ने से यही फलित होता है कि सामान्य जीव, अपनी शंकाओं को गणधर देव से ही पूछते हैं और गणधर देव , अपनी ऋद्धियों से भव्य जीवों की शंकाओं को सुनकर उनका समाधान करते हैं।
तथा प्रत्येक पुराण का प्रारम्भ भी इसी वाक्य से ही होता है कि " राजा श्रेणिक गौतम गणधर से पूछते हैं "।इससे भी यही फलित होता है कि सामान्य जीवों की शंका समाधान गणधर देव ही करते


#14

बीज अर्थात मूल , अंकुर , पत्र, पोर ,स्कन्ध ,प्रसव , तुष् , कुसुम इत्यादि बारह अंगों के तुल्य अर्थ का आधार भूत जो पद है वह बीज तुल्य होने से बीज है ।
जिसप्रकार वृक्ष का मूल एक बीज होता है , उसी बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है ; उसीप्रकार दिव्यध्वनि बीजाक्षर रूप होती है, उन बीजाक्षर में से विस्तार करके बारह अंगों रूप वृक्ष को उत्पन्न करते हैं।
ऐसी शक्ति के धारक मात्र गणधर देव ही होते हैं ।


#15

34 अतिशयों के विभाजन में भी विभिन्नता मिलती है। जैसे - कहीं पर केवलज्ञान के 10 , देवकृत 14 और (तिलोय पण्णत्ति, 4 महाधिकार, गाथा 901) कहीं पर केवलज्ञान के 11 , देवकृत 13 अतिशय कहे हैं। देवकृत का जो पहला अतिशय है, उसे ही केवलज्ञान का 11वा अतिशय कहा है; परन्तु 11वे अतिशय में सर्वार्धमाघदि भाषा को नहीं लेकर, 18 महाभाषा और 700 लघु भाषाओं को लिया गया है।


#16

I have very little knowledge of Jainism. I may be wrong but according to me, Ardhamagadhi atishay is that everybody will be able to understand the updesh after in his/her own language. Even the animals will be able to understand it. Also, everbody in the Shamavsaran is able to listen properly i.e. The being sitting very far will also be able to hear everything properly without any disturbance. He will hear with the same volume as the person sitting in front is hearing.

You can check this. Scroll to 19 mins.

Actually he was telling about all the Moolguns of all the 5 parmeshtis. So he just told Ardhamagadhi Bhasha atishay in short. When I was hearing him somewhere else live, he told that divyadhwani is omkaar roop. Only Gandhars have that much knowledge to understand the divyadhwani. The Gandhars then translates the divya, so that others can also understand.

Maybe after understanding divyadhwani from gandhar, devtas translate them furthur for all the beings present in the Shamavsaran. They may be having powers that they can make even animals understand that.