अक्षय-निधि | Akshay-Nidhi

प्रभु वीतराग अनुपम मुद्रा, अक्षय निधि मुझे बताती है।

हूँ ज्ञानघनं प्रभु रूप स्वयं, सम्यक् श्रद्धा उमगाती है।। टेक।।

वर्णादिक पुद्गल भावों से, मेरा न कभी भी नाता है।
निर्बन्ध स्वरूप भूला मोही, झूठे सम्बन्ध बताता है।।
प्रभु मुक्त दशा लख निज निर्बन्ध स्वरूप की याद सुआती है।। 1।।

एकत्व और कर्तृत्व व्यर्थ ही, झूठा पर में मान लिया।
अनुकूल लगे तब मान किया, प्रतिकूल मानकर क्रोध किया।।
विभु! साम्यदशा यह, मोह क्षोभ की परिणति दूर भगाती है।। 2।।

मैं खुद ही शाश्वत प्रभुतामय, पर का किंचित् विक्षेप नहीं।
परिणति में भूला दुःखी हुआ, पर का तो हस्तक्षेप नहीं।।
स्वाधीन दशा हे प्रभो! आपकी, स्वाश्रित सुख दर्शाती है।। 3।।

संकल्प पूर्ण का प्रकट हुआ, साधन सब दीखे अन्दर में।
आरूढ़ होय निज परम भाव पर, पहुँचूँगा शिव मंदिर में ।।
हे नाथ! आपकी अचल दशा, पावन पुरुषार्थ जगाती है।। 4।।

निज में स्थापन होने से, कर्मादि स्वयं ही भगते हैं।
आह्वानन् शुद्ध परिणति का, रागादि विसर्जित होते हैं।।
आराधन का उत्तम फल लखकर, निज की महिमा आती है ।। 5 ।।

जग कोलाहल से रहित शान्तिमय, जिनमुद्रा प्रकटे प्रभुवर।
परम भाव में थिरतामय, रत्नत्रय पूर्ण बने जिनवर।।
हे मार्ग प्रदर्शक ! परम हितैषी, सहज भक्ति उमड़ाती है।। 6।।

दोहा

अब तक अपनी भूल से, बना रहा अज्ञान।
आज समझ पाया प्रभो, चिन्मय तत्त्व महान।। 7।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह