अक्षय-निधि भजन (अक्षय-निधि | Akshay-Nidhi) में आए कठिन आध्यात्मिक शब्दों — चिदानन्द, भेदज्ञान, समता, कूटस्थ, विभाव, निराबाध, अकिंचित्कर आदि — के सरल हिंदी अर्थ। दादाजी के हस्तलिखित 5 पृष्ठ के नोट्स से क्रमवार 124 शब्दार्थ; भजन का स्वाध्याय व पाठशाला में अर्थ-चर्चा हेतु। मूल हस्तलिखित PDF संलग्न।
Akshay-Nidhi Shabdarth — a 124-term glossary of the spiritual vocabulary used in the Akshay-Nidhi bhajan (chidanand, bhedgyan, samta, kootasth, vibhav, nirabadh, akinchitkar …) with simple Hindi meanings, transcribed from Dadaji’s five handwritten pages. For swadhyay and pathshala discussion; original handwritten PDF attached.
अक्षय-निधि - शब्दार्थ
- चिदानन्द - आत्मीय आनन्द
- भेदज्ञान - निज और पर का ज्ञान
- महारस - अनुभवका स्वाद
- परमार्थ - परमअर्थ अर्थात् मोक्ष
- धर्म - वस्तुका स्वभाव
- अमूर्ति - निराकार
- अलख - इंद्रियगोचर नहीं
- समता - राग-द्वेष रहित वीतरागभाव
- रमता - लीन रहना
- सत्ता - अस्तित्व
- विश्रामी - शांति का रस भोक्ता
- शिवगामी - मोक्ष को जाने वाला
- पद पूरण - मोक्ष
- अभेद - भेद व्यवहार से रहित
- कूटस्थ - सर्व काल एकरूप रहने वाली
- विभाव - पर वस्तु के संयोग से जो विकार हो
- साध्य - जो इष्ट अबाधित और असिद्ध हो
- ध्रुव धर्म - अविनाशी स्वभाव
- निरंजन - कर्म रहित
- जगत् - जन्म-मरण रूप संसार
- महारुचि - दृढ श्रद्धान
- जिन - जिन्होंने काम-क्रोधादि शत्रुओं को जीता
- विशद - निर्मल
- प्रतीति - श्रद्धान
- जगवासी - संसारी
- विकार - विभाव परिणति
- उपदेश - सीख
- अविनाशी - नित्य
- दशा - अवस्था
- चिद्रूप - चैतन्य रूप
- चिन्मय - ज्ञान - दर्शन सहित
- निराबाध - साता असाता की बाधा रहित
- चेतन - ज्ञान-दर्शन
- अखण्ड - पूर्ण
- अविवेक - अज्ञान
- सुविवेक - सम्यग्यान
- झायक - जानने वाषा
- कर्ता - जो कार्य करे
- दत्यकर्म - ज्ञानावरणादि अष्ट कर्म
- उदासीन - रागादि रहित
- नियत - निश्चय
- काय - शरीर
- अविकल्पी - विकल्प रहित
- परोक्ष - इंडिय और मन आश्रित ज्ञान
- प्रबोध - केवलज्ञान
- शील - ब्रह्मचर्य
- तप - इच्छाओं को रोकना
- विरति - हिंसादिक पाँच पापों का त्याग
- संयम - छहकाय के जीवों की रक्षा
- उपयोग - ज्ञान दर्शन
- साधक - सिद्ध करने वाला
- पराधीन - दूसरों के आश्रित
- अनूप - उपमारहित
- सुमति - अच्छी बुद्धि
- आश्रव - बंध का कारण
- संवर - आसव का निरोध
- शास्वत - स्वयंसिद्ध
- सुधिर - अचल
- अचेत - स्वरूप का भूलना
- निर्वाण - मोटल
- समाधि - ध्यान
- अकृत - स्वयं सिद्ध
- अज - जन्म रहित
- विश्वनाथ - संसार का स्वामी
- कीर्तन - गुणों का व्याख्यान करना
- वंदना - गुणों की स्तुति करना
- ध्यान - गुणों का स्मरण करना
- एकला - एक आत्मा को ही अपना मानना
- अखंडित - छिद - भिद नहीं सकता
- ममता - पर द्रव्यों में अहं बुद्धि
- अध्यात्म - आत्मा का स्वरूप बतलानेवाडी विद्या
- जाप - वार - वार नाम का उच्चारण
- जगपंथ - संसार भ्रमण का उपाय
- विकल्प - राग देष की तरंगें
- जिनागम - जिनराज का उपदेश
- लब्धघाती - अपने जीव का अहित करने वाला
- जिनपंथी - जैन मत के उपासक
- झेय - जानने योग्य घट-पटादि पदार्थ
- पाप - हिंसादि पाँच पाप
- सुबोध - सम्यग्ज्ञान
- पुण्य - दया-दान, पूजादि
- कुपंथ - मिथ्यामार्ग
- असत - सत्ता रहित
- सहज - स्वाभाविक
- बालबुद्धि - अज्ञानी
- प्रमेय - प्रमाण में आने योग्य
- विनायक - शिरोमणि
- सिद्ध - अष्टगुन सहित, अष्ट कर्म रहित भगवान्
- मूढ़ता - मूर्खता
- अशोक - शोक रहित
- पद्मा - सच्चाझान-भेदविज्ञान
- ज्ञाता - जानने बाठा
- दृशि - आत्मा की अनन्तशक्तियों में से एक
- मुक्ति - एक समय की निर्मल पर्याय, सिद्धदशा
- अनुभूति - अनुभव
- सुधा - अमृतपान
- परमेष्ठी - जो परमपद में स्थित है
- अरतन्त - जो चार घातियां कर्मों का अभाव करते हैं
- सिद्ध आचार्य - जो मुनिसंघ के नायक होते हैं
- उपाध्याय - जो संघ में पठन-पाठन कराते हैं
- साधु - जो रलत्रय की आराधना करते हैं।
- तीर्थंकर - जो धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करते हैं
- मंगल - जो पापों को गलाए एवं सच्चा सुख उत्पन्न करे
- उत्तम - जो लोक में महान् हो
- शरण - शरण सहारे को कहते हैं
- भगवान् - जो वीतरागी और सर्वज्ञ होते हैं
- सम्यग्दर्शन - सात तत्वों का श्रद्धान करना
- सम्यग्ज्ञान - वस्तु का जैसा स्वरुप है वैसा जानना
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- सम्यग्चारित्र - रागादि का परिहार करना अथवा आत्मलीनता
- विश्व - छह द्रव्यों का समूह
- द्रव्य - गुणों का समूह
- गुण - द्रव्य की विशेषताओं को गुण कहते हैं
- पर्याय - द्रव्य या गुणों के परिणमन को पर्याय कहते हैं
- तत्व - जो वस्तु जैसी है, उसका भाव
- भव्य - जिनमें मोक्ष जाने की पात्रता हो
- अभव्य - जिनमें मोक्ष जाने की पात्रता न हो
- मिथ्यात्व - उल्टी मान्यता ‘118’ क्षमा - क्रोध का अभाव
- अनुजीवी गुण - भावस्वरूपी गुण
- प्रतिजीवी गुण - वस्तु का अभाव स्वरूपी गुण
- : निमित्त - कार्य की उत्पत्ति में जिस पर अनुकूल होने का आरोप आए
- अकिंचित्कर - व्यर्थ
- अक्रम - युगपत्
- अनुदिश - मार्ग पर एक ओर चलने वाला
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