अक्षय-निधि शब्दार्थ | Akshay-Nidhi Shabdarth — दादाजी के हस्तलिखित नोट्स से 124 शब्दों के अर्थ

अक्षय-निधि भजन (अक्षय-निधि | Akshay-Nidhi) में आए कठिन आध्यात्मिक शब्दों — चिदानन्द, भेदज्ञान, समता, कूटस्थ, विभाव, निराबाध, अकिंचित्कर आदि — के सरल हिंदी अर्थ। दादाजी के हस्तलिखित 5 पृष्ठ के नोट्स से क्रमवार 124 शब्दार्थ; भजन का स्वाध्याय व पाठशाला में अर्थ-चर्चा हेतु। मूल हस्तलिखित PDF संलग्न।

Akshay-Nidhi Shabdarth — a 124-term glossary of the spiritual vocabulary used in the Akshay-Nidhi bhajan (chidanand, bhedgyan, samta, kootasth, vibhav, nirabadh, akinchitkar …) with simple Hindi meanings, transcribed from Dadaji’s five handwritten pages. For swadhyay and pathshala discussion; original handwritten PDF attached.


अक्षय-निधि - शब्दार्थ

  1. चिदानन्द - आत्मीय आनन्द
  2. भेदज्ञान - निज और पर का ज्ञान
  3. महारस - अनुभवका स्वाद
  4. परमार्थ - परमअर्थ अर्थात् मोक्ष
  5. धर्म - वस्तुका स्वभाव
  6. अमूर्ति - निराकार
  7. अलख - इंद्रियगोचर नहीं
  8. समता - राग-द्वेष रहित वीतरागभाव
  9. रमता - लीन रहना
  10. सत्ता - अस्तित्व
  11. विश्रामी - शांति का रस भोक्ता
  12. शिवगामी - मोक्ष को जाने वाला
  13. पद पूरण - मोक्ष
  14. अभेद - भेद व्यवहार से रहित
  15. कूटस्थ - सर्व काल एकरूप रहने वाली
  16. विभाव - पर वस्तु के संयोग से जो विकार हो
  17. साध्य - जो इष्ट अबाधित और असिद्ध हो
  18. ध्रुव धर्म - अविनाशी स्वभाव
  19. निरंजन - कर्म रहित
  20. जगत् - जन्म-मरण रूप संसार
  21. महारुचि - दृढ श्रद्धान
  22. जिन - जिन्होंने काम-क्रोधादि शत्रुओं को जीता
  23. विशद - निर्मल
  24. प्रतीति - श्रद्धान
  25. जगवासी - संसारी
  26. विकार - विभाव परिणति
  27. उपदेश - सीख
  28. अविनाशी - नित्य
  29. दशा - अवस्था
  30. चिद्रूप - चैतन्य रूप
  31. चिन्मय - ज्ञान - दर्शन सहित
  32. निराबाध - साता असाता की बाधा रहित
  33. चेतन - ज्ञान-दर्शन
  34. अखण्ड - पूर्ण
  35. अविवेक - अज्ञान
  36. सुविवेक - सम्यग्यान
  37. झायक - जानने वाषा
  38. कर्ता - जो कार्य करे
  39. दत्यकर्म - ज्ञानावरणादि अष्ट कर्म
  40. उदासीन - रागादि रहित
  41. नियत - निश्चय
  42. काय - शरीर
  43. अविकल्पी - विकल्प रहित
  44. परोक्ष - इंडिय और मन आश्रित ज्ञान
  45. प्रबोध - केवलज्ञान
  46. शील - ब्रह्मचर्य
  47. तप - इच्छाओं को रोकना
  48. विरति - हिंसादिक पाँच पापों का त्याग
  49. संयम - छहकाय के जीवों की रक्षा
  50. उपयोग - ज्ञान दर्शन
  51. साधक - सिद्ध करने वाला
  52. पराधीन - दूसरों के आश्रित
  53. अनूप - उपमारहित
  54. सुमति - अच्छी बुद्धि
  55. आश्रव - बंध का कारण
  56. संवर - आसव का निरोध
  57. शास्वत - स्वयंसिद्ध
  58. सुधिर - अचल
  59. अचेत - स्वरूप का भूलना
  60. निर्वाण - मोटल
  61. समाधि - ध्यान
  62. अकृत - स्वयं सिद्ध
  63. अज - जन्म रहित
  64. विश्वनाथ - संसार का स्वामी
  65. कीर्तन - गुणों का व्याख्यान करना
  66. वंदना - गुणों की स्तुति करना
  67. ध्यान - गुणों का स्मरण करना
  68. एकला - एक आत्मा को ही अपना मानना
  69. अखंडित - छिद - भिद नहीं सकता
  70. ममता - पर द्रव्यों में अहं बुद्धि
  71. अध्यात्म - आत्मा का स्वरूप बतलानेवाडी विद्या
  72. जाप - वार - वार नाम का उच्चारण
  73. जगपंथ - संसार भ्रमण का उपाय
  74. विकल्प - राग देष की तरंगें
  75. जिनागम - जिनराज का उपदेश
  76. लब्धघाती - अपने जीव का अहित करने वाला
  77. जिनपंथी - जैन मत के उपासक
  78. झेय - जानने योग्य घट-पटादि पदार्थ
  79. पाप - हिंसादि पाँच पाप
  80. सुबोध - सम्यग्ज्ञान
  81. पुण्य - दया-दान, पूजादि
  82. कुपंथ - मिथ्यामार्ग
  83. असत - सत्ता रहित
  84. सहज - स्वाभाविक
  85. बालबुद्धि - अज्ञानी
  86. प्रमेय - प्रमाण में आने योग्य
  87. विनायक - शिरोमणि
  88. सिद्ध - अष्ट‌गुन सहित, अष्ट कर्म रहित भगवान्
  89. मूढ़ता - मूर्खता
  90. अशोक - शोक रहित
  91. पद्मा - सच्चाझान-भेद‌विज्ञान
  92. ज्ञाता - जानने बाठा
  93. दृशि - आत्मा की अनन्तशक्तियों में से एक
  94. मुक्ति - एक समय की निर्मल पर्याय, सिद्धदशा
  95. अनुभूति - अनुभव
  96. सुधा - अमृतपान
  97. परमेष्ठी - जो परमपद में स्थित है
  98. अरतन्त - जो चार घातियां कर्मों का अभाव करते हैं
  99. सिद्ध आचार्य - जो मुनिसंघ के नायक होते हैं
  100. उपाध्याय - जो संघ में पठन-पाठन कराते हैं
  101. साधु - जो रलत्रय की आराधना करते हैं।
  102. तीर्थंकर - जो धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करते हैं
  103. मंगल - जो पापों को गलाए एवं सच्चा सुख उत्पन्न करे
  104. उत्तम - जो लोक में महान् हो
  105. शरण - शरण सहारे को कहते हैं
  106. भगवान् - जो वीतरागी और सर्वज्ञ होते हैं
  107. सम्यग्दर्शन - सात तत्वों का श्रद्धान करना
  108. सम्यग्ज्ञान - वस्तु का जैसा स्वरुप है वैसा जानना
    • सम्यग्चारित्र - रागादि का परिहार करना अथवा आत्मलीनता
  109. विश्व - छह द्रव्यों का समूह
  110. द्रव्य - गुणों का समूह
  111. गुण - द्रव्य की विशेषताओं को गुण कहते हैं
  112. पर्याय - द्रव्य या गुणों के परिणमन को पर्याय कहते हैं
  113. तत्व - जो वस्तु जैसी है, उसका भाव
  114. भव्य - जिनमें मोक्ष जाने की पात्रता हो
  115. अभव्य - जिनमें मोक्ष जाने की पात्रता न हो
  116. मिथ्यात्व - उल्टी मान्यता ‘118’ क्षमा - क्रोध का अभाव
  117. अनुजीवी गुण - भावस्वरूपी गुण
  118. प्रतिजीवी गुण - वस्तु का अभाव स्वरूपी गुण
  119. : निमित्त - कार्य की उत्पत्ति में जिस पर अनुकूल होने का आरोप आए
  120. अकिंचित्कर - व्यर्थ
  121. अक्रम - युगपत्
  122. अनुदिश - मार्ग पर एक ओर चलने वाला

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