ऐसे मुनिवर देखे वन में, जाके राग-द्वेष नहीं मन में ॥टेक ॥
ग्रीष्म ऋतु शिखर के ऊपर, वे तो मगन रहे ध्यानन में ॥1 ॥
चातुर्मास तरुतल ठाढ़े, वे तो बूँद सहे छिन-छिन में ॥2॥
शीत मास दरिया के किनारे, वे तो धीरज धरें ध्यानन में ॥3 ॥
ऐसे गुरु को मैं नित प्रति ध्याऊँ, मैं तो देत ढोक चरणन में ॥4॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ ११६