तर्ज : केशरिया चावल रंगवाय दे…
मुनीश्वर के गुण गाओ रे-2।
निज कल्याण हेतु मुनिपद की भावना भाओ रे।।टेक ।।
कैसा सुन्दर मुनि का जीवन, यथाजात अविकारी।
रहित अडम्बर सहज दिगम्बर, शाश्वत मंगलकारी।।
परमानंदमय होय, शीश चरणों में नाओ रे ।।1।।
पंच महाव्रत पंच समीति, निज-पर को हितकारी।
उदासीनता पंचेन्द्रिय के, विषयों में धारी ।।
अहो अतीन्द्रिय, परम जितेन्द्रिय गुण चित लाओ रे ।। 2 ।।
समता वंदनादि आवश्यक, यथायोग्य हो हैं ।
रहें यतीश्वर स्ववश, परम आवश्यक से सोहें ।।
शेष सप्त गुण भी अद्भुत, अन्यत्र न पाओ रे।।3।।
अन्तर महिमा कहें कहाँ तक, गुण रत्नाकर हैं।
साक्षात् मुक्ति के साधक, सबको सुखकर हैं ।।
प्रचुर स्वसंवेदनमय समता, लख हर्षाओ रे ।।4।।
मुनिपद बिना न शिवपद होवे, यह निश्चय जानो।
विषय कषायातीत सहज, निर्ग्रन्थ दशा मानो ।।
स्वाश्रय से ही मुनि समान, पुरुषार्थ जगाओ रे।।5।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २१९ से २२०