ध्याऊँ शुद्धातम अविकार-2 | Dhyau Suddhatam Avikara-2

ध्याऊँ शुद्धातम अविकार-2।।टेक।।

नित्य शुद्ध चैतन्य विभूति, भरा रहे भंडार।
सहज अनुभूतिस्वरूप सुशोभित,निज आतम ही सार।।1।।

निष्कषाय निष्पाप शुद्ध प्रभु,परम ब्रह्म सुखकार।
चित्स्वरूप ध्याते-ध्याते ही,सहज मिटे उरझार।।2।।

शत्रु-मित्र अरु कांच कनक सम, भासे ज्ञान मँझार।
वर्ते सहजहिं साम्यभाव अब, आनंद अपरम्पार ।।3 ।।

सहज मुक्त आनन्दमय परिणति, होवे निज आधार।
तृप्त रहूँ कृतकृत्य रहूँ, बस केवल जाननहार।।4।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’