धन्य-धन्य वीतराग देव अविकार हैं, दर्श सुखकार है-2 | Dhanya-dhany Vitarag Dev Avikar Haim Dars Sukhakar Hai-2

तर्ज : धन्य-धन्य आज घड़ी …

धन्य-धन्य वीतराग देव अविकार हैं, दर्श सुखकार है-2।।टेक।।

अद्भुत अलौकिक सु मूरति है सोहती।
सहज ही भव्यों के मन को सु मोहती ।।
भव-भव का मोह नशे, सर्व मंगलकार है।।1।।

दर्शन से भेदज्ञान, निज पर का जागता।
दुःखमय असार सब, संसार भासता ।।
लगे लगन अन्तर की, भावे समयसार है।।2।।

स्वाभाविक सुख शान्ति, प्रभु समीप मिलती।
दुविधा सु-मन की, सब ही विनशती ।।
रत्नत्रय सम्यक्, प्रगटे अपार है।।3।।

ज्ञान-वैराग्यमय, जीवन सुहाता ।
निर्ग्रन्थ मार्ग ही, मन को है भाता।।
ऐसी दशा पाऊँ प्रभो, नमन बारम्बार है ।।4।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’