संक्षिप्त मंगल विधान विधि
संकलन- साक्षी संयम पुजारी, खनियांधाना
वर्तमान समय में यह समाज अथवा विधानाचार्य की समय उपलब्धता पर निर्भर होना चाहिए है कि विधान किस रूप में करना है, यहाँ जाप विधि के बिना सम्पन्न होने वाले विधान की विधि का वर्णन किया है, मुख्यतया महाविद्याओं के छात्रों की शुद्धि से इसे तैयार किया है।
मंत्र जो विधान में प्रतिदिन प्रयोग में आते हैं-
अमृत स्नान-
ॐ अंह अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृत स्त्रावय स्त्रावय सं सं क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं सं क्ष्वीं क्ष्वीं हः सः स्वाहा
तिलक लगाकर सर्वांग शुद्धि निम्न मंत्र द्वारा करावें-
ॐ ह्रां ह्रीं हूं ह्रौं ह्रः हंः मम सर्वांगशुद्धिं कुरु कुरु स्वाहा
रक्षा सूत्र मंत्र-
(पृथ्वी छंद)
जिनेन्द्र-गुरु-पूजनं, श्रुत-वचः सदा धारणं,
स्वशीत-यम-रक्षणं ददत् सन्तपं-बुंदणम्।
इति प्रथत-षट्क्रिया-निरतिमारमात्मनो त्वेतं
वयं प्रथम-कर्मणे विहित-रक्षिकाबन्धम्॥
ॐ ह्रां ह्रीं हूं ह्रौं ह्रः अ-सि-आ-उ-सा सर्वांगरक्षां कुरु कुरु
ॐ नमोऽर्हते भगवते तीर्थङ्कर-परमेश्वराय एतत्त्वय करपल्लवे रक्षाबन्धनं करोमि समुद्दिष्टस्तु
ॐ ह्रीं अर्हं नमः स्वाहा (उक्त तीन मंत्र में से किसी एक का उच्चारण करें)
कलश विधि
(शोभा यात्रा के समय श्री जी को विमान जी में विराजमान करने के पूर्व कलश विधि करें, अथवा मंदिर जी में ही विधान हो तो नित्य नियम पूजन प्रारम्भ होने से पूर्व मंगल पंचक अथवा मंगलाष्टक पूर्वक यह विधि करें।)
पूर्व तैयारी
जिनमंदिर अथवा मुख्य कलश विराजमान करना के घर (मंदिर के निकट हो अथवा शोभा यात्रा वहां से निकालना हो तो घर पर अन्यथा जिनमंदिर में ही) पर टेबल जिस पर विराजमान होने वाले सभी कलश के कतार में रखे जा सकें और एक कलश के साथ 2 से 3 महिलायें आराम से खड़ी हो सकें, सभी कलश टेबल पर (मुख्य कलश मध्य में), छोटी कटोरी में कलश में डालने वाली सभी सामग्री पूर्ण से ही रख देवें (प्रत्येक कलश के पास अलग-अलग, कलश पर बांधने कलावा, स्वस्तिक हेतु चंदन, महिलाओं के बांय (Left) हाथ में बांधने हेतु कलावा, पुष्प व पीली सरसों, माला, मुकुटा
सबसे पहले मंगल पंचक अथवा मंगलाष्टक का पाठ करें, फिर अमृत स्नान, सर्वांग शुद्धि, और रक्षा सूत्र बंधवाएँ, पश्चात निम्न मंत्र द्वारा कलश में सामग्री डलवाएँ-
ॐ ह्रीं श्रीं मंगलकलशे नवरत्नगर्भाधानादीनि निक्षेपयामि स्वाहा
पश्चात कलश पर नारियल रख देवें, फिर कलावा बंधवाएँ व स्वस्तिक चिन्ह बनवाएँ (इस समय भजन बोलें स्वस्तिक बनाओ मारा साथी… रक्षा सूत्र बंधाओ मारा साथी…) साथ ही निम्न पद्य बोलें-
मंगल भगवान वीरो, मंगल गौतमो गणी। मंगल कुन्दकुन्दाद्यो, जैन धम्मोत्तु मंगलम्॥
सर्व मंगल मांगल्यं, सर्व कल्याण कारणम्। प्रधानं सर्व धर्माणं, जैनं जयतु शासनम्॥
इसके बाद सौभाग्यवती महिलायें कलश को अपने सिर पर रख लेवें (यदि रथ यात्रा निकलना है तो उसमें शामिल हों, और यदि यह विधि विधान स्थल पर ही सम्पन्न हुई हो तो इसके पश्चात वेदी की तीन प्रदक्षिणा करावें)। (यदि विधान स्थल पर ही विधि हो रही हो तो निम्न मंत्र द्वारा सभी कलश मंडिपे पर विराजमान करावें, उसके पूर्व चंदन अथवा पुष्प से स्वस्तिक बनवाए-
ॐ अंह भगवती महापुरुषस्य श्रीमदादिब्रह्मणो मतेऽस्मिन् श्रीवीरनिर्वाणसंवत्सरे मासे तिथीं दिने जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यदेशे नामिन नगरे जिनमन्दिरे कार्यस्य सिद्धिं सम्यग्भूमध्यमूर्धमुर्धस्थं पात्र शुद्धार्थं शास्त्रार्थं पुण्याहवाचनार्थं नवरत्न-गन्ध-पुष्पाक्षतादि-बीजपूरगोपितं मंगलकलशस्थापनं करोम्यहं क्ष्वीं हः सः स्वाहा, मुख्य कलश मध्य में बाकी कलश मंडिपे के कोनों पर विराजमान करावें।
इसके पश्चात 8 प्रतिहार्य, 8 मंगल द्रव्य विराजमान करावें-
प्रतिहार्य- ॐ ह्रीं अर्हत् अर्हत्-महिमा-बोधक-स्वरूप प्रतिहार्यं स्थापनं करोम्यहं क्ष्वीं हः सः स्वाहा
मंगल द्रव्य- ॐ ह्रीं अर्हत् अर्हत्-मांगल्य-बोधक-स्वरूप मंगलद्रव्यं स्थापनं करोम्यहं क्ष्वीं हः सः स्वाहा
इसके पश्चात निम्न मंत्र द्वारा जिनवाणी स्थापित करें-
ॐ ह्रीं अर्हत् अर्हत्सुखमनलसिनि पापातपभयकरि श्रुत-ज्वाला सहस्र प्रज्वलिते सरस्वतीं अस्माकं पापं हन हन दह दह पच पच क्षीं क्षीं क्षौं क्षौं क्षः श्रीश्रुतवरदे अमृत-सम्भवे वं वं हूं हूं स्वाहा
यदि श्री जी की शोभा यात्रा निकलना हो तो…
पूर्व में निम्न बातों का ध्यान रखें
1 श्री जी (एक दिन पूर्व प्रतिमा का मंजन शुद्धि कर लेवें, 1 विमान जी, प्रक्षाल-अभिषेक सामग्री दोनों जगह (जिनमन्दिर व विधान स्थल) (तीन कटोरी वाली पाण्डुक शिला अथवा जो समाज में प्रयुक्त होती हो वह, 4 कलश, 2 थाली, 3-4 सूखे कपड़े, चंदन,), 1 वेदी विधान स्थल पर, 1 मड़िगा, शुद्ध जल, 5 कलश अथवा 3 से अधिक विषम संख्या में, प्रत्येक कलश सामग्री (5 का सिक्का, पीली सरसों, पंच रत्न, सूखी हल्दी की गांठ, सुपारी), एक थाली में पुष्प व पीली सरसों, चंदन, कलावा (इसके टुकड़े कर लेवें जिससे तीन चक्र कलाई के हो सकें), सूखा गोला अथवा कटोरी अथवा जिनवाणी (एक स्थान पर रखने के लिए), माला, मुकुट, शोभा यात्रा हेतु DJ, भजन लिस्ट, माइक, 8 प्रतिहार्य, 8 मंगल द्रव्य, जिनवाणी।
प्रातः काल प्रक्षाल-अभिषेक के पश्चात श्री जी के समक्ष खड़े होकर आज्ञा लेवें।
हे जिनेंद्र परमात्मन्! दिनांक से तक होने जा रहा विधान के प्रसंग पर आपकी अध्यक्षता हेतु जिनालय से स्थल ले जाने की अनुमति चाहते है, इस विधि में पूर्ण यत्नाचार का पालन करते हुए शोभा यात्रा पूर्वक ले जाएंगे, पश्चात पुनः हम आपको
इस स्थान पर ही स्थापित करेंगे, अतः आप हमें आज्ञा प्रदान करें। पश्चात सभी 9 बार णमोकार महामंत्र पढ़े व श्री जी को कर पर लेकर रथयात्रा विमान में विराजित करें।
जिस जगह से प्रतिमा उठाई है उस जगह छोटी कटोरी, जिनवाणी अथवा सूखा नारियल का गोला रख देवें। (जटा दार गीला नारियल न रखें) (यह मात्र रिक्त स्थान के प्रतीक के लिए व पूज्यता के लिए नहीं)
शोभा यात्रा विधान स्थल पहुंचने के पश्चात श्री जी को पाण्डुक शिला पर विराजमान करें पश्चात ध्वजारोहण करें।
ध्वजारोहण विधि
पूर्व तैयारी
ध्वज दंड, 5 रंग का जैन ध्वज, व्यवस्थित उनके अंदर चमकनी इत्यादि समान भर कर बांधें, चंदन, पुष्प व पीली सरसों, कलावा, माईक की व्यवस्था।
ध्वजारोहण कर्ता परिवार को अमृत स्नान, सर्वांग शुद्धि करवा कर रक्षा सूत्र बंधवाएँ, पश्चात निम्न मंत्र द्वारा ध्वजदण्ड की शुद्धि करावें-
ॐ ह्रीं नमोऽर्हते पवित्रं जलनेन ध्वजदण्डं शुद्धिं करोमि
निम्न मंत्र द्वारा ध्वजदण्ड में रक्षा सूत्र बंधवाएँ-
ॐ ह्रीं चित्रवर्णसूत्रण ध्वजदण्डे परिवेष्टयामि ॐ णमो अरहंताणं स्वाहा
ध्वजारोहण के समय निम्न श्लोक एवं मंत्रोच्चार करें-
(उपजाति छंद)
तदग्रदेशे ध्वजदण्डमुच्चैर्भास्वन्मणिं गगनाद्विचित्रम्।
निवेशयत्नेन शुभोपदेश्यं महत्तपत्तांल्लोकणयं विदध्यातू॥
(वसंततिलका छंद)
रत्नत्रयत्कलशयाऽऽभिमतेऽत्र दण्डे लोकत्रयं प्रकृत केवलं बोधरूपम्।
संकल्प्य पूजितमिदं ध्वजमद्य तन्मे स्वोरोहयामि सन्मंगलं वाद्य घोषै॥
ॐ ह्रीं अर्हत् अर्हत् भवंतु भवंतु सर्वलोककल्याणं शांतिर्भवतु स्वाहा
ॐ ह्रीं अर्हत् जिन शासनपताका दण्डोऽसि त्वं जिन भव भव शब्द स्वाहा (दोनों मंत्रों का उच्चारण करें)
मंगलमय अरु मंगलकारी, जिनशासन ध्वज गीत बोलें।
मंगलमय अरु मंगलकारी, जिनशासन ध्वज लहराता।
अनेकान्तमय वस्तु व्यवस्था, का यह बोध कराता॥
स्याद्वाद शैली से जग का, संशय तिमिर मिटाता।
चहुँगति दुःख नशाता, जन-गण-मन हरषाता, जिन शासन सुखदाता॥
सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चरणमय मुक्ति मार्ग दरशाता।
जय हे… जय हे… जय जय हे॥
शासन ध्वज लहराता॥
अभिषेक मंत्र
पश्चात् श्री जी का प्रक्षाल-अभिषेक करें, फिर निम्न मन्त्र द्वारा प्रासुक जल से वेदी की शुद्धि करें-
ॐ ह्रीं श्रीं भूः स्वाहा
ॐ क्षीं क्षीं क्षीं क्षः प्रतिष्टा-मण्डप-वेदी-प्रभृति-स्थानानां शुद्धिं कुरुः
सिंहासन पर विराजमान करने का मंत्र
पश्चात् निम्न मंत्र द्वारा श्री जी को वेदी पर सिंहासन पर विराजमान करें-
ॐ नमोऽर्हते केवलिने परम-योगिने अनन्त-विशुद्ध-परिणाम-परिस्फुरित शुक्ल-ध्यानाग्नि-निर्दग्ध-कर्मबीजाय प्राग्भाजन-चतुष्टयाय सौम्याय शान्ताय मंगलाय वरदाय अष्टादश-दोष-रहिताय जिनबिम्बं स्थापयामि।
कलश विधि
इसके पश्चात् माँडने पर कलश विधि करें। पहले स्वस्तिक बनवाए, फिर निम्न मंत्र द्वारा कलश विराजमान करावें-
ॐ अद्य भगवतो महापुरुषस्य श्रीमदादिब्रह्मणो मरुदेव्यस्य श्रीवीरजिनवरिणोऽवत्तारे मासे तिथौ दिने जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यदेशे नाम्नि नगरे जिनमन्दिरे कार्यस्य निर्विघ्न समाप्यर्थं मण्डपभूमिशुद्धयर्थं पात्र शुद्धयर्थं शान्त्यर्थं पुण्याहवाचनार्थं नवरत्न-मन्त्र-पुष्पाक्षतादि श्रीजपूयगोशीर्ष मंगलकलशस्थापनं करोम्यहं ह्रीं हः सः स्वाहा (मुख्य कलश मध्य में बाकी कलश माँडने के कोनों पर विराजमान करावें।)
अष्ट प्रातिहार्य
इसके पश्चात् 8 प्रातिहार्य, 8 मंगल द्रव्य विराजमान करावें-
प्रातिहार्य- ॐ ह्रीं अर्ह अरहंत-महिमा-बोधक-स्वरूप प्रातिहार्य स्थापनं करोम्यहं ह्रीं हः सः स्वाहा
मंगल द्रव्य- ॐ ह्रीं अर्ह अरहंत-मांगल्य-वर्धक-स्वरूप मंगलद्रव्य स्थापनं करोम्यहं ह्रीं हः सः स्वाहा
जिनवाणी स्थापित करने का मंत्र
इसके पश्चात् निम्न मंत्र द्वारा जिनवाणी स्थापित करें-
ॐ ह्रीं अर्ह ह्रीं-सुकुमलवनलसितानि पापालयक्षयकरि श्रुत-ज्वाला सहस्र प्रज्वलिते सरस्वती अस्माकं पापं हन हन दह दह पच पच क्षीं क्षीं क्षीं क्षः क्षीरधवलये अमृत-सम्भवे वं वं हूं हूं स्वाहा
टोना माँडने का मंत्र
इसके बाद टोना माँडना पर रख देवें।
दिशाओं का बंधन
तत्पश्चात् विधानाचार्य पुष्प तथा पीली सरसों का क्षेपण कर दिशाओं का बंधन करें (यदि इन्द्र-प्रतिष्ठा करना हो तो ये पहले न करें इन्द्र प्रतिष्ठा के साथ करें।)
ॐ ह्रीं णमो अरहंताणं ह्रीं पूर्वदिशातः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा यह मंत्र पढ़कर पूर्व दिशा में पुष्प व पीली सरसों फेंकें।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं दक्षिणदिशातः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा यह मंत्र पढ़कर दक्षिण दिशा में पुष्प व पीली सरसों फेंकें।
ॐ ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं पश्चिमदिशातः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा यह मंत्र पढ़कर पश्चिम दिशा में पुष्प व पीली सरसों फेंकें।
ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ह्रीं उत्तरदिशातः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा यह मंत्र पढ़कर उत्तर दिशा में पुष्प व पीली सरसों फेंकें।
ॐ ह्रीं णमो लोए सव्वसाहूणं ह्रीं सर्वदिशभ्यः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा यह मंत्र पढ़कर सभी दिशाओं में पुष्प व पीली सरसों फेंकें।
अङ्गन्यास एवं शुद्धि
यदि कहीं पर इन्द्र इत्यादि बनाए गए हों तो यह विधि करें
मण्डलाष्टक के बाद शरीर की रक्षा और तत्तद् दिशाओं में आने वाले विघ्नों की निवृत्ति के लिए नीचे लिखे अनुसार अङ्गन्यास एवं शुद्धि करें। दोनों हाथों के अङ्गुल से लेकर कनिष्ठिका पर्यंत पोरुओं अङ्गुलियों में क्रम से अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु इन पंच परमेष्ठियों की स्थापना करें।
सर्व प्रथम निम्न मन्त्र बोलकर जल से सर्वाङ्ग शुद्धि करावें
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हः असिआउसा सर्वाङ्गशुद्धिं कुरु कुरु स्वाहा
प्रतिष्ठाचार्य द्वारा निम्न मन्त्र बोलते समय, इन्द्र-इन्द्राणी, सर्व प्रथम दोनों हाथों के अंगूठों को बराबरी से मिला कर, वज्रमुद्रा को नमस्कार करें-
ॐ ह्रीं णमो अरिहंताणं ह्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः
निम्न मन्त्र बोल कर दोनों हाथों की तर्जनी अङ्गुलियों को मिला कर नमस्कार करें-
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः
निम्न मन्त्र बोल कर दोनों हाथों की मध्यमा अङ्गुलियों को मिला कर नमस्कार करें-
ॐ ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं मध्यमाभ्यां नमः
निम्न मन्त्र बोल कर दोनों हाथों की अनामिका अङ्गुलियों को मिला कर नमस्कार करें-
ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः
निम्न मन्त्र बोल कर दोनों हाथों की कनिष्ठ अङ्गुलियों को मिला कर नमस्कार करें-
ॐ ह्रीं णमो लोए सव्वसाहूणं ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः
निम्न मन्त्र बोल कर दोनों हाथों की हथेलियों को सामने मिला कर नमस्कार करें-
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हः करतलाभ्यां नमः
निम्न मन्त्र बोल कर दोनों हाथों की हथेलियों के पृष्ठ भाग को मिला कर नमस्कार करें-
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हः करपृष्ठाभ्यां नमः
निम्न मन्त्र बोल कर पुष्प व पीली सरसों सब दिशाओं में क्षेपण करें-
ॐ ह्रीं हूं हूं किरि किरिष्टि पात्य घातय, प्रविघ्नान् स्फोटय स्फोटय, सहस्र-खण्डान् कुरु कुरु परमुद्रां छिन्दि छिन्दि परमन्त्रान् भिन्दि भिन्दि, क्षः क्षः हूं फट् स्वाहा
निम्न मन्त्र बोल कर सिर झुकाते हुए सिर का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो अरिहंताणं ह्रीं मम शीर्षं रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मन्त्र बोल कर अपने मुख का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं मम वदनं रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मन्त्र बोल कर हृदय का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं मम हृदयं रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मन्त्र बोल कर नाभि का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ह्रीं मम नाभिं रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मन्त्र बोल कर घुटनों का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो लोए सव्व साहूणं ह्रीं मम पादौ रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मन्त्र बोल कर अपने शरीर का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो अरिहंताणं ह्रीं मम रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मन्त्र बोल कर वस्त्र का स्पर्श करें।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं मम वस्त्रं रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मन्त्र बोल कर पूजन सामग्री का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं मम पूजाद्रव्यं रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मन्त्र बोल कर अपने चारों तरफ का स्थान देखें-
ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ह्रीं मम पूजा स्थलं रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मन्त्र बोल कर सीधे हाथ की चुल्लू में जल लेकर अपने सिर के चारों तरफ सींचें-
ॐ ह्रीं णमो लोए सव्व साहूणं ह्रीं सर्वं जगत् रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मन्त्र द्वारा विधानाचार्य चारों तरफ पुष्प क्षेपण करें-
ॐ क्षीं क्षीं क्षीं क्षः ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हः सर्वविघ्ननिवारणं कुरु कुरु स्वाहा।
निम्न मन्त्र बोल कर चारों दिशाओं में पुष्प-क्षेपण करें-
ॐ ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं पूर्वदिशः आगत-विघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं दक्षिणदिशः आगत-विघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा
ॐ ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं पश्चिमदिशः आगत-विघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा
ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ह्रीं उत्तरदिशः आगत-विघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा
ॐ ह्रीं णमो लोए सव्वसाहूणं ह्रीं सर्वदिशभ्यः आगत-विघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा
इसके बाद नौ बार णमोकार मन्त्र का जाप करें। साथ ही निम्न मन्त्र को सात बार पढ़ कर विधानाचार्य स्वयं परिचारकों पर पुष्प अथवा पीली सरसों का क्षेपण कर दिशाओं का बंधन करो।
ॐ नमोऽर्हते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा
पश्चात् निम्न मन्त्र द्वारा पुण्याह, इन्द्र-इन्द्राणी आदि पर पुष्प सरसों आदि का क्षेपण करें-
ॐ ह्रीं अर्ह अ सि आ उ सा णमो अरहंताणं समसिद्धिमू-णगणधराणं पराक्रमस्तु भवतु भवतु ह्रीं नमः
इन्द्र प्रतिष्ठा
सभी इन्द्र-इन्द्राणियों के हार-मुकुट व आभूषण आदि पर निम्न मन्त्र बोल कर, पुष्प व पीली सरसों का क्षेपण करके उन्हें शुद्ध करें -
ॐ ह्रीं णमो अरहंताणं, ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, ॐ ह्रीं णमो आइरियाणं, ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं, ॐ ह्रीं णमो लोए सव्व साहूणं। - इति इन्द्र-इन्द्राणीभ्योभूषणादि पवित्रं कुरु कुरु स्वाहा
जब निम्न मन्त्र एवं मन्त्र पढ़ें, तब केसर से तिलक करें -
(उपजाति छंद)
पात्रेऽर्पितं चन्दनमौषधीषं, शुभ्रं सुगन्धाष्टचन्दनम्।
स्थाने नवाङ्के तिलकाय चच्च, न केवलं देह-विकार-हेतोः ॥
ॐ ह्रीं चन्दन-तिलकं करोमि
जब निम्न श्लोक एवं मन्त्र पढ़ें, तब षोडश आभूषण की संकल्पना करें (सभी इन्द्र-इन्द्राणी अपने आभूषणों को स्पर्श करें) -
(शार्दूलविक्रीडित)
धुत्वा शेखर-पट्ट-हार-पदकं ग्रैवेयकालंम्बकं;
केयूराङ्गद-मद्ध्यबन्धुरकटि, सूत्रं च मुद्राङ्कितम् ।
चञ्चत्कुण्डल-कर्ण-पूरममल, पाणिद्वये कङ्कणं;
मञ्जीरं कटकं पदे जिनपतेः, श्रीगन्धभूषाङ्कितम् ॥
ॐ ह्रीं षोडशाभरणानि धारयामि
जब निम्न मन्त्र पढ़ें, तब जल से सर्वांग शुद्धि करें -
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हः हः मम सर्वांगशुद्धिं कुरु कुरु स्वाहा
जब निम्न श्लोक पढ़ें, तब गृहस्थी के कार्यों से निवृत्त रहने का नियम करें -
(उपजाति)
विविधविद्यातूर्यजनोत्सवेऽहं, गेहादि-मूच्छापमोदयामि ।
अन्नव्यंचनाः कृत्रिमादधानि, स्वगादिदंम्मोमि हापयामि ॥
ॐ ह्रीं यजोत्सवप्रतिज्ञां करोमि
आगे आचार्य, निम्न मन्त्र 21 बार पढ़ कर इन्द्रों पर पुष्प एवं सरसों का क्षेपण करें -
ॐ वज्राधिपत्ये ओ आं ह्रीं ऐं ह्रीं हः क्ष्वीं क्षः इन्द्राय संवौषट्
इसके बाद प्रतिष्ठाचार्य, सभी को आशीष देते हुए निम्न मन्त्र पढ़ें -
ॐ ह्रीं अर्हं अ-सि-आ-उ-सा णमो अरहंताणं, समद्धिं-समुद्धिं-समुद्ध-गणाधरणं अनाहत-पराक्रमस्ते भवतु भवतु ह्रीं नमः स्वाहा
इसके बाद विनयपाठ, पूजा पाठिका इत्यादि नित्य नियम पूजन सम्पन्न करावें
पश्चात विधान के मंगलाचरण से प्रारंभ करें।
प्रतिदिन विधान की पूजन में सम्पूर्ण महा अर्घ्य के पश्चात गोला चढ़वाए और पूजन सम्पन्न होने के बाद 108 बार तत्संबंधी जाप करावें।
सम्पन्न विधि
पूर्व तैयारी
कलश की विधि के समय जो टेबिल की व्यवस्था की थी उसी प्रकार इस समय भी करनी
आवश्यकता 5 पूजन की सामग्री चढ़ाने वाली थाली, 2-2 कलश प्रमुख जल
अंतिम दिन विधान सम्पन्न होने पर महा अर्घ्य के बाद इस विधि को सम्पन्न किया जाए।
कलश विराजमान करती परिवार के पुरुष महिलाएँ कलश उठाकर टेबिल पर रख लेवें, पश्चात उसका कलशवा
खोल दे, फिर उसमें एक कलश का जल डाल देवें, एवं उन कलश से पुण्याहवाचन की क्रिया सम्पन्न करें व
अन्य विधान में बैठने वाले जल और चंदन को एक कलश में कर लेवें (दोनों हाथों से नहीं करना है) उसके
पश्चात दूसरे कलश का जल उसमें डाल कर अच्छी तरह धोकर उस जल को भी थाली में डाल दे, पश्चात उस
जल को गंधोदक सिंचने वाली जगह डाले, और उसमें जो सामग्री है उसे सुखाकर माली को दे देवें। (हो सकता
हो अधिकार लोगों ने इस विधि को न देखा हो; परंतु इस प्रकार की विधि का उद्देश्य है की जो कलश घर जाने
वाला है वह पूर्ण रूप से सामान्य हो जाए; निर्गमित हो जाए)
पुण्याहवाचन
ॐ पुण्याहं पुण्याहं लोकोद्योतनकरा अतीताकालसंजाता निर्वाणगमयभूयश्चतुर्विंशतितीर्थकर
परमदेवाः वः प्रीयन्ताम् पुण्याहम् (धारा)
ॐ सकृतिज्ञानसंभवा वृषभादिसीमन्याचतुर्विंशति परमजिनेन्द्राः वः प्रीयन्ताम् पुण्याहम् (धारा)
ॐ भविष्यत्कालाम्बूद्यवप्रभवा महापादिचतुर्विंशतितीर्थकर परमदेवाः वः प्रीयन्ताम् पुण्याहम्
(धारा)
ॐ त्रिकालवर्ति परमधर्मायस्य सीमन्यध्रुपभूत्यः विदेहक्षेत्रे विहरमाणविंशतितीर्थकर परमदेवाः वः
प्रीयन्ताम् पुण्याहम् (धारा)
ॐ वृषभसेनादिगणधरदेवा वः प्रीयन्ताम् पुण्याहम् (धारा)
ॐ सम्यग्दर्शनभूषिताः कुन्दकुन्दाद्यनेकदिगम्बरसाधुचरणा वः प्रीयन्ताम् पुण्याहम् (धारा)
पुण्य ले लीजिए
इह वाचनायनाम्नादेवतामनुजाः सर्वे गृहधका जिनधर्मपरायणा भवन्तु। दानतपोवीर्यज्ञानं
निविघ्नास्तु। सर्वजिनधर्मधर्म्मानां धर्म्मान्धर्म्बंधर्म्बंधर्म्मानः प्रमोदोत्सवाः प्रवर्तन्ताम्। तुष्टिरस्तु,
पुष्टिरस्तु, वृद्धिरस्तु, कल्याणमस्तु, अष्टसिद्धिमस्तु, आयुष्यमस्तु, आरोग्यमस्तु, कर्मक्षिरिदस्तु,
इष्टसंपत्तिरस्तु कामभोगोपभोगः स्वस्तु, पापाणि शास्यन्तु, धोरणानि, शाम्यन्तु, पुण्यं वर्धताम् कुले
गोत्रं चाभिवर्धताम्, स्वस्तिं भद्रं चास्तु, क्ष्वीं, क्ष्वीं, हं सः स्वाहा। श्री
मज्जिनेन्द्रचरणारविन्दान्वन्दनाभिः सदारास्तु।
इसके पश्चात शांति पाठ, विसर्जन विधान का समापन करवाना चाहिए
तत्पश्चात मंगल कलश को लेकर के वेदी की तीन परिक्रमा लगाना चाहिए तथा पुनः श्रीजी को वेदी पर
विराजमान करवाकर, अर्घ्य समर्पित करवाकर, 9 बार णमोकार मन्त्र की जाप पूर्वक विधान की विधि का पूर्ण
समापन करें।
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3165.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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