यह जगत् एक खुली किताब है | Yah Jagat Ek Khuli Kitab Hai

यह जगत् एक खुली किताब है

-प्रो. (डॉ.) वीरसागर जैन

अध्यापक, पाठशाला और पुस्तकों से तो सभी शिक्षा ग्रहण करते हैं, परन्तु ज्ञानी पुरुष तो जगत् की सर्व वस्तुओं से ही सदा शिक्षा ग्रहण करते हैं। उनके लिए यह जगत् किसी पाठशाला से कम नहीं है, अपितु कुछ बढ़कर ही है। दुनिया की अन्य पाठशालाएँ तो अनेक बन्धनों से बँधकर थोड़े समय के लिए ही खुलती हैं, परन्तु यह जगत् सदैव और सबके लिए खुलने वाली एक ऐसी अनुपम पाठशाला है जिसका प्रत्येक पदार्थ ही ज्ञानियों को उत्तम शिक्षा देते हुए गुरु के समान प्रतीत होता है। संभवतः यही कारण है कि आचार्य उमास्वामी ने भी संवेग और वैराग्य की वृद्धि के लिए ज्ञानियों को इस जगत् एवं काया के स्वभाव के चिंतन की प्रेरणा दी है-

‘जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैराग्यार्थम्।’ -तत्त्वार्थसूत्र, 7/2

वैदिक पुराण ‘श्रीमद्भागवत’ (11/9) में भी इसी आशय को समझाने वाला एक अवधूत-प्रकरण आता है, जो बड़ा ही रोचक एवं शिक्षाप्रद है। वहाँ एक अक्धूत से पूछा गया है कि आपके गुरु कौन हैं, आपने किनसे शिक्षा प्राप्त की है जो सदैव इतने प्रसन्न रहते हैं? तब अवधूत उत्तर देता है कि- मैंने जगत् की निम्नलिखित 24 वस्तुओं से शिक्षा प्राप्त की है, ये मेरे गुरु हैं। यथा संक्षेप में-

  1. पृथ्वी- कोई कितना भी कष्ट पहुँचाए, पर सन्मार्ग से विचलित न होने की धैर्य-शिक्षा देती है।
  2. वायु- सबके बीच रहकर भी सदा निर्लिप्त रहने की शिक्षा देती है।
  3. आकाश- अजर, अमर और सबके बीच रहकर भी सदा शुद्ध बने रहने की शिक्षा देता है।
  4. जल- सदैव शीतल, मधुर एवं पवित्र रहने की शिक्षा देता है।
  5. अग्नि- सदैव तेजस्वी, दैदीप्यमान और अक्षोभ्य रहने की शिक्षा देती है।
  6. चन्द्रमा- कलाओं के नित्य घटते-बढ़ते रहने पर भी सदा पूर्ण व शीतल रहने की शिक्षा देता है।
  7. सूर्य- सबके प्रति सदा निष्पक्ष रहने की शिक्षा देता है।
  8. कपोत- अधिक प्रेम में आसक्त होने वाला दुःखी होता है -ऐसी शिक्षा देता है।
  9. अजगर- सहज मिले तो खाकर पेट भर ले और निरीह भाव से रहे -ऐसी शिक्षा देता है।
  10. समुद्र- शांत, गंभीर, अगम्य, अभेद्य, अनन्त, अक्षोभ्य रहने की शिक्षा देता है।
  11. पतंग- इन्द्रिय-विषयों में मोहित रहने वाला प्राणी मरणान्त दुःखी होता है -ऐसी शिक्षा देता है।
  12. मधुमक्खी- संचय नहीं करना चाहिए; संचय करनेवाले को नष्ट होना पड़ता है- ऐसी शिक्षा देती है।
  13. मधुहारी- संचित परिग्रह अंततः दुःख देकर अन्य के पास चला जाता है -ऐसी शिक्षा देता है।
  14. हाथी- लकड़ी की भी स्त्री से संपर्क करोगे तो बंधनों में पड़ोगे -ऐसी शिक्षा देता है।
  15. हिरण- कर्णेन्द्रिय के विषय-सेवन से भी मरणान्तक कष्ट प्राप्त होता है -ऐसी शिक्षा देता है।
  16. मीन- रसनेन्द्रिय के विषय-सेवन से भी मरणान्तक कष्ट प्राप्त होता है -ऐसी शिक्षा देता है।
  17. वेश्या- वेश्या का कथानक ‘आशा हि परमं दुःखं, नैराश्यं परमं सुखम्’ -ऐसी शिक्षा देता है।
  18. कुरर पक्षी- संचय दुःख का कारण है और त्याग सुख का कारण है -ऐसी शिक्षा देता है।
  19. बालक- सदा निश्चिन्त और आनन्दमय रहने की शिक्षा देता है।
  20. कुमारी-कंकण- एकाकी ही सुखी है, बहुतों के साथ रहना तो दुःख है -ऐसी शिक्षा देता है।
  21. बाण- अद्भुत एकाग्रता एवं लक्ष्य के प्रति निष्ठा रखने की शिक्षा देता है।
  22. सर्प- किसी भी आवास में रह ले, पर घर बनाने की चिंता न करे-ऐसी शिक्षा देता है।
  23. मकड़ी- यह जीव अपने ही राग-द्वेष में उलझकर दुःखी होता है -ऐसी शिक्षा देता है।
  24. भृंगी कीट- जड़ पदार्थों में बुद्धि लगाने से जीव भी जड़ हो जाता है- ऐसी शिक्षा देता है।

इसके अतिरिक्त शास्त्रों में यत्र-तत्र कथन आते हैं कि हम जगत् की अन्य वस्तुओं से भी ज्ञान-वैराग्य की सुखद शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं। यथा-

तराजू- तराजू के दो पलड़े हमें यह शिक्षा देते हैं कि जो ग्रहण या संचय करता है उसका अधोपतन होता है और जो त्याग करता है वह ऊपर उठता है। यथा-
"अधो जिघृक्षवो यान्ति यान्त्यूर्ध्वमजिघृक्षवः।
इति स्पष्टं वदन्तौ वा नामोन्नामौ तुलान्तयोः।।‘’ - आत्मानुशासन, 154

याचक- याचक यह शिक्षा देता है कि पुण्योदय से प्राप्त लक्ष्मी का दान न करके अकेले ही भोगने की लालसा रखने वाले जीवों को ऐसी याचक दशा प्राप्त होती है, अतः दान में तत्पर रहना चाहिए-
"याचका नैव याचन्ते बोधयन्ति गृहे गृहे।
दीयतां दीयतां लोकेष्वदानात् फलमीदृशम्।।‘’ - सुदृष्टितरंगिणी
“याचक नांहि माँगते, घर-घर देते ज्ञान।
देहु देहु हे सत्पुरुष, नहीं दिया मुझ जान॥”

चक्की- चक्की यह शिक्षा देती है कि जो अपने ध्रुव स्वभाव का आश्रय लेते हैं वे ही सुरक्षित रहते हैं और पर्यायों में मग्न रहने वाले सदा जन्म-मरण करते रहते हैं। यथा-
“चलती चक्की देखकर, दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में, साबित बचा न कोय॥”

अथवा-
“ध्रुव कीली के पास रहें वे दाने नहीं पिस पाते हैं।
छिन्न-भिन्न पिसते हैं वे जो कीली से हट जाते हैं॥”

सफेद बाल- सफेद बालों से शिक्षा मिलती है कि शीघ्र संन्यास धारण करो-
“मुक्तिश्रियः प्रणयवीक्षणजालमार्गाः, पुंसां चतुर्थपुरुषार्थतरुप्ररोहा:।
निःश्रेयसामृतरसागमनाग्रदूताः, शुक्लाः कचाः ननु तपश्चरणोपदेशा।।”

  • यशस्तिलकचम्पू, 2/104

गधा- ज्ञानियों को तो गधे से भी बहुत शिक्षा मिलती है। यथा-
“अविश्रामं वहेत् भारं शीतोष्णं च न विन्दति।
ससन्तोषस्तथा नित्यं त्रीणि शिक्षेत् गर्दभात्॥”

अर्थात् गधे से तीन शिक्षाएँ ग्रहण करनी चाहिए- 1. सदा बिना थके काम करना, 2. सर्दी-गर्मी की चिन्ता न करना, 3. रूखा-सूखा खाकर संतुष्ट रहना।

पनघट-
करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
न।
रसरी आवत-जात तैं, सिल पर परत निसान॥"

चींटी- चींटी यह शिक्षा देती है कि हमें सदैव अनुशासनपूर्वक चलना चाहिए और सामाजिक संगठन बनाकर रहना चाहिए।

तोता- तोता उतना ही बोलता है जितना उसे सिखाया जाता है, उससे हीनाधिक नहीं। तथा वह पिंजरे में भी सदा निर्मोह रहता है, अवसर पाते ही मुक्त हो जाता है। हमें भी घर में ऐसे ही रहना चाहिए-
"तोते के भाव जैसे कभी तिर ही जाएंगे।
कबूतर के भाव जैसे कभी तिर न पाएंगे।।‘’

इसीप्रकार और भी अनेकानेक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत किये जा सकते हैं जिनका उल्लेख शास्त्रों में उपलब्ध होता है, परन्तु विस्तारभय के कारण उन्हें यहाँ लिखना संभव नहीं है। सबका तात्पर्य मात्र इतना है कि यह जगत् ज्ञान-वैराग्य की शिक्षा देने वाली एक अद्भुत पाठशाला है और हमें इसे पढ़कर उत्तम शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए, जैसा कि असंख्य ज्ञानी कर चुके हैं और आगे भी करते रहेंगे। दुनिया की पाठशालाएँ तो अनेकानेक नियमउपनियमों में बँधकर सीमित समय में ही खुलती हैं, उनमें सबको प्रवेश भी नहीं मिलता; किन्तु यह जगत् एक ऐसा खुला विश्वविद्यालय है जहाँ सब सदा निःशुल्क सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं, किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं है।