वृन्दावनदास जी कवि | Vrindaavandaas ji kavi

[वृन्दावन दास जी]

हम सब पिछले कुछ महीनों से जैन हीरो की श्रृंखला में मध्यकाल में जो विद्वान, पण्डित हुए हैं उनका परिचय प्राप्त कर रहे हैं। उनके योगदान का स्मरण कर रहे हैं। उनके द्वारा लिखित ग्रंथों का अवलोकन कर रहे हैं और उन्होंने क्या-क्या अच्छी बातें लिखीं हैं, बताईं हैं। जैनधर्म की रक्षा, सुरक्षा, प्रचार-प्रसार में उनका क्या योगदान रहा है इसको अपन समझ रहे हैं और बहुत नई-नई बातें हमको समझ में आ रही हैं। उस क्रम में आज हमारा प्रकरण है कविवर पण्डित वृन्दावनदास जी। कविवर पण्डित वृन्दावनदास जी का नाम सबने सुना होगा ऐसा शायद ही कोई हो जो वृन्दावनदास जी की पूजाएँ ना करता हो। ऐसी कोई जिनवाणी संग्रह नहीं होगी जिसमें वृन्दावनदास जी की पूजाएँ ना हों। अभी जो आप महावीर स्वामी की पूजा सुन रहे थे वो वृन्दावनदास जी ने ही लिखी है। ये अभी संजय जी ने बहुत सोच-समझकर ये थोड़ी देर पहले जो हमको पूजा सुनाई है। वो हमको बहुत अच्छी लगी और हम सब कितने उत्साह से गाते हैं, पढ़ते हैं।

श्री वीर महा अतिवीर सन्मति नायक हो, जय वर्द्धमान गुणधीर सन्मति दायक हो।

ऐसी उन्होंने चौबीसों तीर्थंकरों की बहुत ही अच्छी, बहुत सुन्दर साहित्यिक, अर्थपूर्ण पूजाएँ लिखीं हैं और जो लोग समयसार, कुन्दकुन्द आचार्य को विशेष पढ़ते हैं, स्वाध्याय में, आध्यात्मिक चिन्तन-मनन में बहुत अधिक रहते हैं उन्होंने भी कविवर वृन्दावनदास जी का नाम इसलिए सुना होगा क्योंकि उन्होंने भी कुन्दकुन्द आचार्य की प्रशंसा में, उनकी भक्ति में, बहुत अच्छे-अच्छे छंद लिखे हैं। कविवर वृन्दावनदास जी बहुत अधिक प्रभावित थे कुन्दकुन्द आचार्य से इसलिए उन्होंने अनेक छंद लिखे हैं उनकी महिमा में एक-दो छंद तो सबने सुने होंगे और एक तो सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है कोई ऐसा समयसार, प्रवचनसार नहीं है जिसकी प्रस्तावना में वो छंद उद्धृत ना हो वो क्या छंद है ?

जास के मुखारबिंद तैं प्रकाश भासवृन्द स्याद्वाद जैन वैन इंदु कुन्दकुन्द से।

तास के अभ्यास तैं विकास भेदज्ञान होत, मूढ़ सो लखैं नहिं कुबुद्धि कुन्दकुन्द से।।

देत है अशीष-शीष नाय इन्द्र चन्द्र जाहिं मोर मार खण्ड मारतण्ड कुन्दकुन्द से।

शुद्ध बुद्ध रिद्धि दा, प्रसिद्ध रिद्धि सिद्धि दा हुए हैं, ना होयेंगे, मुनिन्द कुन्दकुन्द से ।।

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कुन्दकुन्द आचार्य जैसे महान मुनिन्द ना कभी हुए हैं, ना कभी होयेंगे। कितनी बढ़िया इसकी भाषा है। कितना सुन्दर ये सवैया है। वृन्दावनदास जी बहुत उच्चकोटि के महान विद्वान थे। उन्होंने क्या-क्या लिखा है? क्या उनका परिचय है? ये जैनसमाज के बच्चे-बच्चे को जानना चाहिए। आज लोग इन कवियों के बारे में जानते नहीं है। ये बात मेरे मन में बहुत शलती रहती है, दुःख होता रहता है और इसीलिए हमारी ये श्रृंखला चल रही है कि कम से कम इन एक-एक विद्वान के बारे में जाने तो सही कि ये कौन थे? क्या-क्या लिखा? क्या इनका योगदान है? क्या इनका चिंतन है? कहाँ पर हुए क्योंकि वैसे ही इनका परिचय मिलता नहीं है और यदि हम जानेंगे नहीं, बताएंगे नहीं तो ये जितना मिलता है ना वो भी लुप्त हो जाऐगा। इतिहास में जितनी बातें सुरक्षित हैं वे भी खत्म हो जाऐंगी इसलिए ये हमने श्रृंखला चलाई रखी है। सबसे पहले हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि वृन्दावनदास जी के जीवन के बारे में हमको क्या-क्या बातें जानने को मिलतीं हैं?

वृन्दावनदास जी का जन्म आज से ठीक दो सौ छत्तीस वर्ष पहले, माघ शुक्ला चतुर्दशी, विक्रमसंवत् 1842 को उत्तरप्रदेश में शाहाबाद नाम का एक जिला है उसमें एक बारां नाम का गाँव है जो बनारस के पास पड़ता है और आरा वाले रोड़ पर पड़ता है, आरा बनारस के बीच में एक बारां नाम का गाँव है जिसका जिला शाहबाद है वहाँ पर आज से दो सौ छत्तीस वर्ष पहले कविवर वृन्दावनदास जी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम धर्मचन्द्र था और माता का नाम सितावी था ये अग्रवाल परिवार के थे, गोयल इनका गोत्र था। ये सारा परिचय जो थोड़ा बहुत मिलता है वो इन्होंने अपनी प्रशस्ति में थोड़ा लिखा है और इनके वंशज आज भी जीवित हैं जो कि आरा में जो कि बिहार में पड़ता है। आरा में बहुत बड़ा ग्रंथ भण्डार है उस आरा में आज भी कई वंशज वहाँ रहते हैं तो कुछ इधर-उधर से जानकारी जो प्राप्त हुई है वो मैं आपको बता रहा हूँ। वृन्दावनदास जी ग्यारह साल के थे तभी इनका पूरा परिवार बारां से बनारस शिफ्ट हो गए थे और इनके पिता जी का काम टकसाल का काम था, टकसाल का मतलब होता है कि जहाँ पर रूपये बनते थे। इनके पिताजी धर्मचन्द्र जी अंग्रेजों के बहुत बड़े विश्वासपात्र थे और इनके यहाँ सोने-चाँदी के सिक्के बनते थे और अंग्रेज उन पर बड़ा भरोसा करते थे कि ये बहुत ईमानदारी से काम करके देंगे। वृन्दावनदास जी का विवाह बनारस में ही हो गया था इसलिए इनको बनारस ज्यादा सूट किया तो ये बनारस में, ठठेरा बाजार है कोई वहाँ पर इनकी ससुराल थी और ये वहाँ भेलूपुर और भदेड़ी वर्तमान नाम भदोही वहाँ पर शिफ्ट हुए थे। वृन्दावनदास जी खुद लिखते हैं कि जब हम बनारस गए शिफ्ट हुए तो उन्हें सबसे अच्छी चीज क्या मिली? वृन्दावनदास जी लिखते हैं कि हम जब बनारस पहुँचे तो सबसे अच्छी चीज वहाँ पर एक अध्यातम शैली भेलूपुर मंदिर में मिली। बनारस में बहुत बढ़िया भेलूपुर का मंदिर है पार्श्वनाथ भगवान की जन्मभूमि मानी जाती है। उसके पास में ही एक जगह है भदेनी 50 मीटर पर ही यहाँ दूसरा मंदिर है। मैं इन सब मंदिरों के साक्षात् दर्शन करके आया हूँ और उस भदेनी और भेलूपुर मंदिर में छह-सात पण्डित लोगों के नाम दिए हैं काशीनाथ आदि बोले कि ये पण्डित जी थे और वहाँ अध्यातम की बहुत सुन्दर शैली चलती थी। मैं आपको ये बताना चाहता हूँ कि जो शैली बनारसीदास जी ने शुरू की थी वो कैसे सारे देश में फैल गई थी। कहाँ आगरा, कहाँ जयपुर, आमेर, सांगानेर, सहारनपुर, इन्दोर, मेरठ लेकिन कहाँ बनारस और आरा वहाँ तक भी शास्त्र सभाएँ चलती थीं और ये वृन्दावनदास जी उस शास्त्र सभा को पाकर इतने खुश हुए कि उन्होंने लिखा कि हमको बनारस आकर सबसे बढ़िया काम जो मिला वो यहाँ से अध्यातम शैली मिली इसमें हम एक भी दिन ना जाएँ तो हमारा मन नहीं लगता था ऐसा इन्होंने लिखा है। वृन्दावनदास जी के चार-पाँच भाई भी थे और सबको थोड़ी-थोड़ी धर्म की रुचि सभी को थी। वृन्दावनदास जी की पत्नी का नाम रुक्मिणी था और आपको जानकार ये आश्चर्य होगा कि आज से करीब ढाई सौ, सवा दो सौ वर्ष पहले इनकी पत्नी रुक्मिणी जी बहुत अच्छी सुशिक्षित महिला मानी जाती थीं, उस जमाने में पढ़ी लिखीं महिला मानी जाती थी। जिस समय किसी महिला का पढ़ा लिखा होना अत्यंत दुर्लभ था उससमय वृन्दावनदास जी की पत्नी बहुत अधिक पढ़ीलिखीं थीं। वृन्दावनदास जी खजांची और मुनीम बने थे लेकिन इनके बारे में भी ये बात मिलती है कि ये काम करते थे तो बगल(पास/समीप) में शास्त्र चौकी पर विराजमान करते थे जैसे दौलतराम जी किया करते थे और दिनभर गाथाएँ याद करते थे, लिखते थे, स्वाध्याय करते थे। ये भी प्रसंग मुझे बहुत प्रेरणा देता है कि हम लोग ऑफिस में काम जो करते हैं वो करते हैं लेकिन इधरउधर की बातों में, चर्चा में, दुर्ध्यान में समय बर्बाद करते हैं। ये प्रसंग बहुत प्रेरणा देते हैं कि आपको जब टाइम मिले तब छोटे छोटे गुटखे के रूप में जिनवाणी को अपने पास में रखें, आज कल तो मोबाइल में शास्त्र रखते हैं तो अपने शास्त्रों के स्वाध्याय में इतनी रुचि होना चाहिए कि जो मनुष्य जीवन का एक एक क्षण चक्रवर्ती और इन्द्र की संपदा से ज्यादा कीमती है उसको इधर उधर ना खराब करके उसको हम शास्त्राभ्यास में लगाएं, तत्त्व चिन्तन के उपयोग में लगाएं तो बहुत फायदा होगा ये शिक्षा मुझे वृन्दावनदास जी के जीवन से भी मिलती है बहुत अच्छा, सीधा-सादा जीवन था। बहुत शांतस्वभावी थे लेकिन शरीर के जरूर बहुत मजबूत थे और एक और गजब की बात मिलती है कि वृन्दावनदास जी धर्म की रक्षा के लिए सबसे आगे खड़े रहते थे। धर्म पर कोई संकट आए तो जरूर ये बहुत उत्साही होकर के सबसे आगे समाज में खड़े हो जाते थे। जिससमय वृन्दावनदास जी भेलूपुर में थे उस भेलूपुर में मैं स्वरं जाकर आया हूँ और मैंने बनारस का इतिहास पढ़ा है और बनारस के इतिहास में कई घटनाएँ ऐसी हैं जो सुनाने लायक हैं अभी समय नहीं है लेकिन मैंने इनके जीवन को पढ़ते हुए एक और घटना नई मिली है कि ये भेलूपुर और भदेनी का जैनमंदिर है इस पर श्वेताम्बरों ने आक्रमण किया था, मुकदमा किया था और श्वेताम्बरीकरण करने का प्रयास किया था। कोर्ट में मुकदमा गया था तब सबसे ज्यादा लड़ाई किसी ने लड़ी थी तो वृन्दावनदास जी ने की थी और उसकी वजह से वो दोनों मंदिर आजतक, कोर्ट का फैसला लिखित में आया है कि ये दोनों मंदिर मूलतः दिगम्बर हैं और दिगम्बर ही रहेंगे और वो फैसला रखा है। आज में क्या बताऊँ वृन्दावनदास जी का अभी हम साहित्यिक योगदान तो पढ़ेंगे लेकिन आप सामाजिक योगदान देखिए यदि उन्होंने इतनी मेहनत नहीं की होती तो आज ये दोनों मंदिर हमारे हाथ से चले गए होते। उसका पूरा डाटा ब्योरा मेरे पास है अभी सुनाने/बताने का वक्त नहीं है लेकिन मैं ये बताने के लिए आपको ये घटना सुनाई कि जो इस तरह का श्वेताम्बर-दिगम्बर का जो थोड़ा संघर्ष है ये तब से चलता है पता नहीं क्यों जैनधर्म में आकर भी लोग कषाय को नहीं छोड़ रहे हैं, हद्द की बात है, आक्रमण करना, बदलना ये सब क्या है? गंदी नीति है जगह-जगह मैं देखता हूँ। मैं तो श्वेताम्बर भाइयों तक को बताता हूँ। उनसे कहता हूँ, सामने से भरी सभा में कहता हूँ कि अरे! तुम्हें चौबीस तीर्थंकर मिले हैं और फिर तुम इस तरह की, तुम्हारी अंतरात्मा तुमको कुछ बोलती नहीं है क्या? तुमको कुछ समझ में नहीं आता है क्या? जबर्दस्ती तुम इस तरह से करते हो ये अच्छी बात नहीं है तो खैर वो तो एक अलग प्रकरण है ये तो आज बात बताना जरूरी थी इसलिए मैंने आपको बताई और वृन्दावनदास जी ने अपनी मृत्यु से पाँच वर्ष पहले उन्होंने बहुत वैराग्य ले लिया, उदासीन वृत्ति धारण कर ली। बहुत सारी चीजें छोड़ दीं। पैरों में जूते तक पहनना छोड़ दिया। सिले कपड़े पहनना छोड़ दिया। केवल दो ही कपड़ों में अपना सारा जीवन गुजारा इसप्रकार उनका परिचय है और उनके दो पुत्र थे एक का नाम अजितदास और दूसरे का नाम शिखरचंद और जो आज वंशज पाए जाते हैं आरा में वो अजितदास के वंशज हैं और अजितदास जी बहुत बड़े खुद भी विद्वान थे। जैसे- जयचंद छाबड़ा जी के बेटे नन्दलाल जी विद्वान थे। टोडरमल जी के बेटे गुमानीराम जी विद्वान थे।

अजितदास जी ने अपनी एक किताब लिखी है जिसका नाम है जैन रामायण। जैन रामायण नाम की विशाल, सात हजार छंद हैं उसमें वो अजितदास जी ने लिखी है और उसकी प्रशस्ति में ये लिखा है कि मेरे पिताजी जैन रामायण से बहुत प्रभावित थे। पदमपुराण ने बहुत लोगों का जीवन बदला है। मुझे लगता है कि वृन्दावनदास जी पर भी उसका असर रहा होगा तो वृन्दावनदास जी जैन रामायण लिखना चाहते थे लेकिन लिख नहीं सके और वे बिना लिखे ही चले गए तो उनके बेटे ने कहाँ पिताजी की बड़ी इच्छा थी इसलिए मैं जैन रामायण लिख रहा हूँ और वो जैन रामायण अभी तक अप्रकाशित है देखो हमारी समाज इधरउधर बहुत ध्यान देती है। असली चीजों पर ध्यान नहीं देते हैं। इनके रिकार्ड डाटा तक भी सुरक्षित नहीं हैं। मैं बड़ी मुश्किल से आपको ढूँढ-ढूँढकर के कई दिन में निकाल कर के बताने की कोशिश कर रहा हूँ। ये तो इनका सामान्य परिचय मैंने आपको जितना मिलता है वो थोड़ा बहुत दिया।

अब देखते हैं कि इन्होंने कौन-कौन से ग्रंथ लिखे?

चौबीसी पूजा पाठ। चौबीसी पूजा पाठ का मतलब है चौबीस तीर्थंकरों की पूजा और आपको ये जानकार बहुत आश्चर्य होगा कि एक दफा/बार भेलूपुर बनारस मंदिर में कोई तीर्थ यात्रा संघ आने वाला था जैसे पदयात्री चलते हैं ना आज भी हमारे गाँव में हर साल दिवाली, दशहरे पर पदयात्री आते हैं क्योंकि हमारा गाँव महावीर जी के रास्ते में पड़ता है तो लोग जयपुर से महावीर जी पदयात्रा करते हैं वे हमारे गाँव में रुकते हैं वहाँ बहुत बढ़िया अभिषेक, विधान-पूजा करते हैं तो एक बार सम्मेदशिखर जी के लिए कोई पदयात्रियों का संघ जा रहा था और उसे भेलूपुर मंदिर में पहुँचना था और भेलूपुर मंदिर में पहुँच कर विधान करना था उस यात्रा संघ के लोगों ने वृन्दावनदास जी को चिट्ठी लिखी कि हम इस तारीख को भेलूपुर मंदिर में विधान करेंगे, पाठ करेंगे तो हमारी इच्छा है आप कोई नया पाठ लिख दो, अबकी बार हम नया विधान करना चाहते हैं और तब उन्होंने आठ दिन में ये चौबीसी विधान रच/लिख दिया। आठ दिन के अंदर चौबीस तीर्थंकर की इतनी सुन्दर पूजाएँ हैं। इतनी सुन्दर सुन्दर पूजाएँ लिख दीं और फिर भेलूपुर मंदिर में बड़े ही ठाठबाट के साथ ये विधान हुआ तो उनकी प्रतिभा देखो। दूसरा एक और विधान इन्होंने लिखा है उसका नाम है तीस चौबीसी विधान। ये चौबीसी पूजा पाठ 1875 में लिखा है। आज से दो सौ तीन वर्ष पहले। इस समय क्या चल रहा है? 2078, आपको विक्रमसंवत् से चीजें समझनी पड़ेंगी और तीस चौबीसी पाठ लिखा है 1876 में उसमें तीस चौबीसियों की पूजा है। पाँच भरत, पाँच एरावत की दस/दश और भूतकाल के दश, वर्तमान के दश और भविष्य के दश, तीस चौबीसी के सात सौ बीस तीर्थंकरों की पूजा का पाठ है वो मैंने भी अभी नहीं पढ़ा है, ना आसानी से किताब मिली और ना ही समय मिला है लेकिन ये किताब है। इसके अलावा क्या लिखा है वो सुनो आप। इन्होंने अपने जीवन में सबसे पहले जो किताब लिखी थी उस किताब का नाम है प्रवचनसारभाषा वृन्दावनदास जी ने अपने जीवन में सबसे शानदार, आध्यात्मिक कृति लिखी है उसका नाम है प्रवचनसारभाषा। यह प्रलचनसारभाषा कैसा? क्या है? तो आप समझ लो समयसार नाटक। जैसे समयसार नाटक बनारसीदास जी ने लिखा ना तो कैसे लिखा कुन्दकुन्द आचार्य के समयसार को, अमृतचन्द्राचार्य जी की टीकाओं को, कलशों को पाण्डेय राजमल्ल जी की समयसार कलश टीका को पढ़कर के उन्होंने एक नई रचना तैयार कर दी सवैया बद्ध हिन्दी में, तत्कालीन भाषा में और वो दुनियां भर में प्रसिद्ध हो गई तो उसका नाम रख दिया गया समयसार नाटक। ऐसे ही बिल्कुल वैसे के वैसे ही प्रवचनसारभाषा प्रवचनसार, कुन्दकुन्द आचार्य का, अमृतचन्द्राचार्य की टीका और पाण्डेय हेमराज जी ने हिन्दी टीका उससमय कर दी थी तो पाण्डेय हेमराज जी की हिन्दी टीका इन तीन के सहारे से बहुत सुन्दर पद्यानुवाद, केवल पद्यानुवाद नहीं है उनका इसमें मौलिक चिन्तन भी है और बहुत बढ़िया उन्होंने लिखा है। वैशाख शुक्ला तीज, अक्षयतृतीया को पूर्ण हुआ है। कुल मिलाकर 1094 छंद हैं। 1100 छंदों की करीब-करीब ये रचना है। समयसार में तो कलश बहुत थे। उसके सवैय्या/सवैया बनाना अलग बात थी लेकिन प्रवचनसार जी में तो ऐसे कलश नहीं हैं बहुत कम हैं और वो सब गाथाओं के, टीकाओं के आधार पर ही करना था लेकिन सबसे बड़ी बात ये काम कब किया है उन्होंने जब वो मात्र सोलह साल की उम्र के थे। आप स्वयं उनकी प्रतिभा का अंदाजा लगाइए वृन्दावनदास जी ने प्रलचनसार जी समझ लिया सोलह साल की उम्र में, वे ग्यारह साल के थे, बारह साल के तब तो आए थे बनारस और बनारस में आते ही रोजाना जाने लगे अध्यातम शैली में, अध्यातम शैली में उससमय लगता है चल रहा होगा प्रवचनसार जी प्रवचन में तो वो प्रवचनसार जी को ही बहुत अच्छे से पढ़ लिए और उस प्रवचनसार जी का उन्होंने सोलह साल की उम्र में भाषा बनाना शुरू कर दिया। हालाँकि/हालांकि उन्होंने खुद ही बनाने के बाद में, उन्होंने कहा कि इसमें कई गलतियाँ रह गईं तो दुबारा लिखा फिर तिबारा और फिर तीन बार संशोधित करके ये प्रवचनसारभाषा बनाया है इसको बनाने में कुल मिलाकर बीसों वर्ष लग गए पर शुरू उन्होंने सोलह साल की उम्र में ही कर दिया था और जो ऊपर छंद सुनाया है ना हुए हैं, ना होऐंगे, मुनिन्द कुन्दकुन्द से ये उस प्रवचनसारभाषा में ही लिखा है। उन्होंने कुन्दकुन्द आचार्य की महिमा बताते हुए प्रवचनसारभाषा जी में लिखा है।

वृन्दावनदास जी का योगदान-

छंदशतक में सौ छंदों के माध्यम से लगभग सभी छंदों का परिचय दिया है और सबसे बड़ी और सुन्दर बात कि सभी छंद जैन संस्कृति के हैं। अब जैसे दोहा कैसे बनाया जाएँ? गण कैसे बनाए जाएँ? मात्राएँ कैसे गिनीं जाएँ? गुरु लघु क्या होता है? यगण, मगण, रगण क्या होता है? हर चीज को उन्होंने जैन संस्कृति का उदाहरण दे देकर के जैसे वसंततिलका कैसे बनेगा? तो उन्होंने वसंततिलका का उदाहरण एक जैनछंद बनाकर के बताया है कि ऐसे वसंततिलका छंद बनेगा। ये किताब कोई पढ़ ले तो उसे छंद बनाना आ जाए। मैंने एक बार सेमिनार में “जैनाचार्यों का छंद साहित्य को योगदान” इस पर दश पेज का लेख पढ़ा था। जैनाचार्यों ने छंदशास्त्र पर बहुत ज्यादा काम किया है। नाच्छन्दसि वागुच्चरति। एक आचार्य ने लिखा है कि जो चीज छंद में लिखी हो उसे छंद भंग करके नहीं पढ़ना चाहिए नहीं तो आपको गूँगा बनने का कर्म बँधता है। आप उसे जान बूझकर गलत पढ़ रहे हैं तो आपको ये सुन्दर वाणी नहीं मिलेगी। छंदशास्त्र को पिंगलशास्त्र भी कहते हैं। प्राकृत पिंगलम् एक बहुत विशाल ग्रंथ है आठ सौ पेज का छंदशास्त्र पर तो जैनाचार्यों ने छंदशास्त्र पर बहुत काम किया है। आज जो छंदशास्त्र चलता है ना आज कोई बताता ही नहीं है कि जैनाचार्यों ने छंदशास्त्र पर कितना बड़ा काम किया है लेकिन यह छंदशतक कोई पढ़ ले तो उसे सौ तरह के छंद बनाने आ जाएँ। शतक नाम क्यों है ? क्योंकि सौ तरह के छंद बनाना सिखाया है और अंत में पुस्तक के लिखा है कि मैंने यह पुस्तक अपने पुत्र अजितदास के लिए लिखी है। उसको मैं कविता करना सिखा रहा था तो मैंने सोचा कि अब इनको लिपिबद्ध कर दिया जाए। सौ प्रकार के छंद बनाने की यह विद्या है और इस किताब/पुस्तक में ये लिखा है कि मैंने कब शुरू की और कब खतम की तो ये कुल मिलाकर अठारह दिन में लिख दी। वृन्दावनदास जी की प्रतिभा देखो आप कि उन्होंने अठारह दिन में छंद शतक लिख दिया। फिर इनकी किताब थी एक अर्हत पाषा केवली अभी मौजूद है। 1891 में लिखी है और यह शकुनशास्त्र का बहुत बढ़िया ग्रंथ है और यह संस्कृत ग्रंथ का पद्यानुवाद है किसी पण्डित विनोदीलाल जी के वो हैं। अर्हत पाषा केवली मुझे मिला नहीं। किसी को मिले तो मुझे भेज देना पढ़ेगें। मैं चाहता हूँ कि वृन्दावनदास ग्रन्थावली छपना चाहिए। एक किताब छपनी चाहिए संजय जी सुन रहे हैं। वृन्दावनदास जी की सारी रचनाएँ वृन्दावनदास ग्रन्थावली में आ जानी चाहिए, एक जिल्द में प्रामाणिक रूप से और फिर वो देनी चाहिए शोधार्थियों को, प्रोफेसर्स को। एक रचना का नाम है समवशरण पूजा ये भी मुझे देखने को नहीं मिली। एक समवशरण पूजा पण्डित टोडरमल जी ने भी लिखी है वो हमने देखी है लेकिन वो अलग है। एक रचना है जिसका नाम है वृन्दावनविलास। जैसे- द्यानतविलास, दौलतविलास, बनारसीविलास सब मिलते हैं वैसा का वैसा ही एक वृन्दावनविलास मिलता है। वृन्दावनविलास में क्या है? उनकी अनेक छोटी-मोटी रचनाओं का संग्रह है, कुछ स्तुतियाँ हैं, कुछ भजन हैं और कुछ पत्र हैं। वृन्दावनदास जी ने पाँच पत्र लिखे थे अपनी जिंदगी में, लिखे होंगे बहुत सारे लेकिन इसमें पाँच छपे हैं और उनमें से एक पत्र तो दीवान अमरचन्द को लिखा है। एक पत्र जयचंद जी छाबड़ा को लिखा है। एक पत्र उन्होंने ललितकीर्ति भट्टारक को लिखा है; जब वो मंदिर पर श्वेताम्बरों ने मुकदमा किया तब उससमय भारत में सबसे ज्यादा प्रभावशाली भट्टारक थे ललितकीर्ति तो वृन्दावनदास जी ने उनको भी चिट्ठी लिखी थी कि हमारे मंदिर का श्वेताम्बरीकरण करने का प्रयास हो रहा है इसलिए इस पर ध्यान दिया जाए। ये पाँचों पत्र मैंने आज पढ़े हैं। बहुत बढ़िया बढ़िया पत्र हैं। जयचंद जी छाबड़ा को पत्र लिखा था वो बहुत बढ़िया पत्र लिखा था। उसमें इन्होंने बहुत सारे प्रश्न पूछे थे। वृन्दावनदास जी ने जो पत्र लिखे हैं ना वो काव्यात्मक लिखे हैं और जो जयचंद जी छाबड़ा ने उत्तर लिखा है वो गद्यात्मक लिखा है। मैंने जयचंद जी छाबड़ा के परिचय के समय बता चुका हूँ कि उन्होंने एक प्रश्न ये भी पूछा था कि मुझे संस्कृत सिखा दोगे क्या? उन्होंने एक प्रश्न ये भी पूछा था कि आप मोक्षमार्गप्रकाशक को क्यों नहीं पूरा कर देते हो ? वृन्दावनदास जी ने जयचंद जी छाबड़ा से कहा था कि आप मोक्षमार्गप्रकाशक पूरा करो। कहाँ से बनारस से चिट्ठी आई थी जयपुर कि आप पूरा करो। जितने भी पत्र हैं ना उनमें ऐसा लिखा है कि एक पत्र है ना दीवान अमरचंद जी को जयजिनेन्द्र। दो सौ पैंतीस साल पहले जयजिनेन्द्र शुरू और पत्र के अन्त में बाकी लोगों को हमारी तरफ से जयजिनेन्द्र कहना। मुझे लगा कि हम लोग आपस में आज कहते हैं ना अभिवादन में जयजिनेन्द्र वो आज का चलाया सिस्टम नहीं है। कम से कम वृन्दावनदास जी के समय में भीलोग आपस में जयजिनेन्द्र कहते थे इसका मुझे प्रमाण मिल गया। दीवान अमरचंद जी को भी बहुत बढ़िया पत्र लिखा है वो भी पढ़ने लायक बातें हैं। वृन्दावनविलास में और क्या-क्या है नज़र करते हैं? एक तो जिनेन्द्र स्तुति है, फिर एक जिनवचन स्तुति है फिर एक जिन गुरु स्तुति है। दो-दो, तीन-तीन पेज की हैं और बहुत बढ़िया-बढ़िया स्तुति हैं। जिनवचन स्तुति में जिनवाणी के नाम ले-लेकर के षटखण्डागम की, समयसार की, आदिपुराण की। ऐसे ही एक स्तुति का नाम है आदिपुराण स्तुति। एक स्तुति का नाम है समन्तभद्र। ऐसे जिनगुरु स्तुति में आचार्यों के नाम ले-लेकर के शास्त्रों के नाम ले-लेकर के उनकी महिमा बताई है बहुत अच्छी-अच्छी और उनमें इतिहास भी भरा है। जैसे:-

संघ सहित श्री कुन्दकुन्द गुरु वंदन हेत गए गिरनार

वाद पर्यो तैं संशय मति सौं साखी वदी अंबिकाकार।

सत्य पंथ निर्ग्रंथ दिगम्बर कही सुरी तहाँ प्रगट पुकार

सो गुरुदेव बसो मेरे उर विघ्नहरण मंगल करतार।।

कुन्दकुन्द आचार्य की स्तुति है यह कि कुन्दकुन्द आचार्य एक बार गिरनार पर्वत पर गए थे और वहाँ पर उनका वादविवाद हुआ और वो ही श्वेताम्बर दिगम्बर का वादविवाद है ये और वो कह रहे हैं कि वहाँ पर वादविवाद हुआ तो कोई देवी बीच में निर्णायक बनाई गई तो देवी से पूछा गया कि आप बताओ क्या सही है, प्राचीन धर्म कौनसा है? तो उस देवी ने कहा सत्य पंथ निर्ग्रंथ दिगम्बर कही सुरी तहँ/तहाँ प्रगट पुकार। वो देवी ने प्रगट होकर कही कि सत्य पंथ तो निर्ग्रंथ दिगम्बर है ऐसे कुन्दकुन्द महाराज, गुरुदेव मेरे हृदय में पधारो। ये इन्होंने वृन्दावनविलास में लिखा है। तत्त्वार्थसूत्र जी की स्तुति -

तत्त्वार्थसूत्र नाम उमास्वामी किया हैं।

गुरुदेव ने संक्षेप से क्या काम किया है ।।

जिसमें अपार अर्थ ने विश्राम किया है ।

बुधवृन्द जिस ओर से परणाम किया है।।

वह सूत्र है इस काल में जिनपंथ की पूँजी।

सम्यक्त्व, ज्ञान, भाव है जिस सूत्र की कुंजी।।

लड़ते हैं उसी सूत्र सों परवाद के मूँजी।

फिर हार के हट जाते हैं इक पक्ष के लूँजी।।

संकटमोचन स्तुति भी लिखी है। वृन्दावनदास जी के बारे में एक किंवदंती भी प्रसिद्ध है सच है कि पता नहीं ऐसा कहते हैं कि जो इनके ससुराल में सिक्के बनाने का काम होता था तो एक बार एक अंग्रेज अफसर ने कहा कि आप सिक्के कमजोर बना दो, हमको कमीशन दे दो तो वृन्दावनदास जी ने कहा कि ये नहीं होगा तो वृन्दावनदास जी को अंग्रेज ने जेल में डाल दिया तो वृन्दावनदास जी को एक महीना, पन्द्रह दिन जेल में रहना पड़ा था और ये संकटमोचन स्तुति बोले वो, वहाँ पर श्रीपति जिनवर कुरुणायतनम दुःखहरण तुम्हारा बाना है। ये स्तुति उन्होंने जेल में लिखी थी और इसमें बहुत अच्छी-अच्छी पंक्तियाँ हैं। त्रैकालिक वस्तु प्रत्यक्ष लखो, तुमसों कछु बात ना छाना है। ये सब जगह आपने सुनी होगी स्पीकर/रिकॉर्ड पर बजता रहता है। ऐसे ही अरिहंत स्तुति लिखी है और एक पदावली लिखी है जिसमें अच्छे-अच्छे पद हैं, हालाँकि इनकी पूजाएँ बहुत चलतीं हैं तो भजन इनके ज्यादा सुने नहीं लेकिन थोड़े-से बीस-पच्चीस भजन हैं। जैन पुराण सुनो भवि कानन। ये भजन मुझे बहुत अच्छा लगा। एक भजन यह भी बहुत बढ़िया, श्रीजिन निशिदिन मोहिअदा। एक शीलव्रत की कितनी महिमा है इस पर पच्चीस सवैये लिखे हैं वो बहुत बढ़िया हैं। एक इन्होंने पण्डित चंपाराम थे मथुरा के उनको भी एक पत्र लिखा था वो भी इसमें है।

ज्ञानचन्द स्वभाव की तुमको प्रापति होय।

यह वांछा मेरे रहत, मिटो सकल भ्रम मोह।।

पूजा की कुछ खास बातें -

वृन्दावनदास जी बहुत बड़े विद्वान, बहुत उच्चकोटि के कवि थे। शब्दों के जादूगर थे, वर्णमैत्री।

अतता वितता गतता… कितनी बढ़िया पूजा है।

रंज रहता है कि लोग पूजा का अर्थ नहीं समझते। महावीर पूजन में आता है कितना बढ़िया सुनिए।

गनधर असनिधर चक्रधर, हरधर, गदाधर वरवदा।

अरु चापधर, विद्यासुधर तिरसूलधर सेवहिं सदा।।

दुखहरन आनन्द भरन तारन-तरन चरन रसाल हैं।

सुकुमाल गुनमनिमाल उन्नत, भाल की जयमाल हैं।।

गनधर- गणधर। असनिधर- वज्र। वज्र सौधर्म इन्द्र के पास होता है। चक्रधर- चक्रवर्ती। हलधर- नारायण। गदाधर- प्रतिनारायण। वरवदा- उच्च वक्ता। चापधर- धनुर्धारी। विद्यासुधर- विद्याधर। तिरसूलधारी- त्रिसूलधारी। सेवहिं सदा इसमें कितना भाव भर दिया।

श्री शांतिनाथ पूजन -

श्री शांति जिनेशं नुत शक्रेशं वृष चक्रेशं चक्रेशं।

हनि अरिचक्रेशं हे गुनधेशं, दयामृतेशं मक्रेशं।।

नुत- जिनके चरणों में झुकता है। शक्रेशं- जिसे इन्द्र भी नमस्कार करता है। वृष चक्रेशं- धर्मचक्र के नायक तीर्थंकर। चक्रेशं-चक्रवर्ती। हनि- नष्ट किया। अरिचक्रेशं- अष्टकर्म के समूहों को नष्ट किया। दयामृतेशं- दयारूपी अमृत के स्वामी। मक्रेशं- कामदेव।

श्री चन्द्रप्रभ पूजन -

श्री चन्दनाथ दुति चन्द चरनन चन्द लगे।

मनवचतन जजत अमंद आतमजोति जगे।।

चारुचरन आचरन, चरन चित-हरन-चिन्हचर।

चन्दचन्दतनचरित, चंदथल चहत चतुर नर।।

चतुक चंडचक चूरि, चारि चिद्चक्र गुनाकर।

चंचल चलित-सुरेश, चूलनुत चक्र धनुरधर।।

चर-अचर हितु तारनतरन सुनत चहकि चिरनंद शुचि।

जिन-चंद-चरन चरच्योचहत, चितचकोर नचि रचि रुचि।।

अनुप्रास ये छंद। जिनके चरण भी सुन्दर हैं। जिनका आचरण भी सुन्दर है। जिनका आचरण चित्त को हरने वाला है और जिनका चिन्ह/चिह्न छोटा या आधा चन्द्रमा है और उनका शरीर चन्द्रमा जैसा कान्तिवाला है और ज्ञानी लोग चंदथल(सिद्धशिला/चन्द्रप्रभ भगवान की कल्याणक भूमियाँ) को चाहते हैं। सिद्धशिला चन्द्रमा के आकार की होती है। चूल- मुकुट झुक गया हो। मेरा चित्त रूपी चकोर पक्षी(मन को चकोर की उपमा क्यों दी; क्योंकि चन्दाप्रभु को चन्द्रमा की उपमा दे दी) तो जैसे चकोर चन्द्रमा का इंतजार करता है ऐसे ही मैं भी चन्द्रप्रभ भगवान को देखकर के नाचता हूँ, गाता हूँ रुचि ले-लेकर के।

श्री पार्श्वनाथ पूजन की जयमाला -

केकी कण्ठ समान छवि, वपु उतंग नव हाथ।

लक्षण उरग निहार पग, वन्दूँ पारसनाथ।।

श्री चन्द्रप्रभ पूजन जयमाला-

हे मृगांकअंकित चरण, तुम गुण अगम अपार।

गणधर से नहिं पार लहिं, तौ को वरनत सार।।

पै तुम भगति हिये मम, प्रेरैं अति उमगाय।

तातैं गाऊँ सुगुण तुम, तुम ही होउ सहाय।।

इनकी लयों के कारण पूजाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं।

श्री पार्श्वनाथ पूजन अर्घ्य-

पार्श्वनाथ देवसेव आपकी करूँ सदा…

वर्णमैत्री देखो देव के साथ सेव की।

इसप्रकार बहुत सारी हैं।

वृन्दावनदास जी का काव्य बहुत अद्भुत है। काव्य की प्रतिभा ऐसी है कि चलते-फिरते काव्य बना दें। मुनीम गिरी करते करते काव्य थचना करते थे। नाथूराम प्रेमी का बहुत उपकार है उनके सब साहित्य का उद्धार किया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के साथ-साथ लगभग इनका काल चलता है। जितना इनका काव्य ब्रज भाषा में है उतना ही खड़ी बोली में भी है। जबकि खड़ी बोली केवल इन्दोर में खड़ी हो रही थी। जयपुर की शैली के साथ बहुत गहरा संबंध है जिसके कारण अध्यात्म की बहुत गहरी ललक है इनके अंदर ये गहरी ललक जब हम प्रवचनसारभाषा को पढ़ेंगे तो दिखाई देगी। वृन्दावनदास जी के ही मित्र बनारस में देवीदास जी थे अच्छे मित्र थे और एक ही ऑफिस में काम करते थे। इन टीकाओं को सामने रखकर तुलनात्मक शोध किया जा सकता है। वृन्दावनदास जी बीसपंथी थे। आगम और अध्यात्म ही अंदर में हैं ये इनको पढ़कर समझ में आता है। वृन्दावनदास जी का झुकाव अचित्त या सचित्त? उन्होंने स्वीकार किया। अल्पारम्भ में पूजा हो जाए वो उचित है। सदासुखदास जी का काल भी समकालीन था। विद्वान पहले जेल भी गए हैं।

शील माहात्म्य ग्रंथ में शील वत्र के बारे में जानकारी मिलती है।

आदरणीय वीरसागरजी भाईसाहब के प्रवचन से संकलित
जैन हीरोज सीरीज

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bahut hi sundar… vrandavan das ji ka manglashtak bhi hai … kya ap use share kar sakte hai.
Jai Jinendra.