वीतरागता हो सर जिसके , तीन लोक में पूज्य वही
राज्य ना वैभव ना संग लक्ष्मी , उस समान कोई दूज नहीं
यूँ तो हमने भी देखे हैं लाखों, वीतराग के भेष में
बाह्य निःसंघ अंतर में संघ , पड़े हैं जग के क्लेश में
वीतराग का अर्थ नहीं यह , राग हो किंचित् मन में भी
वीतराग का अर्थ नहीं यह , संघ को किंचित् तन में भी
वीतरागता वह आभूषण, जिसको नत त्रिलोक मही
वीतरागता वह आभूषण , जिस समान कोई और नहीं
जिसने ध्याया निज आतम को , उसने विरागता इष्ट कही है
और हो विरागता जिसका भूषण , तीन लोक में श्रेष्ठ वही है ।।
रचनाकार: आयुष कुमार जैन (Ayush kumar Jain), दमोह
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