वीतराग-विज्ञान पाठमाला भाग-२ | Vitrag Vigyan Pathmala Part- 2

लेखक व सम्पादक :

डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल शास्त्री,
न्यायतीर्थ, साहित्यरत्न, एम. ए., पी-एच. डी. संयुक्त मंत्री,
पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट , जयपुर

प्रकाशक :

श्री मगनमल सौभागमल पाटनी फेमिली चेरिटेबल ट्रस्ट , बम्बई
एवं
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट ए-४, बापूनगर, जयपुर - 302015.

विषय-सूची/Contents:

  • उपासना ( देव-शास्त्र-गुरु पूजन)
  • देव-शास्त्र-गुरु
  • सात तत्त्वों सम्बन्धी भूल
  • चार अनुयोग
  • तीन लोक
  • सप्त व्यसन
  • अहिंसा : एक विवेचन
  • अष्टाह्निका महापर्व
  • भगवान पार्श्वनाथ
  • देव-शास्त्र-गुरु स्तुति

पाठ 1 : उपासना

देव-शास्त्र-गुरु पूजन
श्री जुगलकिशोरजी ‘युगल’ (एम. ए., साहित्यरत्न, कोटा)

प्रश्न -

  1. चंदन और नैवेद्य के छंदों को लिखकर उनका भाव अपने शब्दों में लिखिए।
  2. जयमाला में क्या वर्णन है ? संक्षेप में लिखें।
  3. संसार भावना व संवर भावना वाले छंद लिखकर उनका भाव समझाइये।

पाठ 2 : देव-शास्त्र-गुरु

आचार्य समन्तभद्र ( व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व)

लोकैषणा से दूर रहने वाले स्वामी समन्तभद्र का जीवनचरित्र एक तरह से अज्ञात ही है। जैनाचार्यों की यह विशेषता रही है कि महान कार्यों के करने के बाद भी उन्होंने अपने बारे में कहीं कुछ नहीं लिखा है। जो कुछ थोड़ा बहुत प्राप्त है, वह पर्याप्त नहीं।

आप कदम्ब राजवंश के क्षत्रिय राजकुमार थे। आपके बाल्यकाल का नाम शान्ति वर्मा था। आपका जन्म दक्षिण भारत में कावेरी नदी के तट पर स्थित उरगपुर नामक नगर में हुआ था। आपका अस्तित्व विक्रम सं. 138 तक था।

आपके पारिवारिक जीवन के सम्बन्ध में कुछ भी ज्ञात नहीं है। आपने अल्पवय में ही मुनि दीक्षा धारण करली थी। दिगम्बर जैन साधु होकर आपने घोर तपश्चरण किया और अगाध ज्ञान प्राप्त किया।

आप जैन सिद्धान्त के तो अगाध मर्मज्ञ थे ही; साथ ही तर्क, न्याय, व्याकरण, छन्द, अलंकार, काव्य और कोष के भी अद्वितीय पण्डित थे। आपमें बेजोड़ वाद-शक्ति थी। आपने कई बार घूम-घूम कर कुवादियों का गर्व खण्डित किया था। आपके आत्मविश्वास को निम्न पंक्तियों में देखा जा सकता :-

" वादार्थी विचराम्यहं नरपते शार्दू लविक्रीड़ितम्।”
( “हे राजन् ! मैं वाद के लिये सिंह की तरह विचरण कर रहा हूँ।")

“राजन् यस्यास्ति शक्तिःस वदतु पुरतो जैन निर्ग्रन्थवादी।”
(" मैं जैन निर्ग्रन्थवादी हूँ। जिसकी शक्ति हो मेरे सामने बोले| ")

आपके परवर्ती प्राचार्यों ने आपका स्मरण बड़े ही सन्मान के साथ किया है। आपकी आद्य-स्तुतिकार के रूप में प्रसिद्धि है। आपने स्तोत्र-साहित्य को प्रौढ़ता प्रदान की है। आपकी स्तुतियों में बड़े-बड़े गंभीर न्याय भरे हुए हैं।

आपने आप्तमीमांसा, तत्त्वानुशासन, युक्त्यनुशासन, स्वयंभू स्तोत्र, जिनस्तुति शतक, रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्राकृत व्याकरण, प्रमाण पदार्थ, कर्म प्राभृत टीका और गंधहस्ति महाभाष्य (अप्राप्य ) नामक ग्रंथों की रचना की है।

प्रस्तुत ग्रंश रत्नकरण्ड श्रावकाचार के प्रथम अध्याय के आधार पर लिखा गया है।


आधार - रत्नकरण्ड श्रावकाचार

देव की परिभाषा

प्राप्तेनोछिन्नदोषेण, सर्वज्ञेनागमेशिना |
भवितव्यं नियोगेन, नान्यथा ह्याप्तता भवेत् ||5||
क्षुत्पिपासाजरातंकजन्मान्तकभयस्मयाः |
न रागद्वेषमोहाश्च यस्याप्तः स प्रकीर्त्यते ||6||

शास्त्र की परिभाषा

आप्तोपज्ञमनुल्लङ्घ्य,- मदृष्टेष्टविरोधकम् |
तत्त्वोपदेशकृत-सार्वं, शास्त्रं कापथघट्टनम् ||9||

गुरु की परिभाषा

विषयाशावशातीतो, निरारंभोऽपरिग्रहः |
ज्ञानध्यानतपोरक्तस्तपस्वी स प्रशस्यते ||10||


देव-शास्त्र-गुरु

सुबोध - क्यों भाई, इतने सुबह ही सन्यासी बने कहाँ जा रहे हो ?
प्रबोध - पूजन करने जा रहा हूँ। आज चतुर्दशी है न! मैं तो प्रत्येक अष्टमी और चतुर्दशी को पूजन अवश्य करता हूँ।

सुबोध - क्यों जी! किसकी पूजन करते हो तुम?
प्रबोध - देव , शास्त्र और गुरु की पूजन करता हूँ।

सुबोध - किस देवता की?
प्रबोध - जैन धर्म में व्यक्ति की मुख्यता नहीं है। वह व्यक्ति के स्थान पर गुणों की पूजा में विश्वास रखता है।

सुबोध - अच्छा तो देव में कौन-कौन से गुण होने चाहिए ?
प्रबोध - सच्चा देव वही है जो वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी हो। जो किसी से न तो राग ही करता हो और न द्वेष, वही वीतरागी कहलाता है। वीतरागी के जन्म-मरण आदि 18 दोष नहीं होते, उसे भूख-प्यास भी नहीं लगती; समझ लो उसने समस्त इच्छाओं पर ही विजय पा ली है।

सुबोध - वीतरागी तो समझा पर सर्वज्ञता क्या चीज है ?
प्रबोध - जो सब कुछ जानता है, वही सर्वज्ञ है। जिसके ज्ञान का पूर्ण विकास हो गया है, जो तीन लोक की सब बातें-जो भूतकाल में हो गई, वर्तमान में हो रही हैं और भविष्य में होंगी-उन सब बातों को एक साथ जानता हो, वही सर्वज्ञ है।

सुबोध - अच्छा तो बात यह रही कि जो राग-द्वेष ( पक्षपात) रहित हो और पूर्ण ज्ञानी हो, वही सच्चा देव है।
प्रबोध - हाँ! बात तो यही है; वह जो भी उपदेश देगा वह सच्चा और अच्छा होगा। उसका उपदेश हित करने वाला होने से ही उसे हितोपदेशी कहा जाता है।

सुबोध - उसका उपदेश सच्चा और अच्छा क्यों होगा ?
प्रबोध - झूठ तो अज्ञानता से बोला जाता है। जब वह सब कुछ जानता है तो फिर उसकी वाणी सच्ची ही होगी तथा उसे जब राग-द्वेष नहीं तो वह बुरी बात क्यों कहेगा, अतः उसका उपदेश अच्छा भी होगा।

सुबोध - देव तो समझा पर शास्त्र किसे कहते हैं ?
प्रबोध - उसी देव की वाणी को शास्त्र कहते हैं। वह वीतराग है, अतः उसकी वाणी भी वीतरागता की पोषक होती है। राग को धर्म बताये वह वीतराग की वाणी नहीं। उसकी वाणी में तत्त्व का उपदेश आता है। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें कहीं भी तत्त्व का विरोध नहीं आता है।

सुबोध - इसके पढ़ने से लाभ क्या है ?
प्रबोध - जीव खोटे रास्ते चलने से बच जाता है और उसे सही रास्ता प्राप्त हो जाता है।

सुबोध - ठीक रहा। देव और शास्त्र तो तुमने समझा दिया और गुरुजी तो अपने मास्टर साहब हैं ही।
प्रबोध - पगले! मास्टर साहब तो विद्यागुरु हैं। उनका भी आदर करना चाहिए।पर जिन गुरु की हम पूजा करते हैं। वे तो नग्न दिगम्बर साधु होते हैं।

सुबोध - अच्छा तो मुनिराज को गुरु कहते हैं यह क्यों नहीं कहते ? सीधी सी बात है, जो नग्न रहते हों वे गुरु कहलाते हैं।
प्रबोध - तुम फिर भी नहीं समझे। गुरु नग्न रहते हैं यह तो सत्य है, पर नग्न रहने मात्र से कोई गुरु नहीं हो जाता। उनमें और भी बहुत सी अच्छी बातें होती हैं। वे भगवान की वाणी के मर्म को जानते हैं।

सुबोध - अच्छा और कौन-कौन सी बातें उनमें होती हैं ?
प्रबोध - वे सदा आत्म-ध्यान, स्वाध्याय में लीन रहते हैं। सर्व प्रकार के प्रारम्भ-परिग्रह से सर्वथा रहित होते हैं। विषय-भोगों की लालसा उनमें लेशमात्र भी नहीं होती। ऐसे तपस्वी साधुओं को गुरु कहते हैं।

सुबोध- वे ज्ञानी भी होते होंगे?
प्रबोध - क्या बात करते हो, बिना आत्मज्ञान के कोई मुनि बन ही नहीं सकता।

सुबोध - तो आत्मज्ञान के बिना यह क्रियाकाण्ड (बाह्याचरण या व्यवहार चारित्र) सब बेकार है क्या ?
प्रबोध - सुनों भाई! मूल वस्तु तो आत्मा को समझ कर उसमें लीन होना है। आत्मविश्वास (सम्यग्दर्शन), आत्मज्ञान (सम्यग्ज्ञान) और आत्मलीनता ( सम्यक्चारित्र) जिसमें हो तथा जिसका बाह्याचरण भी आगमानुकूल हो, वास्तव में सच्चा गुरु तो वही है।

सुबोध - तो तुम इनकी ही पूजन करने जाते होंगे। हम भी चला करेंगे, पर यह तो बताओ इससे हमें मिलेगा क्या ?
प्रबोध - फिर तुमने नासमझी की बात की। पूजा इसलिए की जाती है कि हम भी उन जैसे बन जावें। वे सब कुछ छोड़ गये, उनसे संसार का कुछ माँगना कहाँ तक ठीक है ?

सुबोध - अच्छा ठीक है, कल से हमें भी ले चलना।

प्रश्न

  1. पूजन किसकी और क्यों करना चाहिये ?
  2. सच्चा देव किसे कहते हैं ?
  3. शास्त्र किसे कहते हैं ? उसकी सच्चाई का आधार क्या हैं ?
  4. गुरु किसे कहते है ? उनकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए। क्या विद्यागुरु गुरु नहीं हैं ?
  5. संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए - वीतराग, सर्वज्ञ, हितोपदेशी
  6. आचार्य समन्तभद्र के व्यक्तित्व और कर्त्तत्व पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए ?

पाठ 3 : सात तत्त्वों संबंधी भूल

अध्यात्मप्रेमी पण्डित दौलतरामजी

व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व (विक्रम संवत् 1855-1923)

अध्यात्म-रस में निमग्न रहने वाले, उन्नीसवीं सदी के तत्त्वदर्शी विद्वान कविवर पं. दौलतरामजी पल्लीवाल जाति के नररत्न थे। आपका जन्म अलीगढ़ के पास सासनी नामक ग्राम में हुआ। बाद में आप कुछ दिन अलीगढ़ भी रहे थे। आपके पिता का नाम टोडरमलजी था।

आत्मश्लाघा से दूर रहने वाले इन महान् कवि का जीवन-परिचय पूर्णतः प्राप्त नहीं है। पर वे एक साधारण गृहस्थ थे एवं सरल स्वभावी, आत्मज्ञानी पुरुष थे।

आपके द्वारा रचित ग्रंथ छहढ़ाला जैन समाज का बहुप्रचलित एवं समादृत ग्रन्थरत्न है। शायद ही कोई जैनी भाई हो जिसने छहढाला का अध्ययन न किया हो। सभी जैन परिक्षा बोर्डों के पाठ्यक्रम में इसे स्थान प्राप्त है।

इसकी रचना आपने विक्रम संवत् 1891 में की थी। आपने इसमें गागर में सागर भरने का सफल प्रयत्न किया है। इसके अलावा आपने कई स्तुतियाँ एवं अध्यात्म-रस से ओतप्रोत अनेक भजन लिखे हैं, जो आज भी सारे भारतवर्ष के मंदिरों और शास्त्र सभागों में बोले जाते हैं। आपके भजनों में मात्र भक्ति ही नहीं, गूढ तत्त्व भी भरे हुए हैं।

भक्ति और अध्यात्म के साथ ही आपके काव्य में काव्योपादान भी अपने प्रौढ़तम रूप में पाये जाते हैं। भाषा सरल, सुबोध और प्रवाहमयी है, भर्ती के शब्दों का प्रभाव है। आपके पद हिन्दी गीत साहित्य के किसी भी महारथी के सम्मुख बड़े ही गर्व के साथ रखे जा सकते हैं।

प्रस्तुत पाठ आपकी प्रसिद्ध रचना छहढाला की दूसरी ढाल पर आधारित है।


सात तत्त्वों सम्बम्धी भूल

जीवादि सात तत्त्वों को सही रूप में समझे बिना सम्यग्दर्शन की प्राप्ति नहीं हो सकती है। अनादिकाल से जीवों को इनके सम्बन्ध में भ्रान्ति रही है। यहाँ पर संक्षिप्त में उन भूलों को स्पष्ट किया जाता है।

जीव और अजीवतत्त्व सम्बन्धी भूल

जीव का स्वभाव तो जानने-देखने रूप ज्ञान-दर्शनमय है और पुद्गल से बने हुए शरीरादि-वर्ण, गंध, रस और स्पर्शवाले होने से मूर्तिक हैं। धर्म द्रव्य , अधर्म द्रव्य, काल द्रव्य और आकाश द्रव्य के अमूर्तिक होने पर भी जीव की परिणति इन सबसे जुदी है, किन्तु फिर भी यह आत्मा इस भेद को न पहिचान कर शरीरादि की परिणति को आत्मा की परिणति मान लेता है।

अपने ज्ञान स्वभाव को भूलकर शरीर की सुन्दरता से अपने को सुन्दर और कुरूपता से कुरूप मान लेता है तथा उसके सम्बन्ध से होने वाले पुत्रादिक में भी आत्म-बुद्धि करता है। शरीराश्रित उपवासादि और उपदेशादि क्रियाओं में भी अपनापन अनुभव करता है।

शरीर की उत्पत्ति से अपनी उत्पत्ति मानता है और शरीर के बिछुड़ने पर अपना मरण मानता है। यही इसकी जीव और अजीव तत्त्व के सम्बन्ध में भूल है।

जीव को अजीव मानना जीव तत्त्व सम्बन्धी भूल है और अजीव को जीव मानना अजीव तत्त्व सम्बन्धी भूल है।

आस्त्रव तत्त्व सम्बन्धी भूल

राग-द्वेष-मोह आदि विकारी भाव प्रकट में दुःख को देने वाले हैं, पर यह जीव इन्हीं का सेवन करता हुआ अपने को सुखी मानता है। कहता है कि शुभराग तो सुखकर है, उससे तो पुण्य बन्ध होगा, स्वर्गादिक सुख मिलेगा; पर यह नहीं सोचता कि जो बन्ध का कारण है, वह सुख का कारण कैसे होगा तथा पहली ढाल में तो साफ ही बताया है कि स्वर्ग में सुख हैं कहाँ ?

जब संसार में सुख है ही नहीं तो मिलेगा कहाँ से ? अतः जो शुभाशुभ राग प्रकट दुःख का देने वाला है, उसे सुखकर मानना ही आस्त्रवतत्त्व सम्बन्धी भूल है।

बन्धतत्त्व सम्बन्धी भूल

यह जीव शुभ कर्मों के फल में राग करता है और अशुभ कर्मों के फल में द्वेष करता है जबकि शुभ कर्मों का फल है भोग-सामग्री की प्राप्ति और भोग दुःखमय ही हैं, सुखमय नहीं। अतः शुभ और अशुभ दोनों ही कर्म वास्तव में संसार का कारण होने से हानिकारक हैं और मोक्ष तो शुभ-अशुभ बंध के नाश से ही होता है-यह नहीं जानता है, यही इसकी बंध तत्त्व सम्बन्धी भूल है।

संवरतत्त्व सम्बन्धी भूल

आत्मज्ञान और आत्मज्ञान सहित वैराग्य संवर है और वे ही आत्मा को सुखी करने वाले हैं, उन्हें कष्टदायी मानता है। तात्पर्य यह है कि सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति और वैराग्य की प्राप्ति कष्टदायक है - ऐसा मानता है। यह उसे पता ही नहीं कि ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति आनंदमयी होती है, कष्टमयी नहीं। उन्हें कष्ट देने वाला मानना ही संवरतत्त्व सम्बन्धी भूल है।

निर्जरातत्त्व सम्बन्धी भूल

आत्मज्ञानपूर्वक इच्छाओं का प्रभाव ही निर्जरा है और वही आनंदमय है। उसे न जानकर एवं आत्मशक्ति को भूलकर इच्छाओं की पूर्ति में ही सुख मानता है और इच्छाओं के प्रभाव को सुख नहीं मानता है, यही इसकी निर्जरातत्त्व सम्बन्धी भूल है।

मोक्षतत्त्व सम्बन्धी भूल

मुक्ति में पूर्ण निराकुलता रूप सच्चा सुख है, उसे तो जानता नहीं और भोग सम्बन्धी सुख को ही सुख मानता है और मुक्ति में भी इसी जाति के सुख की कल्पना करता है, यही इसकी मोक्षतत्त्व सम्बन्धी भूल है।

जब तक इन सातों तत्त्व सम्बन्धी भूलों को न निकाले, तब तक इसको सच्चा सुख प्राप्त करने का मार्ग प्राप्त नहीं हो सकता है।

आधार

चेतन को है उपयोग रूप, चिन्मूरत बिनमूरत अनूप।
पुद्गल नभ धर्म अधर्म काल, इनतें न्यारी है जीव चाल।
ताको न जान विपरीत मान, करि करें देह में निज पिछान।
मैं सुखी-दुःखी मैं रंक-राव, मेरे धन गृह गोधन प्रभाव।
मेरे सुत-तिय मैं सबल-दीन, बेरूप-सुभग मूरख-प्रवीन।
तन उपजत अपनी उपज जान, तन नशत प्रापको नाश मान।
रागादि प्रकट जे दुःख दैन, तिनहीं को सेवत गिनत चैन।
शुभ-अशुभ बंध के फल मँझार,रति-प्ररति करें निजपद विसार।
आतम-हित हेतु विराग-ज्ञान , ते लखें आपको कष्टदान।
रोकी न चाह निज शक्ति खोय, शिवरूप निराकुलता न जोय।
(छहः ढ़ाला, दूसरी ढ़ाल , छन्द 2 से 7 तक)

प्रश्न -

  1. जीव और अजीव तत्त्व के सम्बन्ध में इस जीव ने किस प्रकार की भूल की है?
  2. “हम शुभ-भाव करेंगे तो सुखी होंगे", ऐसा मानने में किस तत्त्व सम्बन्धी भूल हुई ?
  3. " तत्त्वज्ञान प्राप्त करना कष्टकर हैं", क्या यह बात सही है ? यदि नहीं, तो क्यों ?
  4. “जैसा सुख हमें है वैसा ही उससे कई गुणा मुक्त जीवों का हैं", ऐसा मानने में क्या बाधा है ?
  5. “यदि परस्पर प्रेम (राग) करोगे तो आनन्द में रहोगे”, क्या यह मान्यता ठीक है?

पाठ 4 : चार अनुयोग

आचार्यकल्प पण्डित टोडरमलजी (व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व)

आचार्यकल्प पंडित टोडरमलजी के पिता श्री जोगीदासजी खण्डेलवाल दि. जैन गोदीका गोत्रज थे और माँ थी रंभाबाई। वे विवाहित थे। उनके दो पुत्र थे- हरिश्चन्द्र और गुमानीराम। गुमानीराम महान् प्रतिभाशाली और उनके समान ही क्रांतिकारी थे। यद्यपि पंडितजी का अधिकांश जीवन जयपुर में ही बीता, किन्तु उन्हें अपनी आजीविका के लिए कुछ समय सिंघाणा अवश्य रहना पड़ा था। वे वहाँ दिल्ली के एक साहूकार के यहाँ कार्य करते थे।

“परम्परागत मान्यतानुसार उनकी आयु 27 वर्ष की मानी जाती है, किन्तु उनकी साहित्य-साधना, ज्ञान व नवीनतम प्राप्त उल्लेखों तथा प्रमाणों के आधार पर यह निश्चित हो चुका है कि वे 47 वर्ष तक अवश्य जीवित रहे। उनकी मृत्यु-तिथि वि. सं. 1823-24 लगभग निश्चित है, अत: उनका जन्म वि. सं. 1776-77 में होना चाहिए।" (पं. टोडरमल : व्यक्तित्व और कर्तृत्व; डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल)

उन्होंने अपने जीवन में छोटी-बड़ी बारह रचनाएँ लिखीं, जिनका परिमाण करीब एक लाख श्लोक प्रमाण है, पाँच हजार पृष्ठों के करीब। इनमें कुछ तो लोकप्रिय ग्रंथों की विशाल प्रामाणिक टीकाएँ हैं और कुछ हैं स्वतंत्र रचनाएँ। वे गद्य और पद्य दोनों रूपों में पाई जाती हैं :

(1) मोक्षमार्ग प्रकाशक ( मौलिक)
(7) गोम्मटसार जीवकांड भाषा टीका
(2) रहस्यपूर्ण चिठ्ठी ( मौलिक)
(8) गोम्मटसार कर्मकांड भाषा टीका /
(3) गोम्मटसार पूजा ( मौलिक)
(9) अर्थसंदृष्टि अधिकार
(4) समोशरण रचना वर्णन (मौलिक)
(10) लब्धिसार भाषा टीका
(5) पुरुषार्थसिद्धयुपाय भाषा टीका
(11) क्षपणासार भाषा टीका
(6) आत्मानुशासन भाषा टीका
(12) त्रिलोकसार भाषा टीका

आपके सम्बन्ध में विशेष जानकारी के लिये " पंडित टोडरमल: व्यक्तित्व और कर्तृत्त्व” नामक ग्रंथ देखना चाहिए। प्रस्तुत पाठ मोक्ष-मार्ग प्रकाशक के अष्टम अधिकार के आधार पर लिखा गया है।


चार अनुयोग

छात्र - मोक्षमार्गप्रकाशक में किसकी कहानी है ?
अध्यापक - मोक्षमार्गप्रकाशक में कहानी थोड़े हो हैं, उसमें तो मुक्ति का मार्ग बताया गया है।

छात्र - अच्छा तो मोक्षमार्ग प्रकाशक क्या शास्त्र नहीं है ?
अध्यापक - क्यों?

छात्र - शास्त्र में तो कथायें होती हैं। हमारे पिताजी तो कहते थे कि मन्दिर चला करो, शाम को वहाँ शास्त्र बँचता है, उसमें अच्छी अच्छी कहानियाँ निकलती हैं।
अध्यापक - हाँ! हाँ!! शास्त्रों में महापुरुषों की कथायें भी होती हैं। जिन शास्त्रों में महापुरुषों के चरित्रों द्वारा पुण्य-पाप के फल का वर्णन होता है और अंत में वीतरागता को हितकर बताया जाता है, उन्हें प्रथमानुयोग के शास्त्र कहते हैं।

छात्र - तो क्या शास्त्र कई प्रकार के होते हैं ?
अध्यापक - शास्त्र तो जिनवाणी को कहते हैं, उसमें तो वीतरागता का पोषण होता है। उसके कथन करने की विधियाँ चार हैं; जिन्हें अनुयोग कहते हैं - प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग।

छात्र - हमें तो कहानियों वाला शास्त्र ही अच्छा लगता है, उसमें खूब आनन्द आता है।
अध्यापक - भाई! शास्त्र की अच्छाई तो वीतरागतारूप धर्म के वर्णन में है, कोरी कहानियों में नहीं।

छात्र - तो फिर यह कथाएँ शास्त्रों में लिखी ही क्यों हैं ?
अध्यापक - तुम ही कह रहे थे कि हमारा मन कथाओं में खूब लगता है। बात यही है कि रागी जीवों का मन केवल वैराग्य-कथन में लगता नहीं। अत: जिस प्रकार बालक को पतासे के साथ दवा देते हैं, उसी प्रकार तुच्छ बुद्धि जीवों को कथाओं के माध्यम से धर्म ( वीतरागता) में रुचि करातें हैं और अंत में वैराग्य का ही पोषण करते हैं।

छात्र - अच्छा! यह बात है। यह पुराण और चरित्र-ग्रंथ प्रथमानुयोग में ही पाते होंगे। करणानुयोग में किस बात का वर्णन होता है?
अध्यापक - करणानुयोग में गुणस्थान, मार्गणास्थान आदि रूप तो जीव का वर्णन होता है और कर्मों तथा तीनों लोकों का भूगोल सम्बन्धी वर्णन होता है। इसमें गणित की मुख्यता रहती है, क्योंकि गणना और नाप का वर्णन होता है न!

छात्र - यह तो कठिन पड़ता होगा ?
अध्यापक - पड़ेगा ही, क्योंकि इसमें प्रति सूक्ष्म केवलज्ञानगम्य बात का वर्णन होता है। गोम्मटसार जीवकाण्ड, गोम्मटसार कर्मकाण्ड, लब्धिसार और त्रिलोकसार ऐसे ही ग्रन्थ हैं।

छात्र - चरणानुयोग सरल पड़ता होगा?
अध्यापक - हाँ! क्योंकि इसमें अति सूक्ष्म बुद्धिगोचर कथन होता है। इसमें सुभाषित, नीति-शास्त्रों की पद्धति मुख्य है, क्योंकि इसमें गृहस्थ और मुनियों के आचरण नियमों का वर्णन होता है। इस अनुयोग में जैसे भी यह जीव पाप छोड़कर धर्म में लगे अर्थात् वीतरागता में वृद्धि करे वैसे ही अनेक युक्तियों से कथन किया जाता है।

छात्र - तो रत्नकरण्ड श्रावकाचार इसी अनुयोग का शास्त्र होगा ?
अध्यापक - हाँ! हाँ!! वह तो है ही। साथ ही मुख्यतया पुरुषार्थ-सिद्धियुपाय आदि और भी अनेक शास्त्र हैं।

छात्र - तो क्या समयसार और द्रव्यसंग्रह भी इसी अनुयोग के शास्त्र हैं ?
अध्यापक - नहीं! वे तो द्रव्यानुयोग के शास्त्र हैं; क्योंकि षट् द्रव्य, सप्त तत्त्व आदि का तथा स्व पर भेद-विज्ञान आदि का वर्णन तो द्रव्यानुयोग में होता है।

छात्र - इसमें भी करणानुयोग के समान केवलज्ञानगम्य कथन होता होगा ?
अध्यापक - नहीं! इसमें तो चरणानुयोग के समान बुद्धिगोचर कथन होता है, पर चरणानुयोग में बाह्य क्रिया की मुख्यता रहती है और द्रव्यानुयोग में आत्म-परिणामों की मुख्यता से कथन होता है। द्रव्यानुयोग में न्यायशास्त्र की पद्धति मुख्य है।

छात्र - इसमें न्यायशास्त्र की पद्धति मुख्य क्यों है ?
अध्यापक - क्योंकि इसमें तत्त्व निर्णय करने की मुख्यता है। निर्णय युक्ति और न्याय बिना कैसे होगा?

छात्र - कुछ लोग कहते हैं कि अध्यात्म-शास्त्र में बाह्याचार को हीन बताया है, उसको पढ़कर लोग आचारभ्रष्ट हो जायेंगे। क्या यह बात सच है ?
अध्यापक - द्रव्यानुयोग में आत्मज्ञानशून्य कोरे बाह्याचार का निषेध किया है, पर स्थान-स्थान पर स्वच्छंद होने का भी तो निषेध किया है। इससे तो लोग आत्मज्ञानी बनकर सच्चे व्रती बनेंगे।

छात्र - यदि कोई अज्ञानी भ्रष्ट हो जाय तो?
अध्यापक - यदि गधा मिश्री खाने से मर जाय तो सज्जन तो मिश्री खाना छोड़े नहीं, उसी प्रकार यदि अज्ञानी तत्त्व की बात सुनकर भ्रष्ट हो जाय तो ज्ञानी तो तत्त्वाभ्यास छोड़े नहीं; तथा वह तो पहिले भी मिथ्यादृष्टि था, अब भी मिथ्यादृष्टि ही रहा। इतना ही नुकसान होगा कि सुगति न होकर कुगति होगी, रहेगा तो संसार का संसार में ही। परन्तु अध्यात्म-उपदेश न होने पर बहुत जीवों के मोक्षमार्ग का प्रभाव होता है और इसमें बहुत जीवों का बहुत बुरा होता है, अतः अध्यात्म-उपदेश का निषेध नहीं करना।

छात्र - जिनसे खतरे की आशंका हो, वे शास्त्र पढ़ना ही क्यों ? उन्हें न पढ़े तो ऐसी क्या हानि है ?
अध्यापक - मोक्षमार्ग का मूल उपदेश तो अध्यात्म शास्त्रों में ही है, उनके निषेध से मोक्षमार्ग का निषेध हो जायगा।

छात्र - पर पहिले तो उन्हें न पढ़े ?
अध्यापक - जैन धर्म के अनुसार तो यह परिपाटी है कि पहले द्रव्यानुयोगानुसार सम्यग्दृष्टि हो, फिर चरणानुयोगानुसार व्रतादि धारण कर व्रती हो। अत: मुख्यरूप से तो निचली दशा में ही द्रव्यानुयोग कार्यकारी है।

छात्र - पहिले तो प्रथमानुयोग का अभ्यास करना चाहिये ?
अध्यापक - पहिले इसका अभ्यास करना चाहिये, फिर उसका, ऐसा नियम नहीं है। अपने परिणामों की अवस्था देखकर जिसके अभ्यास से अपनी धर्म में रुचि और प्रवृत्ति बढ़े, उसी का अभ्यास करना अथवा कभी इसका, कभी उसका, इस प्रकार फेर-बदल कर अभ्यास करना चाहिये। कई शास्त्रों में तो दो-तीन अनुयोगों की मिली पद्धति से भी कथन होता है।

प्रश्न -

  1. अनुयोग किसे कहते हैं ? वे कितने प्रकार के हैं ?
  2. पं. टोडरमलजी के अनुयोगों का अभ्यासक्रम क्या है ?
  3. द्रव्यानुयोग का अभ्यास क्यों आवश्यक हैं ? उसमें किस पद्धति से किस बात का वर्णन होता है ?
  4. चरणानुयोग और करणानुयोग में क्या अन्तर हैं ?
  5. प्रत्येक अनुयोग के कम से कम दो-दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
  6. पं. टोडरमलजी के संबंध में अपने विचार व्यक्त कीजिए ?