स्याद्वाद अनेकान्त अरु जामे पुष्पित है पुष्प।
इन पुष्पों से पुष्पित जिनवाणी का बाग।।
व्यवहार और निश्चय में फँसा है संसार।
सब विवादों का करता नाश स्याद्वाद सिद्धान्त।।
जिनवाणी का मूल है स्याद्वाद अरु अनेकान्त।
स्यात् सिद्धान्त से जग में जैन धर्म की जान॥
वस्तु-स्वरूप धर्म का निरूपण करना काम।
एकान्त का कर खंडन पाता स्याद्वाद नाम।।
जग के सब विवादों का मूल है कथन एकान्त।
सब विवादों का हल है स्याद्वाद अनेकान्त।।
चन्द्र के सम उज्ज्वल स्याद्वादमय अंकित।
चन्द्र की चाँदनी कमल करती ज्यों प्रमुदित।।
उस तरह सब जीवों के तापों को कर शान्त।
अज्ञान तम को दूर कर करती निर्मल ज्ञान॥
एकान्त कथन करना ही जिनमत में मिथ्यात्व।
अनेकान्त में स्यात् कथन जिनमत में सम्यक्त्व।।
वस्तु स्वभाव का कथन जिनवाणी में होय।
स्यात् अरु अनेकान्त से जिनवाणी समझाय।।
अपेक्षाकृत कथन से,कर विवाद का अंत।
विश्व शान्ति का मूल है स्याद्वाद अनेकांत।।
स्याद्वाद को आत्मसात् कर भवतरू हो जा पार।
विश्व दर्शन में स्यात् से जिनमत की पहचान॥
AJ
रचनाकार: रितेश जैन, बांसवाड़ा