थी धन्य घड़ी जब निज ज्ञायक की, महिमा मैंने पहिचानी।
हे वीतराग सर्वज्ञ महा-उपकारी, तव पूजन ठानी ।।१।।
सुख हेतु जगत् में भ्रमता था, अन्तर में सुख सागर पाया।
प्रभु निजानन्द में लीन देख, मोय यही भाव अब उमगाया ॥२॥
पूजा का भाव विसर्जन कर, तुमसम ही निज में थिर होऊँ।
उपयोग नहीं बाहर जावे, भव क्लेश बीज अब नहिं बोऊँ ॥३॥
पूजा का किया विसर्जन प्रभु, और पाप भाव में पहुँच गया।
अब तक की मूरखता भारी, तज नीम हलाहल हाय पिया ॥४॥
ये तो भारी कमजोरी है, उपयोग नहीं टिक पाता है।
तत्त्वादिक चिन्तन भक्ति से भी दूर पाप में जाता है॥५॥
हे बल-अनन्त के धनी विभो ! भावों में तबतक बस जाना।
निज से बाहर भटकी परिणति, निज ज्ञायक में ही पहुँचाना ॥६॥
पावन पुरुषार्थ प्रकट होवे, बस निजानन्द में मग्न रहूँ।
तुम आवागमन विमुक्त हुए, मैं पास आपके जा तिष्हूँ॥७॥
(दोहा)
अक्षर पद अरु विधि में, हुई चूक जो कोय।
प्रभु प्रसाद से हो क्षमा, भक्ति सहाई होय ॥
।। पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि ॥
।। कार्योत्सर्गं करोम्यहम् ॥
मोक्ष न आतमज्ञान बिन, क्रिया ज्ञान बिन नाहिं।
ज्ञान विवेक बिना नहीं, गुण विवेक के माहिं ॥
नहिं विवेक जिनमत बिना, जिनमत जिनबिन नाहिं।
मोक्ष मूल निर्मल महा, जिनवर त्रिभुवन माहिं ॥
तातें जिनको वन्दना, हमरी बारम्बार ।
जिनतें आपा पाईये, तीन भुवन में सार ॥
चौबीसी तीनों नमूँ, नमो तीस चौबीस ।
सीमन्धर आदिक प्रभो, नमन करो जिन बीस ॥
तीनकाल के जिनवरा, तीन काल के सिद्ध।
तीन काल के मुनिवरा, वन्दूँ लोक प्रसिद्ध ॥
जिनवाणी रस अमृता, जा सम सुधा न और।
जाकर भव भ्रमण मिटै, पावे निश्चल ठौर ।।
Artist: श्रद्धेय ब्र० पं० श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह
स्रोत: जैन विधि विधान (सं. पण्डित अभयकुमार जैन, अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन), पृष्ठ १०८