सम्पूर्ण विधि कर वीनऊँ, इस परम पूजन पाठ में ।
अज्ञानवश शास्त्रोक्त-विधि तें, चूक कीनों पाठ में ।।
सो होऊ पूर्ण समस्त विधिवत् तुम चरण की शरण तें ।
वन्दूँ तुम्हें कर जोड़ के, उद्धार जामन-मरण तें ।।
आह्वाननं स्थापन तथा, सन्निधिकरण विधानजी ।
पूजन विसर्जन यथाविधि, जानूँ नहीं गुणखानजी ।।
जो दोष लाग्यो सो नशौ, सब तुम चरण की शरण तें ।
वन्दूँ तुम्हें कर जोरि के, उद्धार जामन-मरण तें ।।
तुम रहित आवागमन, आह्वानन कियो निज भाव में ।
विधि यथाक्रम निजशक्ति सम, पूजन कियो अति चाव में ।।
करहूँ विसर्जन भाव ही में, तुम चरण की शरण तें ।
वन्दूँ तुम्हें कर जोरि के, उद्धार जामन-मरण तें ।।
(दोहा)
तीन भुवन तिहुँ काल में, तुमसा देव न और ।
सुख कारन संकट हरन, नमहुँ युगल कर जोरि ।।
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ४०६
स्रोत: पूजन-पाठ-प्रदीप (सातवां संस्करण, देहली), पृष्ठ ९६ से ९७