बिन जाने वा जान के, रही टूट जो कोय।
तुम प्रसाद तें परम गुरु, सो सब पूरन होय।।
पूजन विधि जानूँ नहीं, नहिं जानूँ आह्वान।
और विसर्जन हू नहीं, क्षमा करो भगवान्।।
मंत्रहीन धनहीन हूँ, क्रियाहीन जिनदेव ।
क्षमा करहु राखहु मुझे, देहु चरण की सेव ।।
तुम चरनन ढिंग आय के, मैं पूजूँ अति चाव।
आवागमन रहित करो, रमूँ सदा निज भाव ।।
पुष्पांजलिम् क्षिपेत्
मङ्गलं भगवान् वीरो, मङ्गलं गौतमो गणी।
मङ्गलं कुंदकुंदाद्यो, जैन धर्मोस्तु मङ्गलं।।
सर्वमंगल माँगलयम्, सर्व कल्याण कारकं।
प्रधानं सर्व धर्माणाम्, जैनम् जयतु शासनं।।
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ४०० से ४०४