दुर्लभ भव का तत्क्षण विराम हो जाय,
क्यों न इससे पहले अपूर्व कार्य हो जाय।
छूट सब ओर से अब तो, क्यों न अपने में खो जाए।
पानी के बुलबुले सी है प्रतिक्षण की पर्याय,
दुर्लभ नर भव की अंजलि खाली न हो जाय।
इससे पहले ज्ञान की सम्यकता से पहचान हो जाय।
सर्व ओर की अनुकूलता चतुर्थ काल सी,
निज स्वभाव पुरुषार्थ से
क्यों न स्वयं से एकाकार हो जाय।
पके काल लब्धि स्व निमित्त से,
प्रति पल स्व काल हो जाय।
भटकन मिटे अनादि की,
सही मार्ग से भव का अभाव हो जाय।
रचनाकार: मुकेश गोलेछा (Mukesh Golecha), बड़नगर