विजयादशमी भी मूलतः जैन पर्व प्रतीत होता है
-प्रो. वीरसागर जैन
विजयादशमी को वर्तमान में हिन्दुओं का एक विशिष्ट पर्व माना जाता है, जो दशहरा के नाम से भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि इस दिन रावण का वध हुआ था और राम की विजय हुई थी, अतः इसे ‘विजयादशमी पर्व’ के रूप में मनाया जाता है ।
हम यहाँ यह नहीं कहना चाहते कि उक्त धारणा सर्वथा झूठ है। यह भी सत्य होगी, पर शोध-खोज से प्राप्त हुई एक अद्भुत जानकारी अपने पाठकों को अवश्य देना चाहते हैं कि यह विजयादशमी पर्व राम-रावण के समय से भी अत्यधिक प्राचीन है और इनके पहले भी इसे भारतवर्ष में बड़े उत्साहपूर्वक मनाया जाता था ।
हमारे इस शोधपूर्ण अध्ययन का मुख्य आधार कन्नड़ भाषा के महाकवि रत्नाकर द्वारा रचित ‘भरतेश-वैभव’ का द्वितीय अधिकार ‘दिग्विजय सन्धि’ है । विशेष जिज्ञासु जन उसे पूरा पढ़कर अपनी जिज्ञासा शान्त कर सकते हैं । हम यहाँ अपने विषय से सम्बन्धित तथ्यों को उस ग्रन्थ के आधार से अति संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे हैं। यथा-
“एक दिन की बात है कि भरतेश आनन्दपूर्वक अपने राजभवन में विराजमान हैं। इतने में ही अकस्मात् बुद्धिसागर मन्त्री उनके पास आये और बोले- हे स्वामी ! शस्त्रालय में बाल सूर्य के समान चक्ररत्न का उदय हुआ है, अतः आप दिग्विजय हेतु प्रस्थान का विचार करें । सम्राट भरतेश ने यह समाचार सुनकर उस मन्त्री को अनेक वस्त्राभूषण भेंट में दिये और आज्ञा दी कि शुभ मुहूर्त में दिग्विजय हेतु प्रस्थान की तैयारी करो ।
दिग्विजय पर निकलने से पूर्व भरतेश ने नौ दिन तक नगर के जिनमन्दिरों में बड़े ही उत्साह के साथ महान् पूजा-आराधना का आयोजन किया। इन दिनों नगर की शोभा देखते ही बनती थी । सर्वत्र मन्दिरों में अनेक अनुष्ठान हो रहे थे । सभी नागरिक अभिषेक-पूजनादि कार्यों में तल्लीन थे। न कोई कुछ खा रहा था, न सो रहा था | रात्रि में भी जागरण करते हुए सब लोग उत्साहपूर्वक धर्मध्यान कर रहे थे, जिनमें गीत-संगीत आदि कलाओं का भी प्रदर्शन हो रहा था ।
इस प्रकार नौ दिन की महापूजा के उपरान्त भरतेश ने दशमी को वीरलग्न के शुभ मुहूर्त में चक्ररत्न एवं भारी सेना के साथ दिग्विजय हेतु प्रस्थान किया ।” ‘भरतेश वैभव’ में उपलब्ध इस विवरण से प्रतीत होता है कि विजयादशमी का यह पर्व सर्वप्रथम भरत चक्रवर्ती ने मनाया था और तभी से आज तक यह लोक में प्रचलित रहा है ।
इससे यह भी ज्ञात होता है कि विजयदशमी भी मूलतः एक जैनपर्व रहा है और कालान्तर में जैनों द्वारा उपेक्षित होकर मात्र हिन्दुओं का कहलाने लग गया है।
हमारे उक्त मत की पुष्टि राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर के इतिहास विभाग के सेवानिवृत्त आचार्य प्रो. योगेशचन्द्र शर्मा के शोधपत्र ‘रामकथा के कुछ विवादास्पद प्रसंग’ से भी होती है, जिसमें उन्होंने यह सिद्ध किया है कि दशहरा-दीपावली का रामकथा से कोई सम्बन्ध नहीं है, इन त्योहारों की लोकप्रियता के कारण ही सम्भवतः कालान्तर में इनके साथ रामकथा को जोड़ दिया गया | यथा-
“सामान्य जनधारणा यह है कि रावण की मृत्यु विजयादशमी को हुई तथा उसके बाद दीपावली के दिन राम वापिस अयोध्या लौटे थे | तथ्यों को देखते हुए ये दोनों ही बातें गलत प्रतीत होती हैं | रामायण के अयोध्या कांड, तृतीय सर्ग-४ के अनुसार मूलतः राम का राज्याभिषेक चैत्र मास में होना तय हुआ था और उसी माह उन्हें चौदह वर्षों के लिए वनवास जाना पड़ा था | इसके अनुसार चौदह वर्ष भी चैत्र मास में ही पूरे होते हैं, अश्विन या कार्तिक में नहीं | रावणवध भी चैत्र में ही हुआ था | रावणवध के बाद उसकी अंत्येष्टि तथा विभीषण के राज्यारोहण में थोड़ा ही समय लगा, क्योंकि राम को भरत की चिन्ता हो रही थी | उधर वनवास की अवधि भी पूरी होने को थी और उन्हें निश्चित समय पर अयोध्या पहुंचना था, अन्यथा भरत के प्राण त्याग देने की आशंका थी, इसलिए राम ने विभीषण के इस आग्रह को भी स्वीकार नहीं किया कि वे कुछ दिन लंका का आतिथ्य स्वीकार करें | तब विभीषण ने उन्हें पुष्पक विमान से भेजा, जिसमें वे भारद्वाज आश्रम में पहुंचे | वह दिन चैत्र शुक्ल पंचमी का था | इस प्रकार चैत्र में ही रावणवध हुआ और इसी माह में राम वापिस अयोध्या आ गये | इस घटना से यही प्रतीत होता है कि दशहरा तथा दीपावली का रामकथा से कोई सम्बन्ध नहीं है, इन त्योहारों की लोकप्रियता के कारण ही सम्भवतः कालान्तर में इनके साथ रामकथा को जोड़ दिया गया ।”
-रामकथा के कुछ विवादास्पद प्रसंग, प्रो.योगेशचन्द्र शर्मा, वैचारिकी, त्रैमासिक शोधपत्रिका, मार्च-अप्रैल 2013, पृष्ठ 22 भारतीय विद्या मन्दिर, कोलकाता
कतिपय शंका-समाधान-
शंका- आज के दिन तो भरत ने दिग्विजय हेतु प्रस्थान किया था, युद्ध हेतु प्रस्थान किया था । इसमें पर्वपना क्या हुआ ?
समाधान- ऐसे तो राम की रावण पर विजय मानने पर भी पर्वपना क्या हुआ ? खैर, उसे छोडिए । यहाँ तो वास्तव में किसी युद्ध हेतु प्रस्थान नहीं किया जा रहा था । पूरी दिग्विजय में कहीं किसी का एक बूंद भी खून नहीं बहा था । यह तो वास्तव में प्रजा के सर्वतोन्मुखी विकास हेतु किया गया एक सुन्दर अभियान था, जिसमें भरत के नेतृत्व में जनता को उत्तम शिक्षाएं दी जा रही थीं, कर्मभूमि के योग्य संस्कार दिए जा रहे थे । उन्हें अंक, लिपि, कृषि, वाणिज्य आदि सभी आवश्यक कार्यों की शिक्षा दी जा रही थी । सम्पूर्ण देश को संगठित करके उसका विकास किया जा रहा था । इसे युद्ध की दृष्टि से देखना उपयुक्त नहीं है । इसे तो एक प्रकार से धर्मचक्र का ही प्रवर्तन समझना चाहिए । इस विषय की विस्तृत जानकारी हेतु डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल द्वारा रचित ‘भरत का अन्तर्द्वन्द्व’ पठनीय है ।
शंका- शास्त्रों के अनुसार शस्त्रागार में चक्ररत्न प्रकट होने की सूचना तो फाल्गुन कृष्ण एकादशी को आई थी, जिस दिन ऋषभदेव को केवलज्ञान की भी प्राप्ति हुई थी । उसमें और आजतक के समय में तो लगभग सात माह का अंतर है । ऐसा क्यों ?
समाधान- हाँ, यह अंतर तो है, पर यह कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि दिग्विजय जैसे महान् कार्य के लिए पूरी तैयारी के साथ ही प्रस्थान करना आवश्यक था और वह भी कोई शुभ मुहूर्त देखकर ही प्रस्थान करना आवश्यक था । अतः सात माह व्यतीत होना कोई बड़ी बात नहीं है । आज से पहले लगभग चार माह का तो वर्षाकाल ही था, उसमें दिग्विजय हेतु कैसे प्रस्थान किया जा सकता था ?
शंका- विजया दशमी को जैन पर्व सिद्ध करके आप क्या कहना चाहते हैं ? क्या आज जैन समाज को यह पर्व मनाना चाहिए ? यदि हाँ तो कैसे ?
समाधान- देखो भाई, मैं तो शोधछात्र हूँ और मैं तो केवल प्राप्त होनेवाले नवीन तथ्यों को आपके सामने प्रस्तुत भर कर रहा हूँ । लोक में आज विजयादशमी के सम्बन्ध में मात्र इतना समझा जाता है कि इसका सम्बन्ध रावण पर राम की विजय से है, किन्तु उपलब्ध तथ्य बता रहे हैं कि इसका सम्बन्ध भरत की दिग्विजय से है । यहाँ मेरा उद्देश्य उन्हीं तथ्यों को सप्रमाण प्रस्तुत करना है, अन्य कुछ नहीं । वह भी एकदम अनाग्रह भाव से प्रस्तुत किया जा रहा है । यदि कोई अन्य व्यक्ति बाद में अन्य कुछ सिद्ध करता है तो वह स्वागत योग्य है ।