श्री पार्श्वनाथ पंचकल्याणक विधान मंगलाचरण | Vidhan

श्री पार्श्वनाथाय नमः

मंगलाचरण

छंद-अनुष्टुप

मंगलं सिद्ध परमेष्ठी, मंगलं तीर्थंकरम् ।
मंगलं शुद्ध चैतन्यं, आत्मधर्मोस्तु मंगलं ।।

मंगलं वर्द्धमानाय, मंगलं गौतमो ऋषि ।
मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो, महामुनिवर मंगलं ।।

छंद-दोहा

जयति पंच परमेष्ठी, जिनप्रतिमा जिनधाम ।
जय जगदम्बे दिव्यध्वनि, श्री जिनधर्म प्रणाम ।।

श्री चौबीस जिनेश प्रभु, उत्तम मंगलरूप।
करूणा से दर्शा रहे सबको आत्मस्वरूप ।।

छंद-चामर

वीतराग श्री जिनेन्द्र ज्ञानरूप मंगलम् ।
गणधरादि सर्वसाधु ध्यानरूप मंगलम् ।।

जैनधर्म सार्वधर्म विश्वधर्म मंगलम् ।
वस्तु का स्वभाव ही अनाद्यनंत मंगलम् ।।

आत्म कल्याण पुरुषार्थ भव्य मंगलम् ।
आत्म तत्त्व प्राप्ति का उपाय श्रेष्ठ मंगलम् ।।

वर्तमान चतुर्विंशति जिनेन्द्र मंगलम्।
पार्श्वनाथ पंच कल्याण भव्य मंगलम् ।

। पुष्पांजलिं-क्षिपेत् ।


श्री पार्श्वनाथ पंचकल्याणक विधान

समुच्चय-पूजन

स्थापना

छंद-उपमान (हे दीन बंधु..)

आनंदकंद चिदानंद पार्श्वनाथ जी।

नृप अश्वसेन वामा सुत ज्ञान नाथ जी ।।

तेइसवें तीर्थेश प्रभु महा महेन्द्र जी।

हे बालयती वीतराग श्री जिनेन्द्र जी ।।

जय गर्भ जन्म तप मंगल काशी की भूमि।

उपसर्ग जयी अहिच्छत्र परम ज्ञान भूमि ।।

निर्वाण भूमि श्रेष्ठ शिखर सम्मेदाचल ।

स्वर्ण भद्र कूट से प्रभो हुए अचल ।।

चरणाम्बुज पूजन के जगे शुद्धभाव।

तुम समान बन करूँ मैं कर्म का अभाव ।।

दोहा

सर्प चिन्ह पद कमल तल पार्श्वनाथ भगवान् ।

हरित वर्ण नौ हाथ तन आयु वर्ष शत जान ।।

ॐ ह्रीं श्री गर्भजन्मतपज्ञानमोक्षकल्याणकविभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर संवौषट्,। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। (पुष्पांजलिं-क्षिपेत्)

छंद-रोला

ज्ञानस्वभावी शीतल जल की भेंट चढ़ाऊँ।

जन्म जरा मृत्यु रोग विनायूँ निज सुख पाऊँ ।।

पार्श्वनाथ प्रभु के चरणों में शीष झुकाऊँ ।

निज स्वभाव साधन से शाश्वत शिवपद पाऊँ ।।

ॐ हीं श्री पंचकल्याणक विभूषित पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय मिथ्यात्वमल विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

ज्ञानस्वभावी शीतल चंदन भेंट चढ़ाऊँ ।

क्षय करके संसार ताप प्रभु निजसुख पाऊँ।। पार्श्व.. ।।

ॐ ही श्री पंचकल्याणक विभूषित पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय क्रोधकषाय विनाशनाय चंदनं नि. स्वाहा।

ज्ञानस्वभावी अक्षत तंदुल भेंट चढ़ाऊँ ।

अक्षय पद पा गुण अनंत अपने प्रगटाऊँ।। पार्श्व.. ।।

ॐ ही श्री पंचकल्याणक विभूषित पार्श्वनाथ तीर्थकर जिनेन्द्राय मानकषाय विनाशनाय अक्षतान् नि. स्वाहा।

ज्ञानस्वभावी शील पुष्प निज अभेद लाऊँ।

महाशील गुण मय निष्काम भाव प्रगटाऊँ ।। पार्श्व.. ।।

ॐ श्री श्री पंचकल्याणक विभूषित पार्श्वनाथ तीर्थकर जिनेन्द्राय मायाकषाय विनाशनाय पुष्पं नि. स्वाहा।

ज्ञानस्वभावी अनुभव रसमय सुचरू चढ़ाऊँ।

क्षुधारोग विध्वंस करूँ निज पद प्रगटाऊँ ।।

पार्श्वनाथ प्रभु के चरणों में शीष झुकाऊँ।

निज स्वभाव साधन से शाश्वत शिवपद पाऊँ ।।

ॐ ह्रीं श्री पंचकल्याणक विभूषित पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय लोभकषाय विनाशनाय नैवेद्यं नि. स्वाहा।

ज्ञानस्वभावी शुद्ध ज्योतिमय दीप चढ़ाऊँ।

मोह तिमिर हर केवलज्ञान सूर्य प्रगटाऊँ।। पार्श्व.. ।।

ॐ ह्रीं श्री पंचकल्याणक विभूषित पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि. स्वाहा।

ज्ञानस्वभावी धूप ध्यानमय हृदय सजाऊँ ।

अष्टकर्म विध्वंस करूँ ध्रुव शिवपद पाऊँ।। पार्श्व..।।

ॐ ह्रीं श्री पंचकल्याणक विभूषित पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय विभावपरिणति विनाशनाय धूपं नि. स्वाहा।

ज्ञानस्वभावी ज्ञान वृक्ष के ही फल लाऊँ।

महामोक्ष फल पाने को निज को ही ध्याऊँ।। पार्श्व.. ।।

ॐ ह्रीं श्री पंचकल्याणक विभूषित पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय महामोक्षफलप्राप्तये फलं नि. स्वाहा।

ज्ञानस्वभावी अर्घ्य भावमय भेंट चढ़ाऊँ।

पद अनर्घ्य पा सिद्धपुरी सिंहासन पाऊँ।। पार्श्व.. ।।

ॐ ह्रीं श्री पंचकल्याणक विभूषित पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

महाऽर्घ्य

महाऽर्घ्य अर्पण करूँ पार्श्वनाथ भगवान्।

सम्यग्दर्शन प्राप्त कर पाऊँ सम्यग्ज्ञान ।।

ॐ ह्रीं श्री पंचकल्याणक विभूषित पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय महाऽर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

छंद-राधिका

हे पार्श्वनाथ भगवान् आपकी जय हो।

परिषह उपसर्ग जयी त्रिभुवन पति जय हो ।।

मोहादिभाव सम्पूर्ण नाश सुख पाया।

कैवल्यज्ञान रवि स्व-पर प्रकाशक पाया ।।

पाए अनंत गुण ध्रुव स्वभाव जब ध्याया।

चारित्र सुनिर्मल यथाख्यात प्रगटाया ।।

तत्क्षण पायी आनंद अतीन्द्रिय धारा।

आठों कर्मों को प्रभु तुमने संहारा ।।

घातिया नाश सर्वज्ञ स्वपद निज पाया।

अरहंत स्वपद पा निजानंद दरशाया ।।

तुम सिद्ध पुरी के स्वामी अंतर्यामी।

प्रभु सकल ज्ञेय के ज्ञायक त्रिभुवननामी।।

प्रभु समवशरण की महिमा जग में न्यारी।

है द्वादश सभा मनोहर सबको प्यारी ।।

सेवा में दस गणधर थे जग में नामी।

ये ज्ञान मन:पर्यय धारी गुण धामी।।

थे मुख्य स्वयंभू गणधर सबके स्वामी।

प्रभु अंतरीक्ष राजे थे अंतर्यामी ।।

केवली, मनःपर्यय, सुअवधि ज्ञानी मुनि ।

वादी शिक्षक, विक्रिया, पूर्व धारी मुनि ।।

सब मिल कर सोलह सहस्र ऋषिमुनिवर थे।

ये समवशरण में गुणधारी ऋषिवर थे।।

अड़तीस सहस्र आर्यिका श्री गुणधामी ।

थी मुख्य आर्यिका श्री सुलोका नामी ।।

थे एक लाख श्रावक प्रभु समवशरण में।

थीं तीन लाख श्राविका सुसमवशरण में ।।

प्रभु अंतरीक्ष में ही विहार जब करते ।

दो सौ पच्चीस कमल प्रतिक्षण सुर रचते ।।

ये स्वर्ण कमल चरणों के नीचे सुंदर।

पंद्रह-पंद्रह की पंद्रह पंक्ति मनोहर ।।

आगे चलता था धर्म चक्र अति पावन ।

सुर पुष्प वृष्टि करते थे बहु मनभावन ।।

मैं कैसे पार्श्वनाथ की महिमा गाऊँ ।

बस मात्र आपकी पूजन कर हर्षाऊँ ।।

ॐ ह्रीं श्री पंचकल्याणकविभूषित पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दोहा

चरण कमल प्रभु पार्श्व के वन्दू मैं दिन-रात।

भेदज्ञान-विज्ञान पा, पाऊँ ज्ञान प्रभात ।।

।। पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।।


गर्भकल्याणक-पूजन

स्थापना

दोहा

दूज कृष्ण वैशाख की हुआ गर्भ कल्याण।

माँ वामा के हृदय में आए श्री भगवान् ।।

वीरछंद

जन्म नगर की सुंदर रचना करते हैं कुबेर सुर आन।

गर्भ पूर्व छह मास रत्न वर्षा होती प्रारंभ सुजान ।।

बारह योजन लम्बी नव योजन चौड़ी नगरी निर्माण।

जन्म समय तक बरसाते हैं रत्न विविध स्वर्गों से जान ।।

तीर्थंकर माता को होते सोलह स्वप्न विचित्र महान् ।

स्वप्न देख माता के उर में हुआ हर्ष उत्पन्न महान् ।।

इन्द्रादिक सुर मात-पिता का आदर करने आते हैं।

वाराणसी नगरी आकर जिन प्रभु के गुण गाते हैं।

ॐ ह्रीं श्री गर्भकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर संवौषट्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। पुष्पांजलिं-क्षिपेत् ।

छंद-हरिगीतिका

भेदज्ञान महान् जल से प्रभु चरण पूजन करूँ।

जन्म मृत्यु जरा विनाशूँ रोग भव तीनों हरूँ ।।

पार्श्व प्रभु का गर्भ कल्याणक महामंगलमयी ।

सुरों द्वारा रत्न वर्षा हो रही सातामयी ।।

ॐ ह्रीं श्री गर्भकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

भेदज्ञान महान् चंदन महाशीतल उर धरूँ।

भवातप ज्वर नाश करके परमशीतलता वरूँ। । पार्श्व..।।

ॐ ह्रीं श्री गर्भकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदन नि. स्वाहा।

भेदज्ञान महान् अक्षत भाव तन्दुल उर धरूँ ।

प्राप्त अक्षय पद करूँ मैं सकल दुख भव के हरूँ।। पार्श्व..।।

ॐ ह्रीं श्री गर्भकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् नि. स्वाहा।

भेदज्ञान कुसुम चढ़ाऊँ काम की पीड़ा हरूँ।

परम शील महान् पा निष्काम निज जीवन करूँ।। पार्श्व.. ।।

ॐ ह्रीं श्री गर्भकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि. स्वाहा।

भेदज्ञानी स्वानुभव के सुचरू चरणों में धरूँ।
क्षुधाव्याधि विनाश करके निराहारी पद वरूँ ।।

पार्श्व प्रभु का गर्भ कल्याणक महामंगलमयी ।

सुरों द्वारा रत्न वर्षा हो रही सातामयी ।।

ॐ ह्रीं श्री गर्भकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं नि. स्वाहा।

भेदज्ञान प्रसिद्ध के ही दीप लाऊँ ज्योति मय।

प्रभो केवलज्ञान पाऊँ मोह भ्रमतम करूँ क्षय। । पार्श्व..।।

ॐ ह्रीं श्री गर्भकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि. स्वाहा।

भेदज्ञानी धूप लाऊँ आस्रव को जय करूँ।

कर्म आठों जीत कर मैं चतुर्गति का दुख हरूँ।। पार्श्व..।।

ॐ ह्रीं श्री गर्भकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय अष्टकर्म विध्वंसनाय धूपं नि. स्वाहा।

भेदज्ञान महान् तरू से मोक्षफल लाऊँ प्रभो ।

सिद्धपुर साम्राज्य पाऊँ मोक्ष में जाऊँ विभो।। पार्श्व..।।

ॐ ह्रीं श्री गर्भकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय महामोक्षफल प्राप्तये फलं नि. स्वाहा।

भेदज्ञान महान् के ही अर्घ्य तब लाऊँ प्रभो।

त्रिलोकाग्र प्रसिद्ध जाऊँ सौख्य ध्रुव पाऊँ विभो।। पार्श्व..।।

ॐ ह्रीं श्री गर्भकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निवपामीति स्वाहा।

महाऽर्घ्य

छंद-अर्थ कुंडलिया

महाऽर्घ्य अर्पण करूँ, जय जय गर्भ कल्याण ।

अपने बल से हे प्रभो पाऊँ पद निर्वाण ।।

पाऊँ पद निर्वाण करूँ मैं ध्यान स्वयं का।

फल पाऊँ मैं नाथ ज्ञानमय अपने श्रम का।।

अब न गर्भ धारूँ हे स्वामी निजपद पाऊँ।

नहीं किसी माता को आगे कभी रुलाऊँ ।।

ॐ ह्रीं श्री गर्भकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय महाऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

वीरछंद

पूर्व भवो में सोलह कारण भव्य भावना भायीं श्रेष्ठ।

पार्श्वनाथ ने नामकर्म तीर्थंकर बांधा उत्तम ज्येष्ठ ।।

तीर्थंकर प्रकृति के संग बंध जाता पुण्य सातिशय श्रेष्ठ।

वही उदय में गर्भ पूर्व से आता बनकर उत्तम ज्येष्ठ ।।

पार्श्वनाथ के गर्भ समय से मंगलमय छह महीने पूर्व।

हुई रत्न वर्षा देवों के द्वारा उत्तम भव्य अपूर्व ।।

जन्म समय तक जन जन ने आनंद मनाया मन भावन।

पंद्रह मास रत्न बरसे नित तीन समय माँ के आंगन ।।

एक रात्रि माता ने सोलह स्वप्न लखे बहु सुखकारी।

प्रातः पति को स्वप्न सुना कर पूछे फिर फल मनहारी ।।

वृषभ, सिंह, गज, माला, लक्ष्मी, रवि, शशि, सिंहासन रत्निम।

मीनयुगल, दो कलश, सरोवर, सुरविमान, नागेन्द्र भवन ।।

रत्नशशि, निर्धूम अग्नि, सागर लहराता विमल प्रधान।

इनका फल तीर्थंकर प्रभु जन्मेंगे होंगे सिद्ध महान् ।।

स्वप्न फलों को पति से जाना हर्ष हुआ मन में भारी।

राज भवन में गीतगान फिर होने लगे मनोहारी ।।

अति हर्षित हो पूजूँ मैं भी भाव विभोर गर्भ कल्याण।

पार्श्वनाथ को नमन करूँ मैं प्रतिदिन गाऊँ मंगल गान ।।

ॐ ह्रीं श्री गर्भकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सोरठा

पूजन की है आज पार्श्व गर्भ कल्याण की।
पाऊँ निज पद राज परम श्रेष्ठ मंगलमयी ।।

। पुष्पांजलिं-क्षिपेत् ।


जन्मकल्याणक-पूजन

स्थापना

दोहा

पौष कृष्ण एकादशी हुआ जन्म कल्याण।
नगर बनारस अवतरे पार्श्वनाथ भगवान् ।।

छंद-ताटंक

परम जन्म कल्याण महोत्सव पार्श्वनाथ का मंगलमय।

मेरू सुदर्शन पर अभिषेक समय गूंजी प्रभु की जय जय।।

माता वामा धन्य हो गई पार्श्वनाथ को जन्म दिया।

अश्वसेन नृप हुए प्रफुल्लित दान किमिच्छिक बहुत दिया।।

घर-घर मंगलाचार हो रहे घर-घर शोभित तोरण द्वार।

वाराणसी नगर का जन मन गण सब गाता जय जयकार ।।

मैं भी जन्म कल्याणक पूजूँ नाचूँ गाऊँ हर्षाऊँ।

महामोक्ष मंगल के दाता पार्श्वनाथ की जय-जय गाऊँ ।।

ॐ ह्रीं श्री जन्मकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर संवौषट्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। पुष्पांजलिं क्षिपेत्।

छंद-सार (जोगीरासा)

परम स्वभावरूप जल लाऊँ त्रिविध रोग विनशाऊँ।

निज स्वभाव साधन के द्वारा सिद्ध स्वपद प्रगटाऊँ ।।

पार्श्वनाथ प्रभु जन्म कल्याणक हर्षित आज मनाऊँ।

बालक प्रभु के दर्शन करके मंगल गीत सुनाऊँ ।।

ॐ ह्रीं श्री जन्मकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

परम स्वभावरूप चंदन ला भवाताप विनशाऊँ।

निजस्वभाव साधन के द्वारा सिद्ध स्वपद प्रगटाऊँ ।। ।।पार्श्व..।।

ॐ ह्रीं श्री जन्मकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं नि. स्वाहा।

परम स्वभावरूप अक्षत पा अक्षय पद प्रगटाऊँ।

निजस्वभाव साधन के द्वारा सिद्ध स्वपद प्रगटाऊँ ।। पार्श्व..।।

ॐ ह्रीं श्री जन्मकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् नि. स्वाहा।

परम स्वभावरूप पुष्प ला कामबाण विनशाऊँ ।

निजस्वभाव साधन के द्वारा सिद्ध स्वपद प्रगटाऊँ।। पाश्व…।।

ॐ ह्रीं श्री जन्मकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि. स्वाहा।

परम स्वभावरूप चरू लाऊँ क्षुधारोग विनशाऊँ।

निजस्वभाव साधन के द्वारा सिद्ध स्वपद प्रगटाऊँ ।।

पार्श्वनाथ प्रभु जन्म कल्याणक हर्षित आज मनाऊँ।

बालक प्रभु के दर्शन करके मंगल गीत सुनाऊँ ।।

ॐ ह्रीं श्री जन्मकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि. स्वाहा।

परम स्वभावरूप दीपक ला केवल रवि प्रगटाऊँ।

निजस्वभाव साधन के द्वारा सिद्ध स्वपद प्रगटाऊँ । पार्श्व..।

ॐ ह्रीं श्री जन्मकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि. स्वाहा।

परम स्वभावरूप धूप ला अष्ट कर्म विनशाऊँ।

निजस्वभाव साधन के द्वारा सिद्ध स्वपद प्रगटाऊँ । पार्श्व..।

ॐ ह्रीं श्री जन्मकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय अष्टकर्म विध्वंसनाय धूपं नि. स्वाहा।

परम स्वभावरूप फल लाऊँ महामोक्ष फल पाऊँ।

निजस्वभाव साधन के द्वारा सिद्ध स्वपद प्रगटाऊँ । पार्श्व..।

ॐ ह्रीं श्री जन्मकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय महामोक्ष फलप्राप्तये फलं नि. स्वाहा।

परम स्वभावरूप अर्घ्य ला पद अनर्घ्य प्रगटाऊँ।

निजस्वभाव साधन के द्वारा सिद्ध स्वपद प्रगटाऊँ । पार्श्व..।

ॐ ह्रीं श्री जन्मकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

महाऽर्घ्य

दोहा

महाऽर्घ्य अर्पण करूँ जन्म कल्याण महान्।

हमको भी निज सुख मिले पार्श्वनाथ भगवान् ।।

ॐ ह्रीं श्री जन्मकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय महाऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

वीरछंद

वाराणसी नगर में जन्में अश्वसेन के पुत्र महान्।

तेईसवें तीर्थंकर प्रभु जी पार्श्वनाथ जिनवर गुणवान ।।

जन्म समय सब जीवों ने भी सुख अंतर्मुहूर्त पाया।

प्रभु का जन्म जान तीनों लोकों में बहुत आनंद छाया ।।

चार निकाय सुरों के गृह में बहु प्रकार के वाद्य बजे।

इन्द्र आज्ञा से सब ही सुर जन्मोत्सव के लिए सजे।

ऐरावत गज लेकर आए इन्द्र नगर के द्वारे पर।

इन्द्राणी प्रसूती गृह से प्रभु को ले आयी कर में धर ।।

गोदी में ले इन्द्र प्रफुल्लित हुए निरख जिन छवि पावन।

नेत्र सहस्र नाए अपने निरखी प्रभु द्युति मन भावन ।।

गिरि सुमेरू पर प्रभु को लेकर गए सभी सुर हर्षित हो।

पांडुक शिला विराजित करके देखा प्रभु को मोहित हो ।।

पंचम क्षीरोदधि के एक सहस्र कलश जल भर लाए।

प्रभु अभिषेक किया सुरपति ने सारे सुरगण हर्षाए ।।

वस्त्राभूषण पहिना प्रभु को इन्द्राणी बहु मुदित हुई।

इक भव अवतारी के मन में शिवसुख आशा उदित हुई ।।

फिर प्रभु को ऐरावत पर ले आए इन्द्र नगर के मध्य।

मात-पिता को सौंप इन्द्र ने तांडव नृत्य किया बहु भव्य ।।

प्रभु के दाएं पद अंगुष्ठ भाग में चिह्न इन्द्र ने देख।

हर्षित सर्पचिह्न प्रभु का सुरपति ने घोषित किया विशेष ।।

कहा इन्द्र ने हे जिनमाता प्रभु को रखना बहुत संभाल ।

पुत्र तुम्हारे धनी हमारे ये ही हैं त्रिभुवन के भाल ।।

पार्श्वनाथ बालक को वंदन करके इन्द्र गए सुरलोक।

प्रभु का जन्मोत्सव मंगल लख काशी में छाया आलोक ।।

छोटे-छोटे देव संग रह प्रभु का मन बहलाते हैं।

वस्त्राभूषण नित नूतन स्वर्गों से ला पहनाते हैं।।

जन्म महोत्सव पार्श्वनाथ प्रभु का सबको कल्याणमयी ।

हमने भी पूजा कल्याणक जिन प्रभु का संसारजयी ।।

ॐ ह्रीं श्री जन्मकल्याणक विभूषित श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर जिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पार्श्वनाथ प्रभु का हुआ, दिव्य जन्मकल्याण ।

हमने पूजन की प्रभो, करें आत्मकल्याण ।।

।। पुष्पांजलिं-क्षिपेत् ।।