विधान विधि निर्देशिका
अनुक्रमणिका
| क्र. | विवरण |
|---|---|
| 1 | विधान विधि निर्देशिका |
| 2 | विधान प्रारंभ विधि |
| 3 | मंगल कलश स्थापना विधि |
| 4 | अङ्गन्यास |
| 5 | पुण्याहवाचन |
| 6 | संकलन |
विधान विधि निर्देशिका
विधान प्रारंभ विधि
- पूजन-विधान श्रीजी, यन्त्रजी या शास्त्रजी के समक्ष किया जाता है, विधान जिनमंदिर में ही भगवान की वेदी के समक्ष हो तो बहुत अच्छा है अन्यथा यदि हम जिस स्थान पर विधान कर रहे हैं, वहाँ पर उच्च आसन पर जल से शुद्धि करके श्रीजी, यन्त्रजी या शास्त्रजी को विराजमान करना चाहिए।
- तत्पश्चात् श्रीजी/यन्त्रजी का जलाभिषेक किया जाना चाहिए, जिसके लिए अभिषेक करने वाले सभी भाईयों में इंद्र प्रतिष्ठा करवाना चाहिए उसमें मुकुट, हार, रक्षासूत्र, तिलक आदि को धारण करवाना चाहिए, पश्चात् पवित्र जल से अमृतस्नान, सर्वांग शुद्धि करवाकर प्रतिमा-प्रक्षाल पाठ पूर्वक श्रीजी का अभिषेक करावें।
- ॐ ह्रीं श्रीमंत भगवत् कृपालसन्त शुभादिमहावीरपर्यन्त चतुर्विंशतितीर्थंकरपरमदेवमहामानायते जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे … नामिनगरे मासानुत्तमे … मासे … तिथौ … दिने पुण्यार्कश्रावकाभिकाणां सकलकर्मक्षयार्थ पवित्रतरजलेन जिनबिम्बेचयामि।
- यन्त्राभिषेक - ॐ ह्रीं भूर्भुवः स्वहं विन्ध्यिवाचक यन्त्रं वयं परिषेचयाम्।
जल गन्धादिक द्रव्य से, पूजूँ श्री जिनराज।
पूर्ण अर्घ अर्पित करूँ, पाऊँ चेतनराज।। - ॐ ह्रीं श्री पीठस्थितजिनयन्त्रोपद्रवसमये अयं निवद्यमि स्वाहा।
निर्मल निर्मलीकरण पावन पापनाशनम्।
जिनचरणोदकं वंदे अष्टकर्म-विनाशनम्।।
मंगल कलश स्थापना विधि
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मंगल कलश की सामग्री - कलश, नारियल, केसरिया कपड़ा, रक्षासूत्र, चन्दन, जल, पुष्प, पीली सरसों, हल्दी, सुपारी, पंचरत्न, सिक्के, आदि।
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श्रीजी की वेदी के सामने विधान का मंडप लगाना चाहिए। जिसकी जल से शुद्धि करनी चाहिए। जिस पर मंगलकलश, अष्ट मंगल द्रव्य, अष्ट प्रतिहार्य आदि रखे जावेंगे।
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कलश विराजमानकर्ता इन्द्र-इन्द्राणी को मुकुट, हार, रक्षासूत्र, तिलक आदि धारण करवाकर फिर जल से अमृत स्नान, सर्वांगशुद्धि करावें।
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निम्नलिखित मंत्र द्वारा रक्षासूत्र बांधे -
- ‘ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्ष रक्ष हूँ फट् स्वाहा।’
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फिर निम्नलिखित मन्त्र द्वारा अमृतस्नान करावें।
- ‘ॐ अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृत स्त्रावय स्त्रावय सं सं क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं सं क्ष्वीं ह्रीं हः स्वाहा।’
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फिर निम्नलिखित मन्त्र द्वारा सर्वांगशुद्धि करावें।
- ‘ॐ हां हीं हूं हौं हः मम सर्वांगशुद्धि कुरु कुरु स्वाहा।’
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फिर मंत्रोच्चारणपूर्वक इन्द्र-इन्द्राणी द्वारा मंगलकलश में मंगल सामग्री डलवाना चाहिए।
- ॐ ह्रीं श्री मंगलकलशे नवरत्नाद्युपधानदीनि निवेद्यमीति स्वाहा।
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तत्पश्चात् इन्द्राणी द्वारा मंगल कलश पर चन्दन से और माँडे पर (कलश विराजमान किये जाने वाले स्थान पर) पुष्प से स्वस्तिक बनवाना चाहिए, इन्द्र द्वारा मंगल कलश पर रक्षासूत्र बंधवाकर, मंगलकलश पर नारियल रखवाकर अब इन्द्र-इन्द्राणी द्वारा मंत्र उच्चारण पूर्वक मंगलकलश की स्थापना करवानी चाहिए।
- ॐ अद्य भगवतो महापुण्यस्य श्रीदादिब्रह्मणो मतेऽस्मिन् श्रीवीरनिर्वाणसंवत्सरे … मासे … पक्षे … तिथौ … दिने जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यदेशे … नगरे … जिनमन्दिरे कार्येषु निर्विघ्न सिद्धयर्थं मण्डपमिशुद्धयर्थं पात्र शुद्धयर्थं शान्त्यर्थं पुण्याहवाचनार्थं नवरत्न-गन्ध-पुष्पाक्षतादि-बीजपुष्पशोभितं मंगलकलशस्थापनं करोम्यहं ह्रीं हः स्वाहा।
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तत्पश्चात् सभी को अपने स्थान पर व्यवस्थित बैठने का निर्देश देकर मंगलाष्टक पढ़ना प्रारंभ करना चाहिए तथा प्रत्येक छंद के अंत में थाली में पुष्प क्षेपण करने का निर्देश देवें।
अङ्गन्यास
मंगलाष्टक के बाद दोनों हाथों के अंगूठे से लेकर कनिष्टिका पर्यन्त पाँचों अंगुलियों में क्रम से अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेश्ठी की स्थापना करें।
सर्वप्रथम दोनों हाथों के अंगूठों को बराबरी से मिलाकर सामने करें। इस मंत्र का उच्चारण कर सिर झुकावें।
* ॐ हां णमो अरहंताणं हां अंगुष्ठाभ्यां नमः
इन दोनों हाथों की तर्जनीयाँ (अंगूठे के पास की अंगुलियाँ) को बराबरी से मिलाकर सामने करें। इस मंत्र का उच्चारण कर सिर झुकावें।
* ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः
बीच की दोनों अंगुलियों को मिलाकर सामने करके - इस मंत्र का उच्चारण कर सिर झुकावें।
* ॐ हूं णमो आइरियाणं हूं मध्यमाभ्यां नमः
दोनों अनामिकाओं को सामने करें, और - इस मंत्र का उच्चारण कर सिर झुकावें।
* ॐ हौं णमो उवज्झायाणं हौं अनामिकाभ्यां नमः
दोनों कनिष्ठा को मिलाकर सामने करें और - इस मंत्र का उच्चारण कर सिर झुकावें।
* ॐ हः णमो लोए सव्वसाहूणं हः कनिष्ठाभ्यां नमः
दोनों हथेलियों को बराबर सामने फैलाकर इस मंत्र का उच्चारण कर सिर झुकावें।
* ॐ हां ह्रीं हूं हौं हः करतलाभ्यां नमः
दोनों करपृष्ठों को बराबर सामने फैलाकर इस मंत्र का उच्चारण कर सिर झुकावें।
* ॐ हां ह्रीं हूं हौं हः करपृष्ठाभ्यां नमः
अपने सिर का स्पर्श करें।
* ॐ हां णमो अरहंताणं हां मम शीर्ष रक्ष रक्ष स्वाहा
अपने मुख का स्पर्श करें -
* ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं मम वदनं रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न पढ़कर हृदय का स्पर्श करें -
* ॐ हूं णमो आइरियाणं हूं मम हृदयं रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न पढ़कर नाभि का स्पर्श करें -
* ॐ हौं णमो उवज्झायाणं हौं मम नाभिं रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न पढ़कर पैरों का स्पर्श करें -
* ॐ हः णमो लोए सव्वसाहूणं हः मम पादौ रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न पढ़कर अपने शरीर का स्पर्श करें -
* ॐ हां णमो अरहंताणं हां मम गात्रं रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न पढ़कर अपने वस्त्रों का स्पर्श करें -
* ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं मम वस्त्रं रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न पढ़कर अपने पूजन सामग्री का स्पर्श करें -
* ॐ हूं णमो आइरियाणं हूं मम पूजा द्रव्यं रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न पढ़कर अपनी जगह की ओर देखें।
* ॐ हौं णमो उवज्झायाणं हौं मम पूजा स्थलं रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न पढ़कर अंजलि में जल लेकर सब ओर क्षेपण करें।
* ॐ हः णमो लोए सव्वसाहूणं हः सर्वं जगत् रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मन्त्र से अंजलि के जल को मन्त्रित कर अपने सिर पर सींचें।
* ॐ क्ष्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं हः सर्वदिग्बन्धु, हां ह्रीं हूं हौं हः सर्वदिग्बन्धु ऊँ ह्रीं अमृते अमृतोद्भवे अमृते अमृतवर्षिणि अमृते स्त्रावय सं सं क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय ठः ठः स्वाहा।
निम्न पढ़कर शरीर पर जल सिंचन करें -
* ॐ हां ह्रीं हूं हौं हः मम सर्वांग शुद्धि कुरु कुरु स्वाहा।
तत्पश्चात् विधानाचार्य पुष्प तथा पीली सरसों का क्षेपण कर दिशाओं का बंधन करें।
* ‘ॐ हां णमो अरहंताणं हां पूर्वदिशातः आगतान्विघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा’ - यह मंत्र पढ़कर पूर्व दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों फेंकें।
* ‘ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं दक्षिणदिशातः आगतान्विघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा’ - यह मंत्र पढ़कर दक्षिण दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों फेंकें।
* ‘ॐ हूं णमो आइरियाणं हूं पश्चिमदिशातः आगतान्विघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा’ - यह मंत्र पढ़कर पश्चिम दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों फेंकें।
* ‘ॐ हौं णमो उवज्झायाणं हौं उत्तरदिशातः आगतान्विघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा’ - यह मंत्र पढ़कर उत्तर दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों फेंकें।
* ‘ॐ हः णमो लोए सव्वसाहूणं हः सर्वदिग्भ्यः आगतान्विघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा’ - यह मंत्र पढ़कर दसों दिशाओं में पुष्प अथवा पीली सरसों फेंकें।
तदनन्तर प्रतिष्ठाचार्य पुष्प अथवा पीली सरसों को मंत्रित कर सब दिशाओं में फेंकें।
* ॐ ह्रीं फट् किरीट किरीट घात्य घात्य परिवारस्य स्फोटय स्फोटय सहस्रखण्डं कुरु कुरु परमुद्रां छिन्द छिन्द परमनत्रान् भिन्द भिन्द वाः हूं फट् स्वाहा।
- अब विनयपाठ, पूजापीठिका, देव-शास्त्र-गुरु पूजन, मूलनायक भगवान की पूजन, चौबीस
तीर्थंकर पूजन, अर्ध्यावली, समयानुसार करना चाहिए। तत्पश्चात् विधान प्रारंभ करना चाहिए। - महार्घ्य के पश्चात् शांतिपाठ-विसर्जन के पूर्व समयानुसार शांतिजाप करवाकर ‘पुण्याह वाचन’
के माध्यम से विधान की समाप्ति करावें।
ॐ ह्रीं अईं असि आ उ सा सर्वशान्तिं कुरु कुरु स्वाहा।
पुण्याहवाचन
ॐ पुण्याहं पुण्याहं लोकोद्योतनकरा अतीतकालसंजाता निर्वाणसागरप्रभृतयश्चतुविंशतितीर्थंकर
परमदेवाः वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा)
ॐ सम्प्रतिकालसंभवा वृषभादिवीरान्ताश्चतुर्विंशति परमजिनेन्द्रा वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा)
ॐ भविष्यत्कालाभ्युदयप्रभवा महापद्मादिचतु र्विंशतितीर्थंकर परमदेवाः व प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा)
ॐ त्रिकालवर्ति परमधर्माभ्युदय सीमन्धरप्रभृतयः विदेहक्षेत्रे विहरमाणविंशतितीर्थंकर परमदेवाः वः
प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा)
ॐ वृषभसेनादिगणधरदेवा वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा)
ॐ सप्तर्द्धिविशोभिताः कुन्दकुन्दाद्यनेकदिगम्बरसाधुचरणा वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा)
इह वान्यनगरग्रामदेवतामनुजाः सर्वे गुरुभक्ता जिनधर्मपरायणा भवन्तु । दानतपोवीर्यानुष्ठानं
नित्यमेवास्तु । सर्वजिनधर्मभक्तानां धनधान्यैश्वर्यबलद्युतियशः प्रमोदोत्सवाः प्रवर्तन्ताम्।
तुष्टिरस्तु, पुष्टिरस्तु, वृद्धिरस्तु, कल्याणमस्तु, अविघ्नमस्तु, आयुष्यमस्तु, आरोग्यमस्तु,
कर्मसिद्धिस्तु, इष्टसम्पत्तिरस्तु, काममाङ्गल्योत्सवाः सन्तु, पापानि शाम्यन्तु, घोराणि, शाम्यन्तु, पुण्यं
वर्धताम् कुलं गोत्रं चाभिवर्धेताम्, स्वस्ति भद्रं चास्तु, क्ष्वीं, क्ष्वीं, हं सः स्वाहा। श्री
मज्जिनेन्द्रचरणारविन्देष्वानन्दभक्तिः सदास्तु ।
- शांति पाठ, विसर्जन विधान का समापन करवाना चाहिए।
- तत्पश्चात् मंगल कलश को लेकर के वेदी की तीन परिक्रमा लगाना चाहिए तथा पुनः श्रीजी
को वेदी पर विराजमान करवाकर, अर्घ्य समर्पित करवाकर, ९ बार णमोकार मन्त्र की
जाप पूर्वक विधान की विधि का पूर्ण समापन करें।
संकलन
रुपेन्द्र शास्त्री, छिन्दवाडा
8233372891
[email protected]
मूल दस्तावेज़ (PDF): 254.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है