विधान प्रारम्भ करने की विधि (जैन विधि विधान) | Vidhan Prarambh Karne Ki Vidhi

विधान प्रारम्भ करने की विधि

जाप्य स्थापना

१. जाप में बैठने वालों के लिए आवश्यक नियम :-

(विधानाचार्य द्वारा निम्न नियम जाप में बैठने वाले भाइयों को बता दिए जायें)
(१) इन्द्रध्वज मंडल विधान में अपनी शक्ति व समय का विचार कर २१ हजार, ५१ हजार, ७१ हजार या सवा लाख तक जप प्रतिष्ठाचार्य द्वारा निर्दिष्ट मंत्र का किया जाना चाहिए ।
(२) जप करनेवाले व्यक्ति गृहीतमिथ्यात्व, लोकनिंद्यकार्य, अन्याय व अभक्ष्य के त्यागी अवश्य हों ।
(३) अनुष्ठान के दिनों में पूर्ण संयम, ब्रह्मचर्य से रहें ।
(४) रात्रि में चारों प्रकार के आहार ( खाद्य, पान, लेह, स्वाद्य ) ग्रहण नहीं करें । बाजार ( होटलादि ) का भोजन न लें । दिन में दो बार शुद्ध भोजन करें । बीच में पान, सुपारी, गुटका आदि का सेवन न करें ।
(५) मंत्र का शुद्ध उच्चारण करें एवं परस्पर बातें न करें ।
(६) शारीरिक व मानसिक व्याधियुक्त न हों ।
(७) जप के समय शुद्ध धोती-दुपट्टे पहनें ।
(८) मन्त्र का जाप प्रतिदिन करें तथा अपना संकल्प पूरा करें ।
(९) जप के पूर्ण होने पर्यंत यज्ञोपवीत धारण करें तथा सभी नियमों का पालन करें ।
(१०) महोत्सव की अवधि तक चमड़े की वस्तुओं के प्रयोग का त्याग करें ।
(११) सूर्योदय के पश्चात् एवं सूर्यास्त से पूर्व दिन में ही जप करें ।
२. जाप्य स्थापना विधि में निम्न कार्य सम्पन्न होंगे :-
(क) प्रारम्भिक तैयारी (ख) मंगल कलश स्थापना (ग) यन्त्राभिषेक (घ) अमृत स्नान (ड) मंगलाचरण (त) अंगन्यास (थ) पंचपरमेष्ठी पूजन (द) जाप संकल्प ।

(क) प्रारम्भिक तैयारी :-

विधान प्रारम्भ करने वाले दिन प्रातःकाल सूर्योदय के बाद जाप प्रारम्भ करें ।
जाप का स्थान एकान्त में हो, जहाँ बालक या अन्य जन जाप में व्यवधान न कर सकें ।
कमरा शुद्ध जल से धोकर साफ कर लिया जाए ।
पूर्व या उत्तर दिशा में सन्मुख शुद्ध जल से धोकर टेबिल, चौकी एवं सिंहासन रखें । टेबिल के ऊपर चंदोवा बाँधे तथा चंदोवे के बीच में सिंहासन के ऊपर छत्र बाँधे । टेबिल पर यंत्राभिषेक के लिए थाली, शुद्ध जल के दो कलश एवं शुद्ध वस्त्र रखें ।
टेबिल के दोनों ओर जाप में बैठनेवाले व्यक्तियों की संख्यानुसार शुद्धजल से धुले हुए पाटे लगा दिये जावें जिनपर निम्न सामग्री रखी जाए:-
[पूजन की सामग्री, पूजन की पुस्तक, माला, लवंग, एक कटोरी में संकल्प की सामग्री ( हल्दी, सुपारी, पीली सरसों ) एवं कागज पर लिखा हुआ जाप का मन्त्र]
सर्व प्रथम सिंहासन पर विनायकयन्त्र विराजमान करें ।

(ख) मंगल कलश स्थापना :-

मंगल कलश में हल्दी, सुपारी, सवा रुपया, पुष्प, पीली सरसों आदि डालकर उसके मुँह पर नारियल रखकर केशरिया कपड़े से रक्षा बंधन के धागे से अच्छी तरह पहिले से बंद कर चंदन, गोटा, कागज आदि की माला तैयार रखें । विधानाचार्य निम्न मन्त्र बोलकर विधान कराने वाले या अन्य प्रमुख व्यक्ति द्वारा यन्त्रजी के बांये तरफ पुष्पों से स्वस्तिक बनाकर मंगल कलश स्थापित करायें ।

ॐ अद्य भगवतो महापुरुषस्य श्रीमदादि ब्रह्मणो

मतेऽस्मिन्…मासे…पक्षे… तिथौ… वासरे…वर्षे इह…नगरे…मन्दिरे…कार्यस्य निर्विघ्नसमाप्त्यर्थं मण्डपभूमिशुद्ध्यर्थं पात्रशुद्ध्यर्थं शान्त्यर्थं पुण्याहवाचनार्थं पंचरत्न-गंधपुष्पाक्षतादिबीजपूरशोभित मंगलकलशस्थापनं करोम्यहम् क्ष्वीं क्ष्वीं हं सः स्वाहा ।

(ग) यन्त्राभिषेक :-

यन्त्र जी थाली में विराजमान करके विधानाचार्य निम्न मन्त्र बोलते हुए दो प्रमुख व्यक्तियों से यन्त्रजी का अभिषेक कराएँ ।

ॐ ह्रीं भूर्भुवः स्वरिह विघ्नौघवारकं यन्त्रं वयं परिषेचयामः ।

(अभिषेक के पश्चात् शुद्ध वस्त्र से यन्त्रजी को पोंछकर पुनः सिंहासन पर विराजमान करें ।)

(द) अमृतस्नान :-

विधानाचार्य, जाप में सम्मिलित होनेवाले सभी व्यक्तियों को हाथ धोकर दाहिने हाथ में जल लेने का निर्देश देते हुए निम्न मन्त्र बोलकर जल के छींटे मस्तक पर डालने को कहें ।

ॐ अंमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृतं द्रावय द्रावय सं सं क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं सं क्ष्वीं क्ष्वीं हं सं स्वाहा ।

(ङ) मंगलाचरण के लिए :-

प्रारम्भ में दिये गये मंगलाष्टक/मंगल पंचक पढ़ते समय प्रत्येक छन्द के अन्त में थाली में पुष्प क्षेपण करें ।

(त) अंगन्यास

मंगलाष्टक के बाद शरीर की रक्षा और ततद् दिशाओं से आनेवाले विघ्नों की निवृत्ति के लिए नीचे लिखे अनुसार अंगन्यास करें । दोनों हाथों से अंगुष्ठ से लेकर कनिष्ठिका पर्यन्त पाँचों अंगुलियों में क्रम से अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी की स्थापना करें ।
सर्वप्रथम दोनों हाथों के अंगूठों को बराबरी से मिलाकर सामने करें । इस मन्त्र का उच्चारण कर सिर झुकावें ।

ॐ ह्रां णमो अरहंताणं ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः

निम्न मन्त्र पढ़कर सिर झुकावें और दोनों हाथों की तर्जनियों (अंगूठे के पास की अंगुलियों) को बराबरी से मिलाकर सामने करें ।

ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः

निम्न मन्त्र पढ़कर सिर झुकावें फिर बीच की दोनों अंगुलियों को मिलाकर सामने करके-

ॐ ह्रूं णमो आइरीयाणं ह्रूं मध्यामाभ्यां नमः

निम्न मन्त्र पढ़कर दोनों अनामिकाओं को सामने करें, और-

ॐ ह्रौं णमो उवज्झायाणं ह्रौं अनामिकाभ्यां नमः निम्न मन्त्र पढ़कर सिर झुकावें फिर दोनों छिंगुरियों को मिलाकर सामने करें और-
ॐ ह्रः णमो लोए सव्वसाहूणं ह्रः कनिष्ठिकाभ्यां नमः निम्न मन्त्र पढ़कर सिर झुकावें फिर दोनों हथेलियों को बराबर सामने फैलाकर
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः करतलाभ्यां नमः निम्न मंत्र पढ़कर सिर झुकावें फिर दोनों करपृष्ठों को बराबर सामने फैलाकर-
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः करपृष्ठाभ्यां नमः निम्न मन्त्र पढ़कर सिर झुकावें और निम्न मन्त्र पढ़कर अपने सिर का स्पर्श करें ।
ॐ ह्रां णमो अरहंताणं ह्रां मम शीर्ष रक्ष रक्ष स्वाहा

निम्न मंत्र पढ़कर अपने मुख का स्पर्श करें -

ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं मम वदनं रक्ष रक्ष स्वाहा ।

निम्न मन्त्र पढ़कर हृदय का स्पर्श करें-

ॐ ह्रूं णमो आइरीयाणं मम हृदयं रक्ष रक्ष स्वाहा

निम्न मन्त्र पढ़कर नाभि का स्पर्श करें-

ॐ ह्रौं णमो उवज्झायाण ह्रौं मम नाभिं रक्ष रक्ष स्वाहा

निम्न मन्त्र पढ़कर पैरों का स्पर्श करें-

ॐ ह्रः णमो लोएसव्वसाहूणं ह्रः मम पादौ रक्ष रक्ष स्वाहा

निम्न मन्त्र पढ़कर शरीर पर जल सिंचन करें-

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः मम सर्वांग शुद्धि कुरु कुरु स्वाहा ।

निम्न मन्त्र पढ़कर प्रष्ठिाचार्य पूर्व दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों क्षेपण करें ।

ॐ ह्रां णमो अरहंताणं ह्रां पूर्वदिशः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

निम्न मन्त्र पढ़कर दक्षिण दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों क्षेपण करें ।

ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं दक्षिणदिशः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

निम्न मन्त्र पढ़कर पश्चिम दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों क्षेपण करें ।

ॐ ह्रूं णमो आइरियाणं ह्रूं पश्चिमदिशः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

निम्न मन्त्र पढ़कर उत्तर दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों क्षेपण करें ।

ॐ ह्रौं णमो उवज्झायाणं ह्रौं उत्तरदिशः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

निम्न मन्त्र पढ़कर दशों दिशाओं में पुष्प या पीली सरसों क्षेपण करें ।

ॐ ह्रः णमो लोएसव्वसाहूणं ह्रः सर्वदिग्भ्यः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

निम्न मन्त्र पढ़कर अपने शरीर का स्पर्श करें-

ॐ ह्रां णमो अरहंताणं ह्रां मम गात्रं रक्ष रक्ष स्वाहा ।

निम्न मन्त्र पढ़कर अपने वस्त्रों का स्पर्श करें-

ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं मम वस्त्रं रक्ष रक्ष स्वाहा ।

निम्न मन्त्र पढ़कर अपने पूजन सामग्री का स्पर्श करें-

ॐ हूँ णमो आइरीयाणं हूँ मम पूजा द्रव्यं रक्ष रक्ष स्वाहा ।

निम्न मन्त्र पढ़कर अपने खड़े होने की जगह की ओर देखें ।

ॐ ह्रौं णमो उवज्झायाणं मम पूजा स्थलं रक्ष रक्ष स्वाहा ।

निम्न मन्त्र पढ़कर चुल्लू में जल लेकर सब ओर क्षेपण करें ।

ॐ ह्रः णमो लोएसव्वसाहूणं ह्रः सर्वं जगत् रक्ष रक्ष स्वाहा ।

निम्न मन्त्र से चुल्लू के जल को मन्त्रित कर अपने सिर पर सींचें ।
क्षां क्षीं क्षूं क्षौं क्षः सर्वदिशासु, हां हीं हूँ हौ हः सर्वदिशासु ॐ ह्रीं अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणी अमृतं स्रावयं सं सं ब्लीं ब्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय ठः ठः ह्रीं स्वाहा ।
तदनन्तर प्रतिष्ठाचार्य पुष्प अथवा पीली सरसों को सात बार निम्न मंत्र पढक़र परिचारकों के सिर पर डालें ।

ॐ नमोऽर्हते सर्वं रक्ष रक्ष हूँ फट् स्वाहा ।

तत्पश्चात् निम्न मंत्र से पुष्प अथवा पीली सरसों को मंत्रित कर सब दिशाओं में फैंकें ।

ॐ हूँ फट् किरिट किरिट घातय घातय परिविघ्नान् स्फोटय स्फोटय सहस्रखण्डान् कुरु कुरु परमुद्रां छिन्द छिन्द परमन्त्रान् भिन्द भिन्द वाः वाः हूँ फट् स्वाहा ।

निम्न मन्त्र पढ़कर जप करनेवाले महाशयों के दाहिने मणिबन्ध (कलाई) में रक्षासूत्र बांधें ।

ॐ नमोऽर्हते सर्वं रक्ष रक्ष हूँ फट् स्वाहा ।

तदनन्तर निम्नोक्त श्लोक पढ़कर जप करनेवाले अपने ललाट पर केशर का तिलक लगावें-
मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी ।
मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो जैनधर्मोस्तु मंगलम् ।।
निम्न मंत्र का सबसे उच्चारण कराकर यज्ञोपवीत धारण करावें ।

ॐ नमः परमशान्ताय शान्तिकराय पवित्रीकरणाय अहं

रत्नत्रयस्वरूपं यज्ञोपवीतं दधामि मम गात्रं पवित्रं भवतु अर्हं नमः स्वाहा ।

(थ) पंच परमेष्ठी पूजन :-

पृष्ठ क्रमांक २९ पर दी गई पूजन पीठिका को पढ़कर पंचपरमेष्ठी पूजन करें ।

(द) जाप संकल्प :-

जिस मंत्र का जाप करना हो वह मंत्र जाप करने वाले प्रत्येक व्यक्ति से सुन लिया जाए, तथा शुद्ध उच्चारण का अभ्यास करा दिया जाए ।
जाप में बैठनेवाले व्यक्तियों की संख्या के आधार पर जाप की कुल संख्या का परिणाम इस प्रकार निर्धारित करें कि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन अधिकतम ७ या ९ मालाओं का जाप करे ।
जाप करनेवाले व्यक्ति खड़े होकर दाहिने हाथ में संकल्प की सामग्री ले लें ।
विधानाचार्य द्वारा निम्न मन्त्र छोटे-छोटे हिस्सों में पढ़ा जाए जिसे सभी लोग दोहराएँ । संकल्प करने के बाद संकल्प की सामग्री पाटे के दायें कोने पर रख दी जाए । यह सामग्री पूरे विधान पर्यन्त इसी स्थान पर रखी रहे ।

संकल्प लेने का मन्त्र

“ॐ जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे__ देशे__ प्रान्ते__ नगरे__ ऋतौ__मासे__तिथौ__संवत्सरे__जैन मन्दिरे__कार्यस्य निर्विघ्नसमाप्त्यर्थं__ इति प्रमितस्य जापस्य संकल्पं कुर्मः, निर्विघ्न समाप्तिर्भवतु अर्हं नमः स्वाहा ।” जाप के मंत्र - निम्न में से प्रसंगानुसार किसी एक मन्त्र के जाप का संकल्प करायें ।
(१) ॐ ह्रीं अर्हं अ सि आ उ सा सर्वशान्ति कुरु कुरु स्वाहा ।
(२) ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ सि आ उ सा सर्वशान्ति कुरु कुरु स्वाहा ।
(३) ॐ ह्रौं ह्रीं श्री क्लीं अर्हं अ सि आ उ सा अनाहत विद्यायै णमो अरहंताणं सर्व शान्ति कुरु कुरु स्वाहा ।
(४) ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ सि आ उ सा मध्यलोकसम्बन्धी चतुशताष्टपंचाशज्जिन चैत्यचैत्यालयेभ्यो नमः ।
(५) ॐ ह्रीं मध्यलोकसंबंधी शाश्वतजिनालयजिनबिम्बेभ्यो नमः ।

ध्वजारोहण विधि

मण्डप की अग्रभूमि में व्यवस्थानुसार ध्वजदण्ड के पास ऊँची टेबुल पर सिंहासन में विनायक यंत्र विराजमान कर पंचपरमेष्ठी की पूजन करें । पूजनोपरान्त मन्त्रोच्चार करते हुये ध्वजारोहणकर्त्ता द्वारा ध्वजदण्ड की शुद्धि कराके उस पर रक्षा सूत्र बंधवा दें ।
निम्न मन्त्र द्वारा ध्वजदण्ड की शुद्धि करावें-

ॐ ह्रीं श्री नमोऽर्हते पवित्र जलेन ध्वजदण्ड शुद्धिं करोमि ।

निम्न मन्त्र द्वारा ध्वजदण्ड में रक्षा सूत्र बंधावें-

ॐ ह्रीं त्रिवर्णसूत्रेण ध्वजदण्डं परिवेष्टयामि ।

ध्वजदण्ड एवं ध्वज पर केसर से स्वस्तिक बनाकर धर्मात्मा, ज्ञानी आदि प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा ध्वजारोहण कराया जाये । ध्वजारोहण के समय निम्न श्लोक एवं मंत्रोच्चार करें-
तदग्रदेशे ध्वजदण्डमुच्चैर्भास्वद्विमानं गमनाद्विस्थत् ।
निवेश्यलग्ने शुभभोपदेश्यं महत्पताकोच्छयणं विदध्यात् ।।

ॐ ह्रीं अर्हं जिनशासनपताके सदोच्छिता तिष्ठ तिष्ठ भव भव वषट् स्वाहा ।

ध्वजारोहण के पश्चात् सावधान होकर निम्न गीत बोला जाय जैन ध्वज गीत तर्ज- जन-गण-मन अधिनायक जय हे । …
मंगलमय अरु मंगलकारी, शासन ध्वज लहराता ।
अनेकान्तमय वस्तु व्यवस्था, का यह बोध कराता ।।
स्यादवाद शैली से जग का, संशय तिमिर मिटाता ।
चहुँगति दुःख नशाता, जन-गण-मन हरषाता ।।

जिन शासन सुखदाता ।।
सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चरणमय मुक्ति मार्ग दरशाता ।
जय हे… जय हे… जय हे… जय जय जय हे ।।

शासन ध्वज लहराता ।।
नांदी विधान (मंगल कलश स्थापना)
नंद धातु का प्रयोग आनन्दित होने के अर्थ में किया जाता है । इसमें पंच प्रत्यय लगाने से नांदी शब्द बनता है । नांदी विधान से आशय अनुष्ठान पर्यंत लोक के आरम्भ तथा इन्द्रियविषयों का त्याग करके आनन्दपूर्वक जिनेन्द्र प्रभु की उपासना करने से है । अनुष्ठान में सम्मिलित होने वाले सभी लोगों को नांदी विधान के समय उपस्थित रहना चाहिए । इसके अन्तर्गत मण्डल पर मंगल कलश की स्थापना की जाती है ।
जिस व्यक्ति ने मंगल कलश की बोली ली हो अथवा अनुष्ठान में सम्मिलित होने वालों में से प्रमुख व्यक्ति के घर से प्रातःकाल मंगल कलश पर श्रीफल रखकर उसे केसरिया वस्त्र से ढंककर तथा मंगल कलश में सवा रुपये, हल्दी, सुपारी, पीली सरसों आदि वस्तुएँ डालकर मंगल कलश को सजाना चाहिए । विधानाचार्य को मंगलाष्टक पढ़ते हुए पुष्पक्षेपण करना चाहिए तथा परिवार की सौभाग्यवती बहिनों द्वारा कलश पर स्वास्तिक कराना चाहिए । इसके पश्चात् उत्साहपूर्वक जिनेन्द्रभक्ति करते हुए बाजे-गाजे से जुलूस के रूप में मंगल कलश विधानस्थल तक लाना चाहिए तथा निम्न मंत्र बोलकर सौभाग्यवती बहिनों द्वारा मण्डल पर कलश स्थापित करना चाहिए ।

मंगल कलश स्थापना मन्त्र

ॐ अद्य भगवतो महापुरुषस्य श्रीमदादिब्रह्मणो मतेस्मिन… मासे…

पक्षे…तिथो… वासरे…वर्षे इह…नगरे…जिनमन्दिरे… मंडलविधानस्य निर्विघ्नसमाप्त्यर्थं मण्डपभूमिशुद्धयर्थं पात्रशुद्धयर्थं शान्त्यर्थं पुण्याहवाचनार्थं पंचरत्नगन्धपुष्पाक्षतादिबीज पूरशोभितं मंगलकलशस्थापनं करोम्यहं क्ष्वीं क्ष्वीं हं सः स्वाहा ।

इन्द्र प्रतिष्ठा

इन्द्रों, इन्द्राणियों के लिए आवश्यक निर्देश-
(१) नियमित रूप से विधान में अन्त तक सम्मिलित रहें ।
(२) स्वस्थ हों ।
(३) विकलांग न हों ।
(४) हीन आचरण वाले न हों ।
(५) विधान के अन्त तक संयम (ब्रह्मचर्य) से रहें ।
(६) गृहस्थोचित शुद्ध भोजन एक या दो बार करें । बीच में पान, सुपारी, गुटका, तम्बाखू आदि न खायें ।
(७) विधान पर्यन्त व्यापार आदि लौकिक कार्यों की चिन्ता से मुक्त रहें ।

(इन्द्राणी ६ माह से अधिक गर्भवती न हो)
इन्द्र-इन्द्राणियों को उत्तम पीत वस्त्र धारण करावें । मुकुट बांधें तथा निम्नानुसार मन्त्रोच्चारणापूर्वक क्रिया करावें ।
निम्न मन्त्र द्वारा रक्षा सूत्र बाँधें-

ॐ नमोऽर्हते सर्वं रक्ष हूँ फट् स्वाहा ।

निम्न मन्त्र द्वारा अमृत स्नान करावें-

ॐ अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृतं स्रवय स्रवय सं सं क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं सं क्ष्वीं क्ष्वीं हं सं स्वाहा ।

तदनन्तर चन्दन, मुकुट, माला, केयूर, हार, कुण्डल आदि उपलब्ध आभूषणों को एक थाली में रखकर मण्डल के सामने रखें और प्रतिष्ठाचार्य निम्नलिखित मन्त्र बोलकर उन पर पुष्प तथा पीली सरसों डालें ।

ॐ ह्रां णमो अरहंताणं ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ॐ ह्रूं णमो आइरीयाणं ॐ ह्रौं णमो उवज्झायाणं ॐ ह्रः णमो लोए सव्वसाहूणं इन्द्र-इन्द्राण्योराभूषणानि पवित्राणि कुरु कुरु स्वाहा ।

निम्न श्लोक और मन्त्र बोलकर ललाट, मस्तक, ग्रीवा, हृदय, दोनों भुजाएँ, प्रकोष्ठ, नाभि और पृष्ठ भाग में नौ तिलक लगावें ।
पात्रेऽर्पितं चन्दनमौषधीशं शुभ्रं सुगन्धाहृतचंचरीकम् ।
स्थाने नवांके तिलकाय चर्च्यं न केवलं देहविकारहेतोः ।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः मम सर्वांगशुद्धिं कुरु कुरु स्वाहा ।

निम्न श्लोक पढ़कर माला पहिनावें-
जिनांघ्रिभूमिस्फुरितां स्रजं मे स्वयंवरं यज्ञविधानपत्नी ।
करोतु यत्नादचलत्वहेतोरितीव मालामुरीकरोमि ।।
निम्न श्लोक पढ़कर अधोवस्त्र का स्पर्श करावें-
धौतान्तरीयं विधुकान्तिसूत्रैः सद्ग्रन्थितं धौतनवीनशुद्धम् ।
नग्नत्वलब्धिर्न भवेच्च यावत् संधार्यते भूषणमूरूभूम्याः ।।

निम्न श्लोक पढ़कर दुपट्टे का स्पर्श करावें-
संव्यानमंचद्दशया विभान्तमखण्डधौताभिनवं मृदुत्वम् ।
संधार्यते पीत-सितांशुवर्णमंशोपरिष्टाद्धृतभूषणांकम् ।।
निम्न श्लोक पढ़कर मुकुट बंधवावें-
शीर्षण्यशुम्भन्मुकुटं त्रिलोकी हर्षाप्तराज्यस्य च पट्टबन्धम् ।
दधामि पापोर्मिकुलप्रहन्तृ रत्नाद्यमालाभिरुदन्चितांगम् ।।

निम्न श्लोक पढ़कर कण्ठ में कण्ठाभरण पहिनावें-
ग्रैवेयकं मौक्तिकदामधाम - विराजितस्वर्णनिबद्धयुक्तम् ।
दधेऽध्वरार्पणविसर्पणेच्छु - र्महाधनाभोगनिरूपणांकम् ।।
निम्न श्लोक पढ़कर हार धारण करावें-
मुक्तावलीगोस्तनचन्द्रमाला विभूषणान्युत्तमनाकभाजाम् ।
यथार्हसंसर्गगतानि यज्ञ-लक्ष्मी समालिंगनकृद्दधेऽहम् ।।

निम्न श्लोक पढ़कर कानों में कर्णाभरण धारण करावें-
एकत्र भास्वानपरत्र सामः सवां विधातुं जिनपस्य भक्त्या ।
रूपं परावृत्य च कुण्डलस्य मिषादवाप्ते इव कुण्डले द्वे ।।
निम्न श्लोक पढ़कर केयूर-बाजूबंद धारण करावें-
भुजासु केयूरमपास्तदुष्ट वीर्यस्य सम्यक् जयकृद् ध्याजांकम् ।
दधे निधीनां नवकैश्च रत्नै-र्विमण्डितं सद्ग्रथितं सुवर्णै ।।

निम्न श्लोक पढ़कर यज्ञोपवीत पहनावें-
यज्ञार्थमेव सृजतादिचक्रेश्वरेण चिन्हं विधिभूषणानाम् ।
यज्ञोपवीतं विततं हि रत्नत्रयस्य मार्गं विदधाम्यतोऽहम् ।।
निम्न श्लोक पढ़कर कटिसूत्र धारण करावें -
अन्यैश्च दीक्षां यजनस्य गाढं कुर्वद्भिरिष्टैः कटिसूत्रमुख्यैः ।
संभूषणैर्भूषयता शरीरं जिनेन्द्रपूजा सुखदा घटेत ।।

निम्न श्लोक पढ़कर घर गृहस्थी के कार्यों से उत्सव पर्यन्त निवृत्त रहने की प्रतिज्ञा करावें-
विधेर्विधातुर्यजनोत्सवेऽहं गेहादिमूर्च्छामपनोदयामि ।
अनन्यचेताः कृतिमादधामि स्वर्गादिलक्ष्मीमपि हापयामि ।।
निम्न मन्त्र २१ बार पढ़कर इन्द्रों पर सरसों क्षेपण करें-

ॐ वज्राधिपतये आं हां अः ऐं ह्रौं हः क्षूं क्षं क्षः इन्द्राय संवौषट् ।

निम्न मंत्र पढ़कर यजमानादि पर पुष्प क्षेपण करें-

ॐ ह्रीं अर्हं अ सि आ उ सा णमो अरहन्ताणं सप्तर्द्धि समृद्धि समृद्धगणधराणां अनाहतपराक्रमस्ते भवतु भवतु ह्रीं नमः ।


स्रोत: जैन विधि विधान (सं. पण्डित अभयकुमार जैन, अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन), पृष्ठ ८ से १७