विधान-पीठिका | Vidhan Peethika

गीतिका

१. श्री आदिनाथ भगवान्
लीन हो निज ध्येय में, सर्वज्ञ पद पाया प्रभो।
आदि तीर्थंकर नमन अविकार हो, सुखकार हो।।
अखिल जग में, एक शुद्धातम ही भासे सार है।
पाया स्वयं में ही अहो, आनंद अपरम्पार है ।।
२. श्री अजितनाथ भगवान्
मोह ही हुआ पराजित, अजित प्रभु अविजित रहे।
चिद्रूप को आराधकर, शिवभूप जिनवर हो गये ॥
ऐसा पराक्रम प्रगट होवे, निर्विकल्प रहूँ सदा।
संतुष्ट प्रभु निर्मुक्त निज में, सहज तृप्त रहूँ सदा ॥
३. श्री सम्भवनाथ भगवान्
अहो संभवनाथ दर्शन कर, परम आनन्द हुआ।
परभाव विरहित एक ज्ञायक भाव का दर्शन हुआ ।।
भावना जागी सहज, निग्रंथ पद अविकार हो।
तृप्त निज में ही सदा, पर की न चाह लगार हो।।
४. श्री अभिनन्दननाथ भगवान्
अहो अभिनन्दन प्रभो, स्वीकार अभिनन्दन करो।
आत्म आराधन करूँ मैं, आप प्रभु साक्षी रहो ॥
क्रूरता से शून्य होवे, सिंहवृत्ति ज्ञानमय।
रहूँ निज में मग्न सहजहिं, कर्म नाशें क्लेशमय ।।
५. श्री सुमतिनाथ भगवान्
कुमति वश धर निमित्त दृष्टि, सहा दुःख अपार है।
चिदानन्दमय आत्मा ही, अमित गुण भंडार है।।
आत्म आश्रय से जिनेश्वर, ध्रुव अचल शिवपद लहा।
धनि सुमति जिन, सुमतिदाता जगत् त्राता हो अहा ।।
६. श्री पद्मप्रभ भगवान्
स्वर्ण विरचित पंकजों की, पंक्ति प्रभो चरणों तले।
शोभती सु विहार काले, और बहु अतिशय धरे।
पद्मवत् निर्लिप्त मुद्रा, मुक्तिपथ दरशावती ।
पद्मप्रभ तुमको निरखते, याद अपनी आवती ॥
७. श्री सुपार्श्वनाथ भगवान्
हे सुपार्श्व जिनेन्द्र तेरा, स्तवन कैसे करूँ।
गुण अनन्त अहो अलौकिक, आदि अन्त नहीं लहूँ ॥
वचन में आवे नहीं, चिन्तन न पावे पार है।
स्वानुभवमय भक्ति वर्ते, वंदना अविकार है॥
८. श्री चन्द्रप्रभ भगवान्
सुधा झरती शांत मूरति, चन्द्रप्रभ अति सोहनी।
मोहनाशक दिव्यध्वनि, स्वामी परम मनमोहिनी ।।
चन्द्र किरणों के परस से, सिन्धु ज्यों उछले प्रभो।
उछले परम आनन्द सागर, सहज दरशन से विभो ॥
९. श्री पुष्पदंत भगवान्
हे प्रभो ! अध्यात्म विद्या, दिव्यध्वनि से तुम कही।
पुष्पदन्त जिनेन्द्र मुक्ति, की सुविधि भविजन लही।।
नाम सार्थक सुविधिनाथ, स्वपद भजूँ अतिचाव से।
निश्चिंत हूँ निर्द्वन्द्व हूँ रुचि लगी सहज स्वभाव से ॥
१०. श्री शीतलनाथ भगवान्
आधि-व्याधि-उपाधिमय, भवताप से तपता रहा।
अहो ! शीतलनाथ मम उर, दर्श से शीतल भया॥
परम शीतल तत्त्व, निज शुद्धात्मा पाया अहा।
तृप्त निज में ही रहूँ, संताप नहिं उपजे कदा ॥
११. श्री श्रेयांसनाथ भगवान्
निरपेक्ष होते भी अहो, जग दुख हरो श्रेयांस जिन ।
सहज जीते कर्म शत्रु, क्रोध बिन शस्त्रादि बिन।।
श्रृंगार बिन स्वामी स्वयं ही, जगत् के श्रृंगार हो।
ध्रुव श्रेय पाया नाथ, मेरी वंदना अविकार हो॥
१२. श्री वासुपूज्य भगवान्
चक्र से या वज्र से भी, मोह जो नशता नहीं।
जिननाथ तव उपदेश से, दुर्मोह नाशे सहज ही॥
इन्द्रादि से भी पूज्य स्वामिन्, वासुपूज्य सु नाम है।
सहज पूज्य स्वभाव पाया, नाथ सहज प्रणाम है॥
१३. श्री विमलनाथ भगवान्
स्नान बिन निर्मल हुए, प्रभु आप सहज स्वभाव से।
स्वयं छूटे कर्ममल, विभु आत्मध्यान प्रभाव से॥
विमल जिनवर दर्श करते, भेदज्ञान हृदय जगा।
भ्रान्ति विघटी शान्ति प्रगटी, भाव अति निर्मल भया ।।
१४. श्री अनन्तनाथ भगवान्
बसे सादि अनंत शिव में, परम आनन्द रूप हो।
प्रगटे अनन्त सुगुण जिनेश्वर, रहो ज्ञाता रूप हो॥
प्रभुता अनन्त सुज्ञान में भी, अनंत ही प्रतिभासती ।
प्रभु अनन्त सुदर्श से, महिमा अनन्त प्रकाशती ॥
१५. श्री धर्मनाथ भगवान्
जिन धर्म पाया भाग्य से, आनंद अपरम्पार है।
दीखे स्वयं में ही अहो, अक्षय विभव भंडार है॥
निन्दा करें या त्रास दें जन, धर्म नहीं छोडूं प्रभो।
हे धर्मनाथ जिनेन्द्र दुःखमय, बन्ध सब तोडूं विभो ।।
१६. श्री शान्तिनाथ भगवान्
जन्म क्षण में ही जगत् में, सहज ही साता हुई।
सहस्र नेत्रों देखते, नहीं इन्द्र को तृप्ति हुई॥
विभव चक्री का प्रभो निस्सार जाना आपने।
हे शान्तिजिन ! सुखशान्तिमय, निजपद प्रकाशा आपने॥
१७. श्री कुन्थुनाथ भगवान्
प्रभु अहिंसा धर्म जग में, आपने विस्तृत किया।
मैत्री-प्रमोद, दया तथा माध्यस्थ भाव सिखा दिया ।।
अनुभूत मुक्तिमार्ग का, उपदेश दे प्रभु शिव बसे।
हे कुन्थुनाथ जिनेन्द्र ! सहज सु, भक्ति उर में उल्लसे ॥
१८. श्री अरनाथ भगवान्
षट्खण्ड पर पाकर विजय, चक्री कहाए हे प्रभो।
फिर विजय पाकर मोह पर, तीर्थेश कहलाए विभो ।।
भव रहित भगवान् आत्मा, आप दर्शाया हमें।
अरनाथजिन ! उपकारवश, नितभाव से वन्दन तुम्हें ।।
१९. श्री मल्लिनाथ भगवान्
हे बाल ब्रह्मचारी प्रभो, चिद्ब्रह्म रस में रम रहे।
यौवन समय निर्ग्रन्थ दीक्षा, धार शिवचारी भये।॥
त्रैलोक्य जेता काम जीता, होय निर्मोही सहज ।
हे मल्लिजिन ! प्रभुरूप लखते, शीश झुक जाता सहज ।।
२०. श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान्
हे नाथ मुनिसुव्रत तुम्हें, पाकर सनाथ हुआ जगत्।
दिव्य ध्वनि सुनकर सु जाना, भविजनों ने सत् असत् ।।
असत् रूप विभाव तज, सत् भाव की आराधना।
भव्यजीव तिरें भवोदधि, हो सहज प्रभु वन्दना ॥
२१. श्री नमिनाथ भगवान्
अणुमात्र का स्वामित्व तज, त्रयलोक के स्वामी हुए।
आत्मा में मग्न हो, सर्वज्ञ जगनामी हुए॥
शुद्धात्मा ही मंगलोत्तम, शरण रूप अनन्य है।
हो नमन् नमि जिन ! आपको, नमनीय रूप अनन्य है ।।
२२. श्री नेमिनाथ भगवान्
हे नेमि प्रभु ! आदर्श है, वैराग्य जग में आपका।
चढ़ गये गिरनार स्वामी, तोड़ बन्धन पाप का॥
निर्ग्रथ हो, निर्द्वन्द हो, प्रभु मग्न निज में ही हुए।
प्रभुता सहज प्रगटी, अलौकिक तृप्त निज में ही हुए।।
२३. श्री पार्श्वनाथ भगवान्
नाग-नागिन दग्ध लखकर, करुण हो संबोधिया।
धरणेन्द्र पद्मावती हुए, वैराग्य प्रभु तुम भी लिया।।
निग्रंथ हो आत्मार्थ साधा, हो गये परमात्मा।
जग को बताया पार्श्वप्रभु, परमात्मा सब आत्मा ॥
२४. श्री महावीर भगवान्
जीता सुभट दुर्मोह सा प्रभु, मदन को निर्मद किया।
जग से विरत हो आत्मरत, परमात्म पद को पा लिया ।।
तत्त्वोपदेश दिया प्रभो ! आदेय शुद्धात्मा कहा।
हे वीर जिनवर तुम प्रसाद सु, सहज निजपद हम लहा ।।

मंगलाचरण

दोहा

नेता मुक्तिमार्ग के, साँचे तारणहार।
कर्म कलंक विनष्ट कर, हुए विश्व ज्ञातार ॥
तीर्थंकर चौबीस वर, मंगलमय अविकार।
भक्तिभाव से पूजते, मन में हर्ष अपार ।।
पूजों समुच्चय रूप से, अरु प्रत्येक-प्रत्येक।
अन्तर माँहिं निहारता, मैं अनेक में एक ॥
निजानन्द निज में लहूँ, भोगों की नहिं चाह।
पाऊँ मैं भी आप सम, रत्नत्रय की राह ।।
जब तक नहीं निर्ग्रथ पद, प्रगटे मंगलरूप।
जिनवर पूजन के निमित्त, भाऊँ शुद्ध चिद्रूप ॥
मुक्तिमार्ग की सुविधि ही, जान प्रशस्त विधान।
भक्ति भाव से पूजते, करूँ भेद-विज्ञान ।।
।। पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि ।।


Artist: रवींद्र जी आत्मन्
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह

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