वीतराग महिमा| Veetrag Mahima

(सवैय्या तेईसा)

निन्दक सों नहिं रोष करौ तुम, बन्दक पै करुँणा नहिं धारौ।
दुर्जन दुष्टन सौं नहिं बैर न, सज्जन सौं अनुराग तुम्हारौ।।
नीच निकृष्ट अपावन हू नर, पावन हो लखि रूप तिहारौ।
शांति सुधामय देखि मुखाम्बुज, दूरि भयो प्रभु दुःख हमारौ।।1।।

एक सुधी नर फूल मनोहर, लाय रचावत पूज तुम्हारी।
एक कुधी नर पाहन मारत, क्रोधित होकर काढ़त गारी।।
दोउन पै तुमरौ समभाव, न होय कभी तुम चित्त विकारी।
आतमज्योति जगी घट अंतर, वैर विरोध व्यथा वमि डारी।।2।।

सुष्क तलाव भरे जलसों फल, फूल छहौं रितु के फलि जावैं।
शेरनि दूध पिलावत गोसुत, नाहर के सुत गाय चुखावैं।।
मूसक नील भुजंग बिलाव, मयूर परस्पर प्रेम बढ़ावै।
राग विरोध विवर्जित साधु, जहाँ निवसें सब आनन्द पावैं।।3।।