वीरशासन जयन्ती पूजन (पं. अभयकुमार जैन) | Veershasan Jayanti Pujan (Pt. Abhaykumar Jain)

वीरशासन जयन्ती पूजन

रचयिता: पं. अभयकुमार जैन, देवलाली

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जिनदेशना पर्व

सर्वोदय अहिंसा
सर्वः सर्वत्र नन्दतु

वीरशासन
जयन्ती
पूजन

मधुर स्वर
पंडित ऋषभजी शास्त्री, पंडित विवेकजी जैन,
श्री सचिनजी जैन, छिंदवाड़ा

रचना
पंडित अभयकुमारजी जैन, देवलाली स्थापना (मरहठा माधवी)
धन्य धन्य सावन बदि एकम वाणी खिरी महान हैं।
वीर प्रभु के शुभ-शासन का हुआ सुमंगल गान हैं॥
केवलज्ञान हुआ प्रभुजी को समवसरण रचना हुई।
छ्यासठ दिन पश्चात् प्रभु की मंगलमय वाणी खिरी॥
सप्त तत्त्व अरु नव पदार्थ में हम सब चेतन द्रव्य हैं।
दर्श-ज्ञान-चारित्र एक ही सच्चे सुख का पंथ हैं॥
स्वानुभूति में सदा प्रकाशित ज्ञायक आनंद धाम हैं।
उदित हुआ कैंवल्य किरण से सम्यग्ज्ञान महान हैं॥

(दोहा)
आप्त-वचन दिखला रहे, भविजन को शिवपंथ।
आह्वानन थापन करूँ, नमूँ पंथ निर्ग्रन्थ॥
ॐ ह्रीं श्री शासननायक-तीर्थंकरवर्धमान-मुखोद्भूतदिव्यध्वनि!
अत्र अवतर अवतर संवौषट्। (इति आह्वानम्।)
ॐ ह्रीं श्री शासननायक-तीर्थंकरवर्धमान-मुखोद्भूतदिव्यध्वनि!
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। (इति स्थापनम्।)
ॐ ह्रीं श्री शासननायक-तीर्थंकरवर्धमान-मुखोद्भूतदिव्यध्वनि!
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। (इति सन्निधिकरणम्।)

अष्टक
(हरिगीतिका)
ॐकार ध्वनि की भक्ति-जल से मोह का प्रक्षाल कर।
अर्पित करूँ प्रभु-चरण में जन्मादि रोग विनाश कर॥
जयवंत वर्ते वीर-शासन प्रभु! हमारे ज्ञान में।
शिवपंथ शाश्वत हैं यही नित वर्तता श्रद्धान में॥
ॐ ह्रीं श्री शासननायक-तीर्थंकरवर्धमान-मुखोद्‌भूतदिव्यध्वनये
जन्मजरामृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

निर्-अक्षरी वाणी प्रभु की ताप हरती जगत का।
स्वानुभव शीतल सुधा-रसमय वचन खिरते सदा॥
जयवंत वर्ते वीर-शासन प्रभु! हमारे ज्ञान में।
शिवपंथ शाश्वत हैं यही नित वर्तता श्रद्धान में॥

ॐ ह्रीं श्री शासननायक-तीर्थंकरवर्धमान-मुखोद्भूतदिव्यध्वनये
संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

स्याद्वाद कौशल से सदा अक्षत सुशासन आपका।
मम ज्ञान-श्रद्धा हो अखंडित नाश कर मिथ्यात्व का॥
जयवंत वर्ते वीर-शासन प्रभु! हमारे ज्ञान में।
शिवपंथ शाश्वत हैं यही नित वर्तता श्रद्धान में॥
ॐ ह्रीं श्री शासननायक-तीर्थंकरवर्धमान-मुखोद्भूतदिव्यध्वनये
अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

हे वीर! तव निष्काम भक्ति काम-रोग विनाशती।
ये काम-शर अर्पित चरण में ब्रह्म-भाव प्रकाशती॥
जयवंत वर्ते वीर-शासन प्रभु! हमारे ज्ञान में।
शिवपंथ शाश्वत हैं यही नित वर्तता श्रद्धान में॥
ॐ ह्रीं श्री शासननायक-तीर्थंकरवर्धमान-मुखोद्भूतदिव्यध्वनये
कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

स्वानुभूति-रस भरी वाणी प्रभु की अब सुनूँ।
आनन्द-अमृत पान कर प्रभु! चिर क्षुधा-व्याधि हरूँ॥
जयवंत वर्ते वीर-शासन प्रभु! हमारे ज्ञान में।
शिवपंथ शाश्वत हैं यही नित वर्तता श्रद्धान में॥
ॐ ह्रीं श्री शासननायक-तीर्थंकरवर्धमान-मुखोद्भूतदिव्यध्वनये
क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

हे नाथ! तेरे वचन भी निज-पर प्रकाश सदा करें।
श्रुतज्ञान-दीपक से भविक चिर मोह-तम का क्षय करें॥
जयवंत वर्ते वीर-शासन प्रभु! हमारे ज्ञान में।
शिवपंथ शाश्वत हैं यही नित वर्तता श्रद्धान में॥
ॐ ह्रीं श्री शासननायक-तीर्थंकरवर्धमान-मुखोद्भूतदिव्यध्वनये
मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु-वचन सौरभ व्याप्त हो त्रयलोक रूपी भवन में।
दुर्गन्ध मिथ्या मतों की कैसे रहे इस सदन में॥
जयवंत वर्ते वीर-शासन प्रभु! हमारे ज्ञान में।
शिवपंथ शाश्वत हैं यही नित वर्तता श्रद्धान में॥
ॐ ह्रीं श्री शासननायक-तीर्थंकरवर्धमान-मुखोद्भूतदिव्यध्वनये
अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु-वीर-वाणी वृक्ष पर आनंदमय शिवफल फलें।
मैं पुण्य-फल अर्पित करूँ शुद्धात्म ज्ञान सुफल मिलें॥
जयवंत वर्ते वीर-शासन प्रभु! हमारे ज्ञान में।
शिवपंथ शाश्वत हैं यही नित वर्तता श्रद्धान में॥
ॐ ह्रीं श्री शासननायक-तीर्थंकरवर्धमान-मुखोद्भूतदिव्यध्वनये
मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

यह स्वानुभूति-रस भरी वाणी महा अनमोल है।
हम भक्ति-अर्घ्य करें समर्पित पर न जाने मोल है॥
जयवंत वर्ते वीर-शासन प्रभु! हमारे ज्ञान में।
शिवपंथ शाश्वत है यही नित वर्तता श्रद्धान में॥
ॐ ह्रीं श्री शासननायक-तीर्थंकरवर्धमान-मुखोद्भूतदिव्यध्वनये
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला
(दोहा)
शाश्वत जिनशासन सदा, भविजन को सुखकार।
वही वीर-शासन अहो, वर्ते भरत मँझार॥
(वीरछन्द)
केवलज्ञान हुआ प्रभुजी को किन्तु दिव्यध्वनि नहीं खिरी।
अति आश्चर्य हुआ जग-जन को कैसी है यह अनहोनी॥
अनुपम समवसरण की रचना बारह सभा विराज रही।
प्रभु की अंतर्मुख मुद्रा को आशा भरी निहार रही॥

एक-एक दिन करके पूरे छ्यासठ दिन भी बीत गए।
हुआ इंद्र को भी अति अचरज अब तक प्रभु क्यों मौन रहे॥
झलका अवधिज्ञान में तत्क्षण योग्य शिष्य हो सकता कौन?
ॐकार ध्वनि झेल सके जो द्वादशांग रच सकता कौन?
शिष्य पाँच सौ के गुरु गौतम मिथ्या-मत में पड़े हुए।
किंतु इंद्र इस गौतम में ही महा-योग्यता देख रहे॥
तत्क्षण वेश बना ब्राह्मण का आ गौतम से प्रश्न किया।
काल तीन छह द्रव्य लेश्या की उलझन में मन मेरा॥

काललब्धि आई गौतम की प्रभु की ओर किया प्रस्थान।
मानस्तम्भ लखा जिनवर का गला तुरत मिथ्या अभिमान॥
नमन किया प्रभु को तत्क्षण ही जाग उठा कोई संस्कार।
सर्वारम्भ परिग्रह तज ली दीक्षा वेश-दिगंबर धार॥
धन्य बनी सावन बदि एकम खिरी प्रभु की दिव्यध्वनि।
स्वानुभूतिमय शिवपथ पाकर सारी जगती धन्य बनी॥
अनेकान्तमय वस्तुव्यवस्था जिनशासन में कही गयी।
स्याद्वाद शैली से संशय-विभ्रम-मोह-निशा विघटी॥

(दोहा)

यह अलंघ्य शासन अहो, सदा रहे जयवंत।
प्रज्ञा छैनी से प्रभो! पाऊँ भव का अंत॥

ॐ ह्रीं श्री शासननायक-तीर्थंकरवर्धमान-मुखोद्भूतदिव्यध्वनये
अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जिनध्वनि सुनकर हे प्रभो, प्रकटे दर्शन-ज्ञान।
अर्घ्य समर्पित चरण में, पाऊँ आनंद धाम॥

(पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि)


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF):

स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/15971।

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