वीराष्टकम् (वसन्ततिलका छन्द) | Veerashtakam

वीराष्टकम्

संस्कृत स्तोत्र, हिन्दी अर्थ सहित।
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भगवान् महावीर

भगवान् महावीर जैनधर्म के २४ वें तीर्थंकर हैं। अहिंसा और अपरिग्रह जिनदर्शन के मौलिक सिद्धान्त हैं। भगवान् महावीर की चर्या और उपदेशों से ही उनके समय में प्रचलित यज्ञ हिंसा का समापन हुआ। स्वतंत्र भारत के संविधान की पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर एक मात्र भगवान् महावीर का चित्र बना है, जो अहिंसा धर्म की उपासना और आस्था का प्रतीक है। वर्ष २००७ से गाँधीजी के जन्म दिवस २ अक्टूबर को अन्तर्राष्ट्रीय रूप से अहिंसा दिवस मनाने का संकल्प, समूचे विश्व में भगवान् महावीर के अहिंसा धर्म से ही विश्वशान्ति होगी, इस बात का संकल्प है।

वीराष्टकम् (बसन्ततिलकाच्छन्द) Veerastakam (Basanttilka metre)

गोशालपूरणमतादिबहुप्रवादै -
राप्ताभिमानघनवह्निविदग्धमानैः।
तीर्थंकरोऽहमिति घोषित एककाले
चिख्याससेऽतिशयमाप्त न हि स्वकीयम्॥ १॥

अन्वयार्थ : (आप्ताभिमानघनवह्निविदग्धमानैः) आप्त के अभिमान रूपी तीव्र अग्नि से जलने वाले (गोशालपूरणमतादि बहुप्रवादैः) गोशालक, पूरण मस्करी आदि लोगों ने अपने मत का खूब व्याख्यान द्वारा (अहं) मैं (तीर्थंकरः) तीर्थंकर हूँ (इति) इस प्रकार (एककाले) एक साथ (घोषितः) घोषणा कर दी (आप्त) हे वीर आप्त भगवन्! आपने (स्वकीयं अतिशयं) अपना अतिशय (न हि) नहीं (चिख्याससे) कहने की इच्छा की।

अर्थ : आप्त के अभिमान रूपी तीव्र अग्नि से जलने वाले गोशालक, पूरण मस्करी आदि लोगों ने अपने मत का खूब व्याख्यान द्वारा मैं तीर्थंकर हूँ इस प्रकार एक साथ घोषणा कर दी। हे वीर आप्त भगवन्! आपने अपना अतिशय नहीं कहा।

विशेषार्थ : भगवान् महावीर को जब केवलज्ञान हुआ था, उनका समवसरण देवों ने आकर लगाया, जो स्वयं अनेकानेक अतिशयों से सुशोभित थे, फिर भी आप्त भगवान् ने अपने अतिशय का बखान नहीं किया, अपने आपको तीर्थंकर घोषित नहीं किया। जबकि आपके समक्ष अन्य अनेक मतावलम्बी गोशालक, पूरणमस्करी आदि अपने-अपने मत का प्रचार करके अपने आपको तीर्थंकर कहकर अपने अभिमान की ज्वाला से जल रहे थे। सत्य है, जो वास्तव में महान् होता है वह अपनी महिमा का बखान अपने मुँह से नहीं करता है, इससे स्वतः सिद्ध हो जाता है कि भगवान् वर्द्धमान आप ही सच्चे तीर्थंकर आप्त हैं।

सिंहासनादिविभवैः परिवेष्टितोऽपि।
दिव्यातिदिव्यरमणीकरसंस्तुतोऽपि।
रागोरगेन चलितो न यथार्थतो यन्
नेता त्वमेव भगवन्नसि नो हितैषी॥ २॥

अन्वयार्थ : (सिंहासनादिविभवैः) सिंहासन आदि अष्ट प्रातिहार्य रूपी वैभव से (परिवेष्टितः अपि) घिरे रहते हुए भी (दिव्याति - दिव्यरमणीकर-संस्तुतः अपि) तथा अतिशय दिव्य अप्सराओं के हाथों से स्तुत होते हुए भी (यत्) चूंकि आप (यथार्थतः) वास्तव में (रागोरगेन) राग रूपी सर्प से (न चलितः) चलायमान नहीं हुए (भगवन्) इसलिए हे भगवन् (नः) हमारे (नेता त्वं एव) नेता आप ही हैं (हितैषी असि) तथा आप ही सच्चे हितैषी हो।

अर्थ : सिंहासन आदि अष्ट प्रातिहार्य रूपी वैभव से घिरे रहते हुए भी तथा अतिशय दिव्य अप्सराओं के हाथों से स्तुत होते हुए भी चूँकि आप वास्तव में राग रूपी सर्प से चलायमान नहीं हुए इसलिए हे भगवन्! हमारे नेता आप ही हैं तथा आप ही सच्चे हितैषी हो।

विशेषार्थ : अतिशयकारी वैभव से युक्त होते हुए भी और स्वर्ग की अनेक सुन्दर देवांगनाओं से स्तुत होते हुए भी आप रागान्वित नहीं हुए, अतः वीतरागी होने से आप ही हमारे नेता एवं हितैषी है, अन्य तो रागमूर्ति हैं, अतः वे सच्चे आप्त तथा हितैषी नहीं हो सकते हैं।

संस्तूयसे बुधजनैरिह संस्तवार्ह!
संस्तौम्यहं तदपि भक्तिबलातिभाग्यैः।
यन्मार्गतः सुविगतं हि गजस्य यूथं
किं तत्र यान्ति सततं करिशावका न? ॥ ३॥

अन्वयार्थ : (संस्तवार्ह!) हे स्तुति के योग्य भगवन् (इह) इस लोक में आप (बुधजनैः) गणधर आद ज्ञानीजनों के द्वारा (संस्तूयसे) स्तुति को प्राप्त हुए हो (तदपि) फिर भी (भक्तिबलातिभाग्यैः) भक्ति के बल से और महाभागी होने से (अहं) मैं भी (संस्तौमि) स्तुति करता हूँ। (यन्मार्गतः) जिस मार्ग से (गजस्य यूथं) बड़े-बड़े हाथियों का समूह (सुविगतं) निकल गया हो (किं) क्या (तत्र) उस मार्ग पर (सततं) निरन्तर (करिशावकाः) उन हाथियों के बच्चे (यान्ति न हि) नहीं जाते हैं।

अर्थ : हे स्तुति के योग्य भगवन्! इस लोक में आप गणधर आदि ज्ञानीजनों के द्वारा स्तुति को प्राप्त हुए हो फिर भी भक्ति के बल से और महाभागी होने से मैं भी स्तुति करता हूँ। जिस मार्ग से बड़े-बड़े हाथियों का समूह निकल गया हो, क्या उस मार्ग पर निरन्तर उन हाथियों के बच्चे नहीं जाते हैं?

विशेषार्थ : देवाधिदेव तो ज्ञानादि ऋद्धियों को धारण करने वाले गणधरादि देवों से स्तुति करने के योग्य हैं, फिर भी भक्ति की अधिकता और आपकी स्तुति करने के भाग्य से आपकी स्तुति को करूँगा ही क्योंकि जिस मार्ग से बड़े-बड़े हाथियों के झुण्ड गुजरते हैं, उसी मार्ग से क्या उनके बच्चे नहीं चलते? अर्थात् अवश्य चलते हैं।

त्वद्दर्शनेन मनसीदृश उच्चकैश्च
जातः प्रहर्षमयभूरिविभिन्नभावः।
साक्षादवाप्य निचितां चिति सौख्यभूतिं
किं वा भवेदमुकभाव उपाश्रयामि॥ ४॥

अन्वयार्थ : (त्वद्) आपके (दर्शनेन) दर्शन से (मनसि) मन में (ईदृशः) इस प्रकार का (उच्चकैः च) उत्कृष्ट (प्रहर्षमयभूरिविभिन्न-भावः) अन्तरंग में आनंदमय अत्यन्त भिन्न जाति का भाव (जातः) उत्पन्न होता है। (चिति) चैतन्य आत्मा में (निचितां) अत्यन्त संश्लेष भाव से खचित (सौख्यभूतिं) सुख की सम्पदा (साक्षात्) केवलज्ञान होने से प्रत्यक्ष (अवाप्य) प्राप्त करके (अमुकभावः) वह भाव (किं वा भवेत्) किस प्रकार का होगा, इसलिए आपके आश्रय में आता हूँ।

अर्थ : आपके दर्शन से मन में जब इस प्रकार का उत्कृष्ट आनंदमय अत्यन्त भिन्न जाति का भाव उत्पन्न होता है। चैतन्य आत्मा में अत्यन्त संश्लेष संयोग से खचित सुख की सम्पदा प्रत्यक्ष प्राप्त करके वह भाव किस प्रकार का होगा, इसीलिए आपके आश्रय में आता हूँ।

विशेषार्थ : भगवान् के बिम्ब के दर्शन से या उनके स्वरूप के चिन्तन से भक्त को अपूर्व आह्लाद होता है, क्योंकि आत्मा का श्रद्धान गुण उपशम या क्षयोपशम सम्यग्दर्शन के रूप में प्रकट होता है। जब साक्षात् भक्त स्वयं भगवान् बनेगा तो उसकी अपनी आत्मा से उत्पन्न होने वाला वह अनाकुल सुख किस प्रकार का होगा ऐसी कल्पना की मुझे आपके निकट ले आती है।

गर्भोत्सवे प्रतिदिनं पृथुरत्नवृष्टि-
र्जन्मोत्सवे स्नपनपात्रमभूत् सुमेरौ।
ज्ञानोत्सवेऽशुभदतीवसभा पृथिव्यां
मोक्षोत्सवे विलसते किल सिद्धभूमौ॥ ५॥

अन्वयार्थ : (गर्भोत्सवे) प्रभु के गर्भकल्याणक में (प्रतिदिनं) १५ मास तक प्रतिदिन (पृथुरत्नवृष्टिः) बहुत से रत्नों की वर्षा होती थी (जन्मोत्सवे) जन्मकल्याणक के समय (सुमेरौ) मेरु पर्वत पर (स्नपनपात्रम्) स्नान के पात्र (अभूत्) हुए। (ज्ञानोत्सवे) ज्ञानकल्याणक के समय (पृथिव्यां) विपुलाचल पर (सभा) समवसरण सभा (अतीव अशुभत्) अत्यन्त सुशोभित हुई थी (किल) तथा (मोक्षोत्सवे) मोक्षकल्याणक होने पर (सिद्धभूमौ) सिद्धभूमि पर (विलसते) वह प्रभु सुशोभित होते हैं।

अर्थ : प्रभु के गर्भकल्याणक में १५ मास तक प्रतिदिन बहुत से रत्नों की वर्षा होती थी, जन्मकल्याणक के समय मेरुपर्वत पर स्नान के पात्र हुए ज्ञानकल्याणक के समय विपुलाचल पर समवशरण सभा अत्यन्त सुशोभित हुई थी तथा मोक्षकल्याणक होने पर सिद्ध भूमि पर वह प्रभु सुशोभित होते हैं।

जातद्विषोर्विनिहतो हि विरोधभावो
गोसिंहयोश्च पिबतोर्जलमेकपात्रे।
देवाधिदेवचरणातिशयेन चित्र-
मेष प्रभाति विभवस्त्वयि साम्यभावात्॥ ६ ॥

अन्वयार्थ : (जातद्विषोः) जन्मजातवैर रखने वाले (एकपात्रे) एक ही पात्र में (जलं पिबतोः) जल पीने वाले (गोसिंहयोः) गाय और सिंह का (च) तथा अन्य प्राणियों का भी (हि) निश्चित ही (विरोधभावः) वैरभाव (विनिहतः) दूर हो जाता है सो (देवाधिदेवचरणातिशयेन) देवाधिदेव वीर प्रभु के चरणों के अतिशय से (चित्रं) यह वैचित्र्य होता है। (त्वयि) हे प्रभो। आप में (साम्यभावात्) समता का भाव होने से ही (एषः) यह (विभवः) वैभव (प्रभाति) देखा जाता है।

अर्थ : जन्मजात वैर रखने वाले एक ही पात्र में जल पीने वाले गाय और सिंह का तथा अन्य प्राणियों का भी निश्चित ही वैर भाव दूर हो जाता है सो देवाधिदेव वीर प्रभु के चरणों के अतिशय से यह होता है। हे प्रभो! आप में समता का भाव होने से ही यह वैभव देखा जाता है।

विशेषार्थ : प्रभु के अन्तरङ्ग में समता/ अहिंसक भाव प्रकट होता है, इस बात का पता बाहर जीवों के परस्पर में साम्य भाव से दिखता है। यह वैभव आप में ही देखा जाता है, अन्य में नहीं।

ज्ञानं त्वदीयममृतास्पदमाद्यमाप्यं
रूपञ्च चामरयुतं वरदामरार्च्यम्।
त्रैलोक्यसारमननं मननीयमिष्टं
विश्रम्भधाम सुखदं सदयं सदेदम्॥ ७॥

अन्वयार्थ : (वरद) हे उत्कृष्ट वस्तु देने वाले प्रभो! (त्वदीयं ज्ञानं) आपका ज्ञान (अमृतास्पदं) अमृत का स्थान है (आद्यं) प्रमुख है (आप्यं) प्राप्त करने योग्य है। (च) तथा (रूपम्) आपका रूप (चामरयुतं) चामरों से युक्त और (अमरार्च्यम्) देवों के द्वारा पूजनीय है। (इदं) यह (विश्रम्भधाम) विश्वास का स्थान (त्रैलोक्यसारमननं) त्रिलोक में सार होने से मनन योग्य है (मननीयं) तर्क संगत है (सदा इष्टं) सभी को इष्ट हैं (सुखदं) सुख को देने वाला है (सदयं) दया से सहित है।

अर्थ : हे उत्कृष्ट वस्तु देने वाले प्रभो! आपका ज्ञान अमृत का स्थान है, प्रमुख है, प्राप्त करने योग्य है। तथा आपका रूप चामरों से युक्त और देवों के द्वारा पूजनीय है। यह विश्वास का स्थान त्रिलोक में सार होने से मनन योग्य है, तर्क संगत है, सदा सभी को इष्ट है, सुख को देने वाला है और दया से सहित है।

लोके बुभूविथ यथाऽस्मि तथाऽत्रकाले
मोहाभिभूतमनसा भ्रमधीबलेन।
हे वीरदेव! कुरुतात् करुणां कृपालो!
यस्मादहं तव महात्मसमं भवामि॥ ८॥

अन्वयार्थ : (यथा) जिस प्रकार (लोके) इस त्रिभुवन में (बुभूविथ) अतीत में आप थे (तथा) उसी प्रकार (मोहाभिभूतमनसा) मोह से पराजित मन वाला (भ्रमधीबलेन) भ्रान्त बुद्धि से (अत्र काले) वर्तमान में (अस्मि) मैं हूँ। (हे वीरदेव!) हे वीर प्रभु (कृपालो!) हे कृपालु (करुणां) करुणा (कुरुतात्) करो (यस्मात्) जिससे (अहं) मैं (तव) आपके (महात्मसमं) महान् आत्मा के समान (भवामि) हो जाऊँ।

अर्थ : जिस प्रकार इस त्रिभुवन में अतीत में आप थे उसी प्रकार मोह से पराजित हुआ भ्रान्त बुद्धि से वर्तमान में मैं हूँ। हे वीर प्रभु! हे कृपालु! करुणा करो जिससे मैं आपके समान महान आत्मा हो जाऊँ।

विशेषार्थ : प्रभु का जो अतीत था, मेरा वह वर्तमान है, अब प्रभु से विनती है कि भविष्य आप जैसा हो जावे।

(द्रुतविलम्बित छन्द)
त्वयि यतौ मम रागविचेष्टनं
परमकारणमस्ति हि मुक्तये।
इति विचार्य कृता तव संस्तुति-
र्जगति को न करोति नृपे नुतिः॥ ९॥

अन्वयार्थ : (त्वयि यतौ) आप केवलज्ञानी भगवान् में (मम) मेरी (रागविचेष्टनं) यह राग चेष्टा (मुक्तये) मुक्ति के लिए (हि)निश्चय ही (परमकारणं) उत्कृष्ट साधन (अस्ति) है (इति) इस प्रकार (विचार्य) विचार करके (तव संस्तुतिः) आपकी यह स्तुति (कृता) की है क्योंकि (जगति) इस संसार में (कः) कौन मनुष्य (नृपे) राजा के लिए (नुतिः) नमस्कार आदि गुणगान (न करोति) नहीं करता है? अर्थात् सभी करते हैं।

अर्थ : आप केवलज्ञानी भगवान् में मेरी यह राग चेष्टा मुक्ति के लिए निश्चित उत्कृष्ट साधन है इस प्रकार विचार करके आपकी यह स्तुति की है क्योंकि इस संसार में कौन मनुष्य राजा के लिए नमस्कार आदि गुणगान नहीं करता है? अर्थात् सभी करते हैं।

विशेषार्थ : जिस प्रकार लोक में महान् व्यक्ति का गुणगान रूप सराग चेष्टाएँ उस व्यक्ति की उन्नति में कारण बनती है, उसी प्रकार तीनों लोक के स्वामी प्रभु में सराग भक्ति, भक्त के उत्कर्ष का कारण है, यही सोचकर मैंने यह भक्ति की है।


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF):

स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/58495।