हे वीरनाथ तुम दर्शन कर, मन में अति ही आनंद हुआ।
सम्यक् मुक्ति का मार्ग दिखा, निश्चिंत हुआ निर्द्वन्द्व हुआ।।टेक।।
महिमा अन्तर में भास रही, शब्दों से कैसे कहूँ प्रभो।
हो अनन्य शरण सर्वस्व तुम्हीं, सर्वस्व समर्पण रहे विभो।।1।।
हो वीतराग निर्दोष परम है सहज शांत मुद्रा प्रभुवर।
यह जन्म जिनेश्वर सफल हुआ, रत्नत्रय पाया हे जिनवर।।2।।
है दिव्यज्ञान है दिव्य तेज, प्रभु सन्मुख राग नहीं टिकता।
ज्यों सूर्योदय से तिमिर नशे, त्यों सब संक्लेश स्वयं भगता।।3।।
अन्तर में ढलती वृत्ति सहज, हो सहज उदासी आनंदमय ।
जब तुम समीप आ जाता हूँ, गुण चिंतन करता मंगलमय ।। 4 ।।
हे लोकोत्तम आदर्श रहो, पुरुषार्थ जगे मेरा तुम सम।
निरपेक्ष रहूँ, संतुष्ट रहूँ निर्ग्रन्थ रहूँ मैं भी प्रभु सम।। 5।।
निज परम भाव आराध्य रहे, आराधन मंगल रूप सदा।
ज्ञाता हूँ ज्ञाता मात्र रहूँ, वैभाविक परिणति हो न कदा।। 6।।
अब नहीं कामना शेष रही, जग से निराश होकर आया।
निष्काम नमन हो चरणों में, प्रभु सम निज रूप मुझे भाया ।। 7 ।।
निज में ही निज से तृप्त रहूँ, निज की प्रभुता प्रगटाऊँगा।
तुम आवागमन विमुक्त हुए, मैं तुम समीप ही आऊँगा ।। 8 ।।
प्रभु महाभाग्य से पाया है, यह दुर्लभ मंगलमय अवसर।
श्रद्धा के सुमन समर्पित हैं, विचरूँ जिनपंथ अहो सत्वर ।। 9 ।।
जिननाथ सदा जयवंत रहे, नित भक्तिभाव से गुण गावें।
जिनतीर्थ सदा जयवंत रहे, हम नित्य नये मंगल पावें ।। 10 ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
खोज: Vir Bhakti Dashak