जगत व्यवस्था यदि देखोगे, सुखी नहीं हो पाओगे।
मिथ्या कर्त्ता बुद्धि से तो, भारी दुःख उठाओगे॥ १ ॥
सुख का साधन संयोगों को नहीं जुटाने से मिलता।
वस्तु व्यवस्था को यथार्थ समझे से सच्चा सुख होता॥ २ ॥
जितने द्रव्य जगत में दिखते हैं अत्यंत व्यवस्थित वे।
सदा अवस्थित निज स्वभाव में गुण पर्ययमय स्थित वे॥ ३ ॥
जो जिस समय अवस्था दिखती, यथा योग्य है वह भाई।
पूर्व अवस्था व्यय होने पर, वह तो निज क्रम से आई॥ ४ ॥
तुम अज्ञान मोह से उसको, इष्ट-अनिष्ट मान लेते।
अरे! भ्रान्तिवश आकुल-व्याकुल होते नाना दुःख सहते॥ ५ ॥
जब निज आत्म गुणों की भी तो स्वयं अवस्थाएँ होतीं।
करते तुम नाना विकल्प, किंचित् नहीं तदनुसार होती॥ ६ ॥
फिर भी दृष्टि नहीं बदलते, पर अनुकूल चाहते हो।
इच्छाओं का जाल बिछाकर, स्वयं दुःखी तुम होते हो॥ ७ ॥
निज स्वभाव की तिरस्कारिणी पर्याय दृष्टि ही दुःखदायी।
सहज अकर्त्ता ज्ञायक लखती, द्रव्यदृष्टि ही सुखदायी॥ ८ ॥
आत्मन् द्रव्यदृष्टि होते ही सुख समुद्र लहरायेगा।
अक्षय निज साम्राज्य मिलेगा, शिव स्वरूप प्रगटायेगा॥ ९ ॥
रचयिता - ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
Singer name - Preeti Jain