– वर्तमानकाल के 24 तीर्थंकरों के वर्ण संबंधी पद्य किसी को ज्ञात हो तो बताइये –
दो गोरे दो सावरे दो हरियल दो लाल।
बाकी कंचन वरन है तिन्हे नमाऊ भाल।।
दिगंबर में वर्ण का प्रमाण ग्रंथ तिलोयपण्णत्ति (गाथा 4/566) और निर्वाणकांड भाषा टीका है।
दिगंबर मूल प्राकृत गाथा—
रत्तो पउमप्पहो वासुपुज्जो य।
सेसा कंचणवण्णा सुपास-चंदप्पह-पुप्फदंत-तियला धवला।
मुणिसुव्वय-णेमि-किण्हा, णीलो मल्लि-पासो॥
संस्कृत छाया:
रक्तौ पद्मप्रभ-वासुपूज्यौ, शुक्ला: सुपार्श्व-चन्द्रप्रभ-पुष्पदन्ताः।
कृष्णौ मुनिसुव्रत-नेमि-नाथौ, नीलौ च मल्लि-पार्श्वौ।
शेषाः षोडश कांचनवर्णाः॥
दिगंबर मान्य 24 तीर्थंकरों के वर्ण - क्रम से
- कंचन / सुवर्ण वर्ण - 16 तीर्थंकर
तप्त-चामीकर-भासा: षोडश जिनवरा: कनकवर्णा:
नं - तीर्थंकर - वर्ण
1 - श्री ऋषभनाथ - तप्त स्वर्ण
2 - श्री अजितनाथ - सुवर्ण
3 -श्री सम्भवनाथ - सुवर्ण
4 - श्री अभिनंदननाथ - सुवर्ण
5 - श्री सुमतिनाथ - सुवर्ण
10 - श्री शीतलनाथ - सुवर्ण
11 - श्री श्रेयांसनाथ - सुवर्ण
13 - श्री विमलनाथ - सुवर्ण
14 - श्री अनंतनाथ - सुवर्ण
15 - श्री धर्मनाथ - सुवर्ण
16 - श्री शांतिनाथ - सुवर्ण
17 - श्री कुंथुनाथ - सुवर्ण
18 - श्री अरनाथ - सुवर्ण
21 - श्री नमिनाथ - सुवर्ण
24 - श्री महावीर स्वामी - सुवर्ण
शरीर के वर्ण द्वारा जैसे कि :-
श्रीचन्द्रप्रभनाथपुष्पदशनौ कुन्दावदात्तच्छवी,
रक्ताम्भोजपलाशवर्णपुष्पौ पद्मप्रभद्वादशौ ।
कृष्णौ सुव्रतयादवौ च हरितौ पार्श्वः सुपार्श्वश्च वै,
शेषाः सन्तु सुवर्णवर्णवपुषो मे षोडशाऽघच्छिदे । ।
चौबीस तीर्थंकरों में से आठवें चंद्रप्रभनाथ और नौवें पुष्पदन्तस्वामी कुंदपुष्प के समान
गौरवर्ण हैं। और पद्मप्रभ भगवान् तथा वासुपूज्य भगवान् का शरीर रक्तकमल के समान
अथवा ढाक के फूल के समान लालवर्ण का है। मुनिसुव्रतनाथ और सुपार्श्वनाथस्वामी
का शरीर हरित वर्ण है। बाकी के सोलह तीर्थंकरों का शरीर सुवर्ण के समान है।
अनगार धर्मामृत