वन्दौं अरिहंतादि गुरु वीतराग भगवान् | Vando Arihantadi guru vitrag bhagwan

बारह भावना

(मंगलाचरण)

वन्दौं अरिहंतादि गुरु, वीतराग भगवान्।
जिन वाणी की ज्योति से, जागे आत्मज्ञान॥

मिथ्या-निद्रा में पड़ा, युग-युग से अज्ञान।
बारह भावना जागृत करे, निज चैतन्य निदान॥

1- अनित्य भावना

यह तन जल की बूँद सम, क्षण में जाए ढलाय।
यौवन बिजली की लपट, कब आए कब जाय॥
राज्य, विभव, परिवार सब, स्वप्न समान पसार।
इन्द्रधनुष की छाँह सम, क्षणभंगुर संसार॥

जो आज खिला उपवन सरीखा, कल मुरझाता फूल।
अरे जगत् को माने नित्य/नित्य मानता जो इस जग को, वही करे निज भूल॥

2- अशरण भावना

काल-सिंह जब गर्जता, काँपे त्रिभुवन राज।
मंत्र-तंत्र धन-बल सभी, न कर सकें उपचार॥
देव न रक्षक, बन्धु न रक्षक, रक्षक न परिवार।
निज शुद्धात्मा शरण है, यही सत्य आधार॥

मरण समय सब छूटते, तन-धन-सुत-दल-साज।
चेतन! अपनी शरण में आ, यही अमोघ समाज॥

3- संसार भावना

भटका जीव अनन्त से, चौरासी के बीच।
कभी देव, कभी नरक में, सुख की खोज अतीव॥
जहाँ सुख माना आज तक, पाया केवल क्लेश।
मृगतृष्णा के जल समान, सब विषयों का वेश॥

राग-द्वेष की अग्नि में, जलता रहा अनन्त।
संसारासार पूर्णतः, आत्मा सुखमय सन्त॥

4- एकत्व भावना

आया जग में एकला, जाएगा भी एक।
कर्मों का फल भोगता, जीव अकेला नेक॥
माता-पिता, सुत, मित्र सब, मिलते राह प्रवास।
पंथी जैसे मेले में, फिर हो जाते नाश॥

निज परिणति का स्वामी मैं, मैं ही सुख-दुःख खान।
अपने ही पुरुषार्थ से, पाऊँ आत्मज्ञान॥

5- अन्यत्व भावना

मैं चेतन अविनाशी हूँ, यह देह जड़ अधम।
कैसे दोनों एक हों, भिन्न स्वभाव सनातन॥
धन, गृह, नारी, पुत्र सब, परद्रव्य के ढेर।
ममता की जंजीर में, क्यों बँधे अंधेरे॥

जो मेरा था ही नहीं, उससे कैसा मोह।
निज स्वरूप को भूलकर, क्यों सहता हूँ द्रोह॥

6- अशुचि भावना

माँस-रक्त की पोटली, यह शरीर असार।
नव-द्वारों से बह रहा, प्रतिपल मल अपार॥
चन्दन, केसर, पुष्प से, कितना इसे सजाय।
भीतर इसका रूप तो, घृणा स्वयं उपजाय॥

मैं तो निर्मल ज्ञानमय, शुद्ध चिदानन्द धाम।
देह नहीं पहचान मेरी, आत्मा मेरा नाम॥

7- आस्रव भावना

पाप कषाय विकार से, बहता कर्म प्रवाह।
राग-द्वेष के संग में, बढ़ती भव की चाह॥
मन-वच-काया चंचला, खोले बन्धन द्वार।
पुण्य-पाप दोनों करें, संसृति का विस्तार॥

क्षण भर जागो चेतना, पहचानो निज रूप।
आस्रव से ही जन्मता, भव-दुःख का प्रतिरूप॥

8- संवर भावना

ज्ञान-ज्योति जब जगमगे, मिटे मोह अंधकार।
तब कर्मों का मार्ग/पथ रुके, हो संवर साकार॥
समिति, गुप्ति, संयम सुधा, सींचे आत्म-विहार।
सुध उपयोगी चेतना, बनती जगत्-जिहाज॥

जहाँ न राग, न द्वेष हो, न शुभ-अशुभ विचार।
वहीं संवर का जन्म है, वहीं मोक्ष का द्वार॥

9- निर्जरा भावना

तप की ज्वाला प्रज्ज्वलित हो, जले कर्म का जाल।
समता-अम्बर में उड़े, चेतन बन निष्काल॥
ज्यों सूरज की किरण से, गलता हिम का ढेर।
त्यों आत्मानुभव से झरें, कर्मों के अंध फेर॥

निर्जरा की पावन धरा, मोक्ष-पुष्प खिलवाय।
बंधन के सब तार तब, सहज स्वयं कट जाय॥

10 - लोक भावना

अनादि-अनन्त लोक यह, षट् द्रव्यन का संघ।
न इसका कोई कर्ता है, न कोई इसका भंग॥
जीव, पुद्गल, धर्म-अधर्म, आकाश और काल।
अपने-अपने रूप में, करते नित्य विहार॥

इन सबसे मैं भिन्न हूँ, चैतन्य प्रकाश स्वरूप।
निज लोक मेरा आत्मपद, जहाँ न कोई रूप॥

11 - बोधिदुर्लभ भावना

दुर्लभ नरभव, दुर्लभ सम्यक्, दुर्लभ सत्संग ज्ञान।
दुर्लभ निज आतम की ओर, मुड़ता हुआ ये ध्यान॥
देव पदों को लाख मिले, मिले राज्य अपार।
पर सम्यग्दर्शन बिना, सब वैभव बेकार॥

अब जो अवसर मिल गया तो, मत करना बेकार।
मोक्ष-पथ का अवसर ये ही, ये ही बने निज का आधार॥

12- धर्म भावना

धर्म न केवल वेश है, धर्म न केवल क्रिया।
धर्म आत्म अनुभवमय, शुद्ध चैतन्य दिया॥
सम्यग्दर्शन मूल है, ज्ञान पुष्प मनभाव।
चारित्र उसका फल बने, मिटे सकल दुर्भाव॥

दया, क्षमा, समता, शुचि, जिनका पावन सार।
ऐसा धर्म धरो हृदय में, हो भव से बेड़ा पार॥

(उपसंहार)

बारह भावना भाव से, जो निज उर में धार।
राग-द्वेष की रात को, करता क्षण में पार॥

जागे दुर्लभ बोध तब, मिटे कर्म अंधकार।
ज्ञाता-द्रष्टा मात्र रहूँ, यही हृदय पुकार॥

निज स्वरूप में लीन हो, टूटे भव का फंद।
अनन्त शांति प्रकटे हृदय, बरसे आत्मानन्द॥

रचयिता:- पं आशुतोष शास्त्री, आरोन