वंदनाष्टक(शुद्ध भावमय त्रिभुवन) | Vandanastak(suddh bhavmay tribhuvan)

शुद्ध भावमय त्रिभुवन पूज्य है, पूर्ण बोधमय राज रे।
इन्द्रादिक चरणों में नत पर, आत्म विनत जिनराज रे।।1।।

अंग विकार अरु आयुध अम्बर, रहित दिगम्बर जिन मूरत।
अचल शान्तिमय ध्यानमग्न है, सौम्य अलौकिक जिन मूरत ।।2।।

खुला शास्त्र है मौन उपदेश है, सहज रूप अविकार है।
नासा दृष्टि ध्रुव परमेष्ठी, दशवे सुखकार है ।।3।।

अहो अतिन्द्रिय ज्ञानानंदमय, ब्रह्मचर्यमय मुक्त दशा।
पावन रत्नत्रयमय जीवन, की देती पावन शिक्षा ।4।।

दर्शन करते ही हे जिनवर, अपनी प्रभुता सहज दिखे।
भव-भव के दुःखकारी बंधन, चरणों में स्वयमेव कटे ।।5।।

करने धरने की आकुलता, सहजपने मिट जाती है।
परलक्षी वैभाविक वृत्ति, स्वयं शांत हो जाती है ।।6।।

जाननहार रहूं प्रभु सम ही, स्वयं स्वयं में तृप्त रहूं।
सहज निरापद सुखमय जीवन, स्वाश्रित काल अनंत जिऊँ।7।।

सहज नमन हो, भाव नमन हो, हो अद्वैत नमन स्वामी।
नहीं अपेक्षा नाथ जगत से, अभिरामी अन्तरयामी ।।8 ।।

Artist: ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’

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