वैशेषिक दर्शन में पदार्थ-निरूपण
-प्रो. वीरसागर जैन
प्रस्तावना
प्रायः सभी वैदिक और अवैदिक भारतीय दर्शनों में ‘पदार्थ’ का निरूपण उपलब्ध होता है | वहाँ पदार्थों की संख्या एवं स्वरूप दोनों के विषय में पर्याप्त मतभेद भी पाया जाता है | दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी को उन सभी का गहराई से अध्ययन करके निष्पक्ष रीति से ‘पदार्थ’ का सम्यक् ज्ञान करना चाहिए | यहाँ हम वैशेषिक दर्शन के अनुसार ‘पदार्थ’ का स्वरूप लिख रहे हैं | वैशेषिक दर्शन में भी इस विषय का प्रमुख ग्रंथ अन्नम्भट्ट द्वारा रचित ‘तर्कसंग्रह’ माना जाता है, अतः यहाँ उसी ‘तर्कसंग्रह’ को मुख्य आधार बनाकर ‘पदार्थ’ का स्वरूप लिखा जा रहा है | अतिरिक्त आधार के लिए ‘वैशेषिकसूत्र’ आदि ग्रन्थों की भी किंचित् सहायता ली गई है |
‘पदार्थ’ से अभिप्राय
सर्वप्रथम विचारणीय है कि ‘पदार्थ’ किसे कहते हैं ? ‘पदार्थ’ का लक्षण क्या है ?
उत्तर- ‘पदार्थ’ का लक्षण है- “पदजन्यप्रतीतिविषयत्वं पदार्थत्वम् ।” अर्थात् पद से उत्पन्न प्रतीति (ज्ञान) के विषय को ‘पदार्थ’ कहते हैं | तात्पर्य यह हुआ कि जो कुछ भी ‘पद’ से ज्ञेय या अभिधेय है, वह सब ‘पदार्थ’ है | ‘पद’ का ‘अर्थ’ ही ‘पदार्थ’ है- ‘पदस्य अर्थः पदार्थः’ | ‘पद’ का लक्षण है- ‘सुब्तिङन्तं पदम्’ (अष्टाध्यायी १-४-१४ ) अर्थात् जो सुबन्त या तिङन्त हो उसे पद कहते हैं | शब्द के मुख्य भेद दो होते हैं- सुबन्त और तिङन्त | संज्ञा पदों को सुबन्त कहते हैं और क्रिया पदों को तिङन्त कहते हैं | संज्ञा पदों को सुबन्त इसलिए कहते हैं, क्योंकि व्याकरण शास्त्र के अनुसार वे सु आदि प्रत्यय जुड़कर बनते हैं और क्रिया पदों को तिङन्त इसलिए कहते हैं, क्योंकि वे तिप् आदि प्रत्यय जुड़कर बनते हैं | जैसे कि रम् धातु में सु प्रत्यय जुड़ेगा तो वह ‘राम:’ ऐसा संज्ञा पद बनेगा और यदि तिप् प्रत्यय जुड़ेगा तो ‘रमते’ ऐसा क्रिया पद बनेगा | संज्ञाओं और क्रियाओं के इन सभी पदों को यहाँ ‘पद’ कहा गया है और जो इन पदों का वाच्यभूत अर्थ है वही पदार्थ है | इसी प्रकार अन्य सब समझ लेना चाहिए | पद और अर्थ में अंतर यह है कि पद शब्दात्मक है, किन्तु अर्थ वास्तविक सत्ता स्वरूप हैं | जैसे कि- ‘जलम्’ एक पद है किन्तु जो घट आदि पात्रों में स्थित जल नामक वस्तु है वह अर्थ है, पदार्थ है, पद का अर्थ है | निष्कर्ष यही हुआ कि जो सुबन्त और तिङन्त पदों का अभिधेय या वाच्यभूत अर्थ है वही पदार्थ है |
किन्तु यहाँ एक विशेष ज्ञातव्य विषय यह है कि पद का उक्त अर्थ व्याकरणशास्त्र के अनुसार तो सर्वथा उचित है, किन्तु वैशेषिक शास्त्र के अनुसार इसमें कुछ और भी विशेष है, क्योंकि वहाँ ‘पद’ का लक्षण बताया है- ‘शक्तं पदं’ अर्थात् जो भी अर्थ कथन में समर्थ है वह सब पद है, अतः इसके अनुसार ‘राम’ और ‘रमते’ तो पद हैं ही, किन्तु ‘सु’ और ‘तिप्’ भी पद हैं, क्योंकि वे भी अर्थ कथन में समर्थ हैं, उनका भी कुछ अर्थ है | जैसे कि ‘सु’ का अर्थ है- एकत्व | वैशेषिक शास्त्र में ‘शक्तं पदम्’ पर और भी गहन विमर्श किया गया है, परन्तु उस सबकी चर्चा का यहाँ अवकाश नहीं है ।
पदार्थों की संख्या एवं उनका संक्षिप्त परिचय
वैशेषिक दर्शन में पदार्थों की कुल संख्या सात मानी गई है, जैसा कि ‘तर्कसंग्रह’ में स्पष्ट कहा है -
“द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्त पदार्थाः ।”
अर्थात् द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव -ये सप्त पदार्थ हैं । इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
- द्रव्य- जिसमें द्रव्यत्व जाति रहती है अथवा जो कार्य मात्र का समवायी कारण है उसे द्रव्य कहते हैं ।
- गुण- जो द्रव्य और कर्म से भिन्न होकर सामान्य रहता है उसे गुण कहते हैं ।
- कर्म- जो संयोग से भिन्न होकर संयोग का असमवायी है उसे कर्म कहते हैं ।
- सामान्य- सामान्य को जाति भी कहते हैं । यह दो प्रकार का होता है- पर सामान्य और अपर सामान्य ।
- विशेष- जो अन्त्य होकर नित्य द्रव्य में रहता है उसे विशेष कहते हैं ।
- समवाय- नित्य सम्बन्ध को समवाय कहते हैं ।
- अभाव- भाव से भिन्न को अभाव कहते हैं । अथवा प्रतियोगी के ज्ञान के अधीन ज्ञान विषय को अभाव कहते हैं ।
अब इन सप्त पदार्थों का पृथक् पृथक् परिचय किंचित् विस्तार के साथ लिखते हैं ।
द्रव्य पदार्थ का परिचय
जिसमें द्रव्यत्व जाति रहती है अथवा जो कार्य मात्र का समवायी कारण है उसे द्रव्य कहते हैं । यथा-
“द्रव्यत्वजातिमत्त्वं समवायिकारणत्वं वा द्रव्यसामान्यलक्षणम् ।” -तर्कसंग्रह-टीका
यहाँ समवायी कारण विशेष ध्यान देने योग्य है । कारण तीन प्रकार के होते हैं- समवायी कारण, असमवायी कारण और निमित्त कारण । जिसमें समवाय सम्बन्ध से कार्य की उत्पत्ति हो उसे समवायी कारण कहते हैं, कार्य अथवा कारण के साथ एक अर्थ में समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध होता हुआ जो कारण है उसे असमवायी कारण कहते हैं और जो समवायी कारण एवं असमवायी कारण से भिन्न कारण हो उसे निमित्त कारण कहते हैं । यहाँ द्रव्य उसे ही कहा गया है जो कार्य का समवायी कारण हो ।
द्रव्यों की संख्या नौ ही होती है, उससे कम या अधिक नहीं । यद्यपि मीमांसक अंधकार को जोड़कर दस द्रव्य मानते हैं, किन्तु वैशेषिकों के अनुसार अंधकार तो तेज के अभाव का ही नाम है, पृथक् से कोई अन्य द्रव्य नहीं है । इन नौ द्रव्यों के नाम इस प्रकार हैं-
- पृथिवी, 2. अप, 3. तेज, 4. वायु, 5. आकाश,
- काल, 7. दिक्, 8. आत्मा 9. मन ।
वही वैशेषिकसूत्र, 1/1/5 में कहा गया है । यथा-
“पृथिव्यपतेजो वायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि ।”
अब इन सभी नव द्रव्यों का संक्षिप्त स्वरूप लिखने का प्रयास करते हैं -
1. पृथिवी- पृथिवी का लक्षण है- ‘गन्धवती पृथिवी’ अथवा ‘गन्धसमवायिकारणत्वं पृथिवीत्वम्’ अर्थात् जिसमें गन्ध रहता है उसे पृथिवी कहते हैं | यह पृथिवी दो प्रकार होती है- नित्या पृथिवी और अनित्या पृथिवी | परमाणु रूप पृथिवी को नित्या पृथिवी कहते हैं और कार्य रूप पृथिवी को अनित्या पृथिवी कहते हैं | अनित्या पृथिवी के पुनः तीन प्रकार होते हैं- शरीर, इन्द्रिय और विषय | हमारा आपका शरीर पृथिवी का शरीर है | पृथिवी का इन्द्रिय घ्राण है, क्योंकि वह गन्ध को ग्रहण करता है | पृथिवी का विषय मृत्तिका और पाषाण आदि है | पृथिवी के चौदह गुण माने गये हैं- रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व और वेग |
2. अप (जल) - जल का लक्षण है- ‘शीतस्पर्शवत्य आपः’ अथवा ‘शीतस्पर्शसमवायिकारणत्वं जलत्वम्’ अर्थात् जिसमें शीत स्पर्श रहता है उसे जल कहते हैं | यह जल दो प्रकार का होता है- नित्य जल और अनित्य जल | परमाणु रूप जल को नित्य जल कहते हैं और कार्य रूप जल को अनित्य जल कहते हैं | अनित्य जल के पुनः तीन प्रकार होते हैं- शरीर, इन्द्रिय और विषय | जल का शरीर वरुण है | जल का इन्द्रिय रसन है, जो जिह्वा के अग्र भाग में रहता है | जल का विषय नदी और समुद्र आदि है | जल के भी चौदह गुण माने गये हैं- रूप, रस, स्पर्श, संख्या, परिमाण, संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह और वेग |
3. तेज (अग्नि) - अग्नि का लक्षण है- ‘उष्णस्पर्शवत्तेजः’ अथवा ‘उष्णस्पर्शसमवायिकारणत्वं तेजत्वम्’ अर्थात् जिसमें उष्ण स्पर्श रहता है उसे तेज कहते हैं | यह तेज भी दो प्रकार का होता है- नित्य तेज और अनित्य तेज | परमाणु रूप तेज को नित्य तेज कहते हैं और कार्य रूप तेज को अनित्य तेज कहते हैं | अनित्य तेज के पुनः तीन प्रकार होते हैं- शरीर, इन्द्रिय और विषय | तेज का शरीर सूर्य है | तेज का इन्द्रिय नेत्र है, जो पुतली के अग्र भाग में रहता है | तेज का विषय भौम, दिव्य, उदर्य और आकरज के भेद से चार प्रकार का है | तेज के ग्यारह गुण माने गये हैं- रूप, स्पर्श, संख्या, परिमाण, संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परत्व, अपरत्व, द्रवत्व और वेग |
4. वायु- वायु का लक्षण है- ‘रूपरहितस्पर्शवान् वायुः’ अर्थात् जिसमें रूप नहीं है और स्पर्श है उसे वायु नामक द्रव्य कहते हैं | यह वायु भी दो प्रकार का होता है- नित्य वायु और अनित्य वायु | परमाणु रूप वायु को नित्य वायु कहते हैं और कार्य रूप वायु को अनित्य वायु कहते हैं | अनित्य वायु के पुनः तीन प्रकार होते हैं- शरीर, इन्द्रिय और विषय | वायु का शरीर वायु लोक में है | वायु का इन्द्रिय त्वक् है, जो समस्त शरीर में रहता है | वायु का विषय वृक्ष आदि के कम्पन का हेतु है | वह वास्तव में एक ही है, परन्तु उपधि-भेद से प्राण, अपान, समान, उदान एवं व्यान नामों से जाना जाता है | वायु के नौ गुण माने गये हैं- स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व और वेग |
5. आकाश- आकाश का लक्षण है- ‘शब्दगुणकमाकाशम्’ अथवा ‘शब्दसमवायिकारणत्वं आकाशत्वम्’ अर्थात् जिसमें शब्द गुण रहता है उसे आकाश नामक द्रव्य कहते हैं | यह आकाश एक, विभु और नित्य है | विभु का अर्थ है कि जो सम्पूर्ण मूर्त द्रव्यों का संयोगी है, उसे विभु कहते हैं | विभु चार द्रव्य माने गये हैं- आकाश, काल, दिक् और आत्मा | आकाश के छह गुण माने गये हैं- संख्या, परिमाण,पृथक्त्व, संयोग, विभाग और शब्द |
6. काल- काल का लक्षण है- ‘अतीतादिव्यवहारहेतुः कालः’ अथवा ‘विभुत्वे सति अतीतादिव्यवहारस्य निमित्तकारणत्वं कालत्वम्’ अर्थात् जो अतीतादि (अतीत, वर्तमान, भविष्य ) व्यवहार का निमित्त कारण है उसे काल द्रव्य कहते हैं | यह भी एक, विभु और नित्य है | काल के पांच गुण माने गये हैं- संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग |
7. दिक्- दिक् का लक्षण है- ‘प्राच्यादिव्यवहारहेतुर्दिक्’ अथवा ‘प्राच्यादिव्यवहारस्य असाधारण कारणत्वं दिक्त्वम्’ अर्थात् जो प्राची आदि ( प्राची, प्रतीची, उदीची, अवाची ) व्यवहार का असाधारण कारण है उसे दिक् द्रव्य कहते हैं | यह भी एक, विभु और नित्य है | दिक् के भी पांच गुण माने गये हैं- संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग |
8. आत्मा- आत्मा का लक्षण है- ‘ज्ञानाधिकरणमात्मा’ अर्थात् जो ज्ञान का अधिकरण है, आश्रय है, उसे आत्मा द्रव्य कहते हैं। यह दो प्रकार का है- जीवात्मा और परमात्मा | उनमें से जीवात्मा प्रत्येक शरीर में भिन्न, विभु और नित्य है | तथा परमात्मा ईश्वर (समर्थ) और सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) एक ही है | आत्मा के चौदह गुण गुण माने गये हैं- संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, और भावना |
9. मन- मन का लक्षण है- ‘सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः’ अर्थात् जो सुख-दुःख आदि की प्राप्ति के साधनरूप इन्द्रिय है, उसे मन द्रव्य कहते हैं | यह मन प्रत्येक आत्मा में नियत होने से अनंत, परमाणुरूप और नित्य है | मन के आठ गुण माने गये हैं- संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व और वेग |
गुण पदार्थ का परिचय
जो द्रव्य और कर्म से भिन्न होकर सामान्य रहता है उसे गुण कहते हैं | यही कहा है-
“द्रव्यकर्मभिन्नत्वे सति सामान्यवत्त्वं गुणसामान्यलक्षणम् ।” -तर्कसंग्रह-टीका
गुणों की संख्या चौबीस मानी गई है | उन सबका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
- रूप- मात्र चक्षु से ग्रहण किये जाने वाले गुण को रूप कहते हैं | यह सात प्रकार का है- शुक्ल, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश (काला पीला) और चित्र (चितकबरा ) |
- रस- रसना इन्द्रिय से ग्रहण किये जाने वाले गुण को रस कहते हैं | यह छह प्रकार का है- मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (कड़वा), कषाय (कषायला) और तिक्त (तीखा) |
- गन्ध- घ्राण इन्द्रिय से ग्रहण किये जाने वाले गुण को रस कहते हैं | यह दो प्रकार का है- सुरभि ( सुगन्ध) और असुरभि ( दुर्गन्ध ) |
4. स्पर्श- मात्र त्वक् (स्पर्शन) इन्द्रिय से ग्रहण किये जाने वाले गुण को स्पर्श कहते हैं | यह तीन प्रकार का है- शीत, उष्ण और अनुष्णाऽशीत |
5. संख्या- एकत्वादि व्यवहार के हेतुभूत गुण को संख्या कहते हैं |
6. परिमाण- मान (माप) के व्यवहार के असाधारण कारण को परिमाण कहते हैं | यह चार प्रकार का है- अणु (पतला), महत् (बड़ा), दीर्घ (लम्बा) और ह्रस्व (छोटा) |
7. पृथक्त्व- पृथक् व्यवहार के असाधारण कारण को पृथक्त्व कहते हैं |
8. संयोग- संयुक्त व्यवहार के असाधारण कारण को संयोग कहते हैं।
9. विभाग- संयोग के नाशजनक गुण को विभाग कहते हैं |
10. परत्व- पर व्यवहार के असाधारण कारण को परत्व कहते हैं।
11. अपरत्व- अपर व्यवहार के असाधारण कारण को अपरत्व कहते हैं।
12. गुरुत्व- आद्य पतन के असमवायि कारण को गुरुत्व कहते हैं |
13. द्रवत्व- आद्य स्यन्दन (चूने) के असमवायि कारण को द्रवत्व कहते हैं |
14. स्नेह- चूर्ण आदि के पिंडत्व के कारणभूत गुण को स्नेह कहते हैं |
15. शब्द- श्रोत्र इन्द्रिय से ग्रहण किये जाने वाले गुण को शब्द कहते हैं | यह दो प्रकार का है- ध्वन्यात्मक और वर्णात्मक | भेरी आदि के शब्द को ध्वन्यात्मक कहते हैं और संस्कृत आदि भाषा रूप शब्द को वर्णात्मक कहते हैं ।
16. बुद्धि- सर्व व्यवहार के हेतुभूत गुण को बुद्धि कहते हैं | इसे ज्ञान भी कहते हैं | इसके दो प्रकार हैं- स्मृति और अनुभव | संस्कार मात्र जन्य ज्ञान को स्मृति कहते हैं और उस स्मृति से भिन्न ज्ञान को अनुभव कहते हैं | स्मृति और अनुभव -ये दोनों भी दो दो प्रकार के होते हैं- यथार्थ और अयथार्थ | जहाँ जिसका सम्बन्ध है वहां उसके सम्बन्ध का अनुभव यथार्थ अनुभव है और जहाँ जिसके सम्बन्ध का अभाव है वहां उसके सम्बन्ध का अनुभव अयथार्थ अनुभव है | यथार्थ अनुभव को प्रमा भी कहते हैं | यह प्रमा अर्थात् यथार्थ अनुभव पुनः चार प्रकार का है- प्रत्यक्ष, अनुमिति, उपमिति और शाब्द | प्रमा (यथार्थ अनुभव) के करण को प्रमाण कहते हैं | यहाँ ‘करण’ शब्द महत्त्वपूर्ण है | करण अर्थात् साधकतम कारण, असाधारण कारण | किसी भी कार्य के आठ कारण माने गये हैं-
- ईश्वर, 2. ईश्वर का ज्ञान, 3. ईश्वर का प्रयत्न, 4. ईश्वर की इच्छा,
- काल, 6. धर्म-अधर्म, 7. दिशा, 8. प्रागभाव-प्रतिबन्धकाभाव,
ये सभी साधारण कारण हैं | इनको ‘करण’ नहीं कहा जा सकता | करण वही है जो असाधारण कारण है | कारण तीन प्रकार के होते हैं- समवायी कारण, असमवायी कारण और निमित्त कारण | जिसमें समवाय सम्बन्ध से कार्य की उत्पत्ति हो उसे समवायी कारण कहते हैं, कार्य अथवा कारण के साथ एक अर्थ में समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध होता हुआ जो कारण है उसे असमवायी कारण कहते हैं और जो समवायी कारण एवं असमवायी कारण से भिन्न कारण हो उसे निमित्त कारण कहते हैं।
प्रमाण चार प्रकार का होता है- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द |
प्रत्यक्ष प्रमाण- जो प्रत्यक्ष ज्ञान का असाधारण कारण (इन्द्रिय) है वह प्रत्यक्ष प्रमाण कहलाता है | प्रत्यक्ष प्रमाण के दो भेद हैं- निर्विकल्प प्रत्यक्ष और सविकल्प प्रत्यक्ष | प्रकारता (विशेषणता), विशेष्यता एवं संसर्गता शून्य ज्ञान को निर्विकल्प प्रत्यक्ष कहते हैं | नाम, जाति आदि विशेषण तथा विशेष्य के सम्बन्धावग्राही ज्ञान को सविकल्प प्रत्यक्ष कहते हैं | प्रत्यक्ष ज्ञान को सन्निकर्ष उत्पन्न करता है | सन्निकर्ष छह प्रकार का है- संयोग, संयुक्त समवाय, संयुक्त समवेत समवाय, समवाय, समवेत समवाय, विशेषण- विशेष्य भाव | इनका स्वरूप संक्षेप में इस प्रकार है-
- संयोग- द्रव्य के प्रत्यक्ष में संयोग सन्निकर्ष कारण होता है |
- संयुक्त समवाय- द्रव्य के गुण के प्रत्यक्ष में संयोग सन्निकर्ष कारण होता है |
- संयुक्त समवेत समवाय- रूपत्व के प्रत्यक्ष में संयोग सन्निकर्ष कारण होता है |
- समवाय- शब्द के प्रत्यक्ष में संयोग सन्निकर्ष कारण होता है।
- समवेत समवाय- शब्दत्व जाति के साक्षात्कार के प्रत्यक्ष में संयोग सन्निकर्ष कारण होता है ।
- विशेषण-विशेष्य भाव- अभाव के प्रत्यक्ष में संयोग सन्निकर्ष कारण होता है |
अनुमान प्रमाण- अनुमिति के करण को अनुमान कहते हैं | अनुमिति का अर्थ होता है- परामर्श से उत्पन्न ज्ञान | परामर्श का अर्थ है- व्याप्ति से विशिष्ट पक्षधर्मता ज्ञान को परामर्श कहते हैं | व्याप्ति- व्याप्य एवं व्यापक के साहचर्य नियम को व्याप्ति कहते हैं |
अनुमान प्रमाण दो प्रकार का होता है- स्वार्थानुमान और परार्थानुमान | स्वार्थानुमिति के करण को स्वार्थानुमान कहते हैं और परार्थानुमिति के करण को परार्थानुमान कहते हैं | जो अपने अर्थ को अर्थात् साध्य संशय निवृत्ति रूप प्रयोजन को सिद्ध करे उसे स्वार्थानुमिति कहते हैं और जिस अनुमिति से दूसरे का साध्य संशय निवृत्ति रूप प्रयोजन को सिद्ध होता है उसे परार्थानुमिति कहते हैं |
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उपमान प्रमाण- उपमिति के करण को उपमान प्रमाण कहते हैं | संज्ञा, संज्ञी और सम्बन्ध के ज्ञान को उपमिति कहते हैं ।
शब्द प्रमाण- ‘आप्तोपदेशः शब्दः’ अर्थात् आप्त के उपदेश को शब्द प्रमाण कहते हैं | यद्यपि सामान्य रूप से तो जो कंठ तालु आदि के उपघात से उत्पन्न होता है उसे शब्द कहते हैं, किन्तु ऐसा हर शब्द प्रमाण नहीं हो सकता है, अतः यहाँ कहा गया है कि ‘आप्तोपदेशः शब्दः’ अर्थात् जो आप्त के द्वारा कहा गया है, वही शब्द प्रमाण है | प्रश्न है कि आप्त कौन है ? वही कहते हैं कि- ‘रागादिवशादपि यः नान्यथावादी स आप्तः’ अर्थात् जो रागादि के वशीभूत होते हुए भी अन्यथावादी, मिथ्यावादी नहीं है, वही आप्त है | यहाँ आप्त के लिए ‘रागादिवशादपि’, रागादि के वशीभूत होते हुए भी -ऐसा कहा गया है, परन्तु ध्यान रहे वह रागादि के वशीभूत होकर कथन नहीं करता है | यदि करे तो वह आप्त नहीं हो सकता | यही कारण है कि दर्शन की अन्य शाखाओं में आप्त को रागादि से रहित ही स्वीकार किया गया है |
- सुख- जो सभी के अनुकूल ज्ञान का विषय है उसे सुख कहते हैं |
- दुःख- जो सभी के प्रतिकूल ज्ञान का विषय है उसे दुःख कहते हैं ।
- इच्छा- कामना को इच्छा कहते हैं |
- द्वेष- क्रोध को द्वेष कहते हैं ।
- प्रयत्न- कृति को प्रयत्न कहते हैं |
- धर्म- विहित कर्म से उत्पन्न गुण को धर्म कहते हैं ।
- अधर्म- निषिद्ध कर्म से उत्पन्न गुण को अधर्म कहते हैं |
- संस्कार- सामान्य गुण और विशेष गुण - इन दोनों में रहने वाली गुणत्व जाति जहाँ रहती है उसे संस्कार कहते हैं ।
कर्म पदार्थ का परिचय
चलन स्वरूप वाली क्रिया को कर्म कहते हैं, जैसा कि कहा भी है- चलनात्मकं कर्म | अथवा कर्म का लक्षण है- संयोगभिन्नत्वे सति संयोगाऽसमवायिकारणत्वं कर्म अर्थात् संयोग से भिन्न होकर जो संयोग का असमवायि कारण है उसे कर्म कहते हैं।
इसके पांच भेद होते हैं- उत्क्षेपण, अपक्षेपण, आकुंचन, प्रसारण और गमन | ऊर्ध्व देश में संयोग के कारण को उत्क्षेपण कहते हैं | अधो देश में संयोग के कारण को अपक्षेपण कहते हैं | शरीर के निकट संयोग के कारण को आकुंचन कहते हैं | शरीर के दूर संयोग के कारण को प्रसारण कहते हैं | इनके अतिरिक्त सभी क्रियाओं को गमन कहते हैं | गमन के अंतर्गत भ्रमण, रेचन, स्पंदन, निष्क्रमण, प्रवेशन आदि विविध क्रियाओं का समावेश होता है | उदाहरण के तौर पर-
किसी चादर आदि को प्रयत्न करके ऊपर उठाना उत्क्षेपण है |
उसे फिर से नीचे लाना अपक्षेपण है |
उसे तह करके समेट देना आकुंचन है |
उसे फिर से फैलाकर बिछा देना प्रसारण है |
और उसे हिलाना, घुमाना, कंपाना आदि अन्य सब क्रियाएँ गमन हैं ।
सामान्य पदार्थ का परिचय
सामान्य को ‘जाति’ भी कहते हैं | जो नित्य और एक होकर अनेकों में अनुगत है, उसे ‘सामान्य’ या ‘जाति’ कहते हैं । सामान्य का लक्षण है- ‘नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वं सामान्यम्’ अर्थात् जो नित्य होकर अनेक में समवाय सम्बन्ध से रहता है उसे सामान्य कहते हैं | यह सामान्य द्रव्य, गुण और कर्म में रहता है | सामान्य दो प्रकार का होता है- पर सामान्य और अपर सामान्य | जो अधिक देश में रहता है उसे पर सामान्य कहते हैं और जो अल्प देश में रहता है उसे अपर सामान्य कहते हैं | जैसे कि द्रव्यत्व सामान्य पृथिवी आदि समस्त द्रव्यों में रहता है अतः उसे अधिक देश में रहने के कारण पर सामान्य कहते हैं और पृथिवीत्व सामान्य केवल पृथिवी में ही रहता है अतः उसे अल्प देश में रहने के कारण अपर सामान्य कहते हैं ।
विशेष पदार्थ का परिचय
नित्य द्रव्य में रहने वाले व्यावर्तकों को विशेष कहते हैं | विशेष का लक्षण है- ‘अन्त्यत्वे सति नित्यद्रव्यवृत्तित्वं विशेषत्वम्’ अर्थात् जो अन्त्य होकर नित्य द्रव्य में रहता है उसे विशेष कहते हैं । विशेष अनन्त हैं | वे पृथिवि, जल, तेज और वायु के नित्य परमाणुओं में भी रहते हैं और आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन - इन नित्य द्रव्यों में भी रहते हैं |
यहाँ नित्य और अनित्य का भी लक्षण समझ लेना चाहिए | जो ध्वंस से भिन्न होकर ध्वंस का प्रतियोगी नहीं है उसे नित्य कहते हैं और जो ध्वंस का प्रतियोगी है उसे अनित्य कहते हैं ।
समवाय पदार्थ का परिचय
नित्य सम्बन्ध को समवाय कहते हैं | समवाय का लक्षण है- ‘नित्यसम्बन्धत्वं समवायलक्षणम्’ अर्थात् अवयव और अवयवी के, जाति और व्यक्ति के, गुण और गुणी के, क्रिया और क्रियावान के और विशेष और नित्य द्रव्य के मध्य होने वाले सम्बन्ध को समवाय कहते हैं ।
तात्पर्य यह है कि दो अयुतसिद्ध पदार्थों का वह नित्य सम्बन्ध जिसके कारण ‘यह इसमें है’ - ऐसा प्रत्यय (प्रतीति, ज्ञान) होता है उसे समवाय कहते हैं | जैसे कि ‘तन्तुओं में पट है’ - यहाँ तन्तु और पट में अवयव-अवयवी रूप नित्य सम्बन्ध है, अतः इन दोनों में समवाय सम्बन्ध है | इसी प्रकार ‘अग्नि में उष्णत्व है’ - यहाँ भी अग्नि और उष्णत्व में अयुतसिद्ध सम्बन्ध है, अतः इन दोनों में भी समवाय सम्बन्ध है |
अभाव पदार्थ का परिचय
अभाव का लक्षण है- ‘भावभिन्नत्वं वा प्रतियोगिज्ञानाsधीनज्ञानविषयत्वम् अभावत्वम्’ अर्थात् भाव से भिन्न को अथवा प्रतियोगी के ज्ञान के अधीन ज्ञानविषय को अभाव कहते हैं ।
यह अभाव चार प्रकार का है- प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव |
प्रागभाव- जिसका आदि नहीं और अंत (नाश) है ऐसे अभाव को प्रागभाव कहते हैं | यह कार्य की उत्पत्ति के पहले रहता है | यही कहा भी है- ‘अनादिः सान्तः प्रागभावः, उत्पत्तेः पूर्वं कार्यस्य ।’ जैसे मृत्पिंड में घट नहीं है।
प्रध्वंसाभाव- जिसका आदि है और अंत नहीं है ऐसे अभाव को प्रध्वंसाभाव कहते हैं | यह कार्य की उत्पत्ति के बाद होता है | यही कहा भी है- ‘सादिरनन्तः प्रध्वंसः, उत्पत्त्यनन्तरं कार्यस्य ।’ जैसे घट कपाल में घट नहीं है।
यहाँ प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव में अंतर ध्यान देने योग्य है | कार्य की उत्पत्ति से पूर्व उसका अभाव प्रागभाव है और कार्य के नष्ट होने के बाद उसका अभाव प्रध्वंसाभाव है | इसके लिए मैं आपको एक सरल और व्यावहारिक उदाहरण देना चाहता हूँ | जैसे कि हम रेलवे स्टेशन गये, गाड़ी का समय पांच बजे का था | हम ठीक पांच बजे ही वहां पहुंचे | प्लेटफोर्म पर गाड़ी नहीं थी | हमने घबराकर किसी से पूछा कि गाड़ी क्यों नहीं है ? वह बोला- अभी आई नहीं है, लेट हो गई है | तो इसका नाम प्रागभाव है | प्रागभाव अर्थात् गाड़ी के आने से पूर्व उसका अभाव | किन्तु मान लीजिए कि उस व्यक्ति ने बताया होता कि गाड़ी अभी अभी चली गई है, आप लेट हो गये हैं | तो इसका नाम प्रध्वंसाभाव है | प्रध्वंसाभाव अर्थात् गाड़ी के जाने के बाद उसका अभाव |
अत्यन्ताभाव- जिसमें त्रैकालिक (भूत, भविष्य, वर्तमान त्रिकाल वर्ती) और संसर्ग से युक्त प्रतियोगिता है उस अभाव को अत्यन्ताभाव कहते हैं | जैसे कि इस भूतल पर घट नहीं है | कहा भी गया है कि- ‘त्रैकालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽभावोऽत्यन्ताभावः | यथा भूतले घटो नास्तीति ।’
अन्योन्याभाव- तादात्म्य सम्बन्ध से युक्त प्रतियोगिता वाले अभाव को अन्योन्याभाव कहते हैं | जैसे कि घट घट है, पट नहीं है | वही कहा है- ‘तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽन्योन्याभावः | यथा घटः पटो नेति ।’
अब हम इन चारों अभावों को एक निम्नलिखित उदाहरण से सरलतापूर्वक समझ सकते हैं-
प्रागभाव- जैसे कि मृत्पिंड में घट नहीं है, क्योंकि अभी उसकी उत्पत्ति नहीं हुई है |
प्रध्वंसाभाव- जैसे कि कपाल में घट नहीं है, क्योंकि वह उत्पन्न होकर नष्ट हो चुका है ।
अत्यन्ताभाव- जैसे कि इस भूतल पर घट नहीं है, क्योंकि यहाँ वह बिल्कुल नहीं था, नहीं है, नहीं होगा|
अन्योन्याभाव- जैसे कि घट घट है, पट नहीं है, क्योंकि घट पट रूप से नहीं है ।
इस प्रकार हमने यहाँ वैशेषिक मत के अनुसार द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव - इन सप्त पदार्थों का सामान्य परिचय प्राप्त किया | अब आगे इन्हीं सप्त पदार्थों में से ‘द्रव्य’ नामक प्रथम पदार्थ का किंचित् विस्तार के साथ निरूपण करते हैं, ताकि अन्य सभी पदार्थों के भी विस्तृत परिचय की प्रेरणा मिले |
उपसंहार
इस प्रकार यहाँ हमने वैशेषिक दर्शन के मूल ग्रंथ ‘तर्कसंग्रह’ को मुख्य आधार बनाकर सप्त पदार्थों का सरल परिचय प्राप्त किया | द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव -ये सप्त पदार्थ हैं | यहाँ हमने इन सभी सप्त पदार्थों के लक्षण एवं भेद-प्रभेद को भी भलीभांति समझने का प्रयास किया | इसमें भी द्रव्य पदार्थ का विशेष परिचय प्राप्त किया और जाना कि द्रव्य पदार्थ के कुल नौ भेद होते हैं- पृथिवी, अप, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा, मन | अन्त में अब हम एक बार पुन: इन सभी को एक सारिणी ( चार्ट ) के द्वारा सुगम रीति से समझने का प्रयास करते हैं, ताकि कहीं कोई भ्रम न रहे ।
( अलग से संलग्न है । )
सहायक ग्रंथ सूची-
- तर्कसंग्रह - अन्नम् भट्ट, व्याख्याकार आचार्य शेषराज शर्मा रेग्मी, प्रकाशक- चौखम्भा सुरभारती प्रकाशन, गोपालमंदिर लेन, वाराणसी
- तर्कसंग्रह - अन्नम् भट्ट, भाषाटीकाकार- परमहंस परमानन्द, कल्याण प्रेस, मुम्बई, विक्रम संवत् 1954
- वैशेषिकदर्शनम् - आचार्य उदयवीर शास्त्री, प्रकाशक- विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द, 4408, नई सडक, दिल्ली- 6
- वैशेषिक दर्शन : एक अध्ययन - श्रीनारायण मिश्र, चौखम्भा संस्कृत सीरिज आफिस, गोपालमंदिर लेन, वाराणसी
- वैशेषिक सूत्र - चौखम्भा प्रकाशन, गोपालमंदिर लेन, वाराणसी