बारह भावना
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ,
संसार, शरीर और भोगों की,असारता का जो बोध कराए,
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ,
यौवन हो, वैभव हो या हो पद बड़ा,
रूप-बल-नारी हो या घर रत्नों से जड़ा,
सब भोग क्षणिक ही तो हैं,
जैसे ढलते सूरज की हो प्रभा,
ऐसी अनित्य भावना भाएँ, भोगों से ममत्व को हटाएँ,
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ ||1||
अस्त्र शस्त्र हो, रक्षक हो या स्वयं बलवान,
देवी-देवता हो या कोई पंडित विद्वान्,
अंत समय से ना कोई बच पाए,
जैसे जाल में मीन फँस जाए,
ऐसी अशरण भावना भाएँ, यथार्थता को जान जाएँ,
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ ||2||
नर, नारकी, तिर्यंच हो या देव महान्,
जग में भटकते सहे दुःख अपार,
कष्ट-दुःखों से भरा ये संसार,
जैसे पंछी पिंजरे में छटपटाएँ,
ऐसी संसार भावना भाएँ, भवसागर में गोते न खाएँ,
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ ||3||
मात-पिता हो, पत्नी हो या पुत्र भला,
अंत समय कोई संग न चला,
कर्मों को अपने तू भोगे स्वयं,
जैसे खाया तेरा, तुझे लग जाए,
ऐसी एकत्व भावना भाएँ, निज में ही स्वयं को लगाएँ।
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ ||4||
धन, धान्य, चाँदी, सोना सब माने अपना,
है सब परिग्रह, तू छोड़े क्यों न,
तन से हैं ये भिन्न आत्मा,
जैसे दूध मिला जल, अलग कहाए,
ऐसी अन्यत्व भावना भाएँ, पर में न चित्त को लगाएँ।
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ ||5||
पुष्प-चंदन द्रव्यों से चाहे तन को सजा,
कितना भी कर शृंगार, ये अशुद्ध ही रहा,
मल-विष्ठा से ये मलिन रहे,
जैसे काँच चमकता, मणि न कहाए,
ऐसी अशुचि भावना भाएँ, तन से ममत्व को हटाएँ।
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ ||6||
योग, कषाय, असंयम, मिथ्यात्व,
कर्मों का आस्रव करता ही जाए,
राग-द्वेष से हो कर्मों का प्रवाह,
जैसे छिद्र से नौका में जल आ जाए,
ऐसी आस्रव भावना भाएँ, मोक्षमार्ग पर बढ़ जाएँ।
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ ||7||
समिति-गुप्ति-महाव्रत, संयम का पालन हो निरतिचार,
धर्म, परिषह, अनुप्रेक्षाएँ हैं संवर का सार,
कर्म रोकने का यही उपाय,
जैसे छिद्र बंद हो तो जल रुक जाए,
ऐसी संवर भावना भाएँ, भावों को विशुद्ध बनाएँ।
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ ||8||
इच्छाओं के त्याग का तप है उपाय,
कर्म जो बंधे सब नाश हो जाए,
कर्म निर्जरा हो अविपाक,
जैसे पूर्व भरा जल स्वयं हटाएँ,
ऐसी निर्जरा भावना भाएँ, तप से कर्म को खपाएँ।
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ ||9||
छह द्रव्य से निर्मित यह लोक कहाय,
जीव अनन्तानन्त भटकते ही जाएँ,
लोक शिखर पर सिद्ध सुहाए,
जैसे वायु बिन लौ ऊर्ध्व ही जाए,
ऐसी लोक भावना भाएँ, सिद्ध सम गुण पा जाएँ।
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ ||10||
निगोद से स्थावर, त्रस से मनुष्य भव पाए,
दुर्लभ मिला ये श्रावक कुल यूँ व्यर्थ ना जाए,
जिन कुल पाना दुर्लभ है,
जैसे रत्न समुद्र में खो जाए,
ऐसी बोधि दुर्लभ भावना भाएँ,
निलेश सम निर्मल ज्ञान को पाएँ।
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ ||11||
रत्नत्रय का पालन हो, धर्म कहलाए,
दया और अहिंसा का स्वरूप दर्शाए,
धर्म से हित आत्मा का है,
जैसे सिद्ध प्रभु मोक्ष सुख पाए,
ऐसी धर्म भावना भाएँ, भवसागर से तर जाएँ,
वैराग्य को जो जगाएँ, ऐसी बारह भावना भाएँ ||12||
Lyrics - निलेश जैन, उदयपुर @nilesh_jain