वैराग्य द्वादशी | Vairagya Dwadashi

ध्याऊँ परम आनन्दमय, चैतन्य प्रभु अम्लान।
एक ही है शरण जग में, हुआ अब श्रद्धान।।
नित्य अविकारी प्रभु, पक्षातिक्रान्त निहार।
कह सकूँ नहीं हुआ मोहि, आनन्द अपरम्पार।। टेक।।

देवदर्शन का अलौकिक, फल मिला सुखकार।
ज्ञान में प्रत्यक्ष जनावे, सहज जाननहार।।
उछलती हैं शक्तियाँ, चैतन्य माँहि अपार।। कह सकूँ नहीं…।।
भ्रान्तिवश भ्रमता रहा, परमाँहि सुख विचार।
जाना नहीं शुद्धात्मा, आनन्द का भण्डार।।
धनि मिली प्रभु देशना, पाया समय का सार।। कह सकूँ नहीं…।।
चाह नहीं चिंता नहीं, परिपूर्ण तत्त्व दिखाय।
अतीन्द्रिय स्वाधीन सुखसागर, सहज लहराय।।
अविरल निमग्न रहूँ अहो, दीखे नहीं संसार।। कह सकूँ नहीं…।।
आत्मीक वैभव अलौकिक, दिखे अखय अनन्त।
जयवन्त होवे स्वानुभूति, सत्य मुक्तिपंथ।।
स्वानुभव में ही दिखे, शिवरूप मंगलकार।। कह सकूँ नहीं…।।
ज्ञानमय निज स्वाद पाया, और कुछ न सुहाय।
संकल्प और विकल्प मिथ्या, लगें सब दुखदाय।।
प्रगट हो निर्ग्रन्थ पद, आनन्दमय अविकार।। कह सकूँ नहीं…।।
वन माँहि नित निर्विघ्न, आराधूँ सहज परमात्म।
स्वप्न में भी सहज वर्ते, अहो निज शुद्धात्म।।
खिन्नता किंचित् न हो गर मिले नहीं आहार।
कह सकूँ नहीं हुआ मोहि, आनन्द अपरम्पार।।
सहज समताभाव हो, ज्ञाता रहूँ निरपेक्ष।
देवांगनाएँ भी न चित्त में, कर सकें विक्षेप।।
निर्दोष ज्ञान-विरागमय, चर्या हो निरतिचार।। कह सकूँ नहीं…।।
रंचमात्र न पापमय, होवे प्रवृत्ति कदापि।
पदयोग्य हों शुभ भाव भी, उनसे विरक्ति तथापि।।
शुद्धोपयोगी सहज परिणति, होय मंगलकार।। कह सकूँ नहीं…।।
सातिशय अप्रमत्त सप्तम, अधःकरण निवार।
हो अपूर्वकरण तथा, अनिवृत्तिकरण सुखकार।।
सूक्ष्मलोभ भी नष्ट हो, वीतरागता अविकार।। कह सकूँ नहीं…।।
नशि जाय त्रेसठ प्रकृति हो, अरहंत पद अविकार।
तीर्थ का होवे प्रवर्तन, जगत् में सुखकार।।
पुनि घाति शेष अघातिया हो, लहूँ शिवपद सार।। कह सकूँ नहीं…।।
नहीं अपेक्षा अब किसी की, सहज मिलि हैं योग।
सहज-जीवन सहज-साधन, सहज-भाव मनोग।।
मुक्ति ही मानो मिली जब मिला जाननहार।। कह सकूँ नहीं…।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह