त्याग जहाँ मुस्कान बने, मन पवित्र हो जाए
मोह राग की हर लहर, फिर स्वतः ही थम जाए
वैराग्य वही जो मोक्ष की राह दिलाए
जीवन का हर क्षण, फिर शुद्ध आत्म हो जाए
जहाँ राग-द्वेष का अंश न हो,
अनंत सुख स्वभाव मिले।
चेतन प्यारा सबसे न्यारा,
वैराग्य ही जहाँ पले।
हो राग विकल्पों से मुक्ति,
चेतन महिमा की हो भक्ति।
वैराग्य कोई पलायन नहीं,
बस ज्ञायक भाव की है मस्ती।
क्षणभंगुर है सारा वैभव, झूठा है संसार
शाश्वत केवल आत्मा, यही बस सार
वैराग्य का दीप जलाओ, मिटे राग का भार
शुद्ध आत्म की राह से, मिले मोक्ष का द्वार
न धन का मोह हो, न यश की हो अभिलाषा
आत्मा में जगह केवल, शुद्धातम की भाषा
वैराग्य की हो ज्योति, संयम की हो राह
सिद्ध दशा प्रगटाऊँ, और कोई न चाह
संयम रूपी आभूषण से,
करो आत्मा का श्रृंगार।
धारण कर वैराग्य निधि को,
त्याग करो यह देह असार।
रचनाकार: सिद्धम जैन, सिलवानी