छोड़ मोह-माया जगत् की, आत्मा को पहचान,
क्षणभंगुर है यह संसार, कर ले प्रभु का ध्यान।
धन-दौलत सब यहीं रहेगी, साथ न जाएगा कोई,
कर्मों का फल साथ चलेगा, चाहे दुनिया रोए।
राजमहल भी मिट जाते हैं, मिट जाती है शान,
सच्चा सुख तो आत्मा में है, यही जिनवर का ज्ञान।
क्रोध, मान और लोभ छोड़कर, मन को कर निर्मल,
राग-द्वेष को दूर भगाकर, जीवन कर उज्ज्वल।
नश्वर तन पर गर्व न करना, यह भी मिट्टी हो जाएगा,
आज मिला जो सुंदर जीवन, कल न जाने खो जाएगा।
वैराग्य जगाए मन में जब, संसार लगे बेकार,
आत्म-कल्याण की ओर बढ़े तब, जीवन हो साकार।
अहिंसा को हृदय में रखकर, संयम का दीप जलाएँ,
जिनवाणी के पावन पथ पर, अपने कदम बढ़ाएँ।
त्याग तपस्या धर्म हमारा, यही मुक्ति का द्वार,
आत्मा के सच्चे स्वरूप को, समझो बारंबार।
मोह-ममता की जंजीरें तोड़ो, सत्य-पथ अपनाओ,
जिनवर के उपदेशों से, जीवन सफल बनाओ।
वैराग्य नहीं है हार कभी, यह आत्मा की जीत,
जिसने स्वयं को जान लिया, उसकी दुनिया हुई पुनीत।
चलो त्याग की राह पकड़कर, आत्म-ज्ञान की ज्योति जलाएँ,
जन्म-मरण के बंधन तोड़कर, सिद्धालय की ओर जाएँ।
रचनाकार: नीतू जैन (Neetu Jain), भोपाल
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