(राग-बाबुल की दुआएँ लेती जा)
अरिहंत की वाणी सुनता जा…
जा तुझको आतम राम मिले …
संसार की कभी न याद आये, निज घर में ऐसा लीन रहे….
सदियों से यूँ तो सिद्ध-सम था, पर निज की महिमा नहीं हुई,
निज की महिमा पहचानकर तू,
सहजानन्द रस का पान करे…(१)
अरिहंत की वाणी…
रागादि भाव से भिन्न है तू, इस बात का तुझको ज्ञान रहे,
इस भेदज्ञान की धारा से,
रत्नत्रय को तू प्राप्त करे (२)
अरिहंत की वाणी …
रचनाकार: स्पर्धा दिलीपकुमार मेहता (Spardha Dilipkumar Mehta), अहमदाबाद
Instagram: @mehtaspardha