तर्ज : तू तो चेतन चिदानंद चिद्रूप है …
बोलना तो कला आत्मा की नहीं,
वर्गणा-भाषा का मात्र परिणाम है।
इसका कर्त्ता स्वयं द्रव्य पुद्गल कहा,
आत्मा का तो इसमें न कुछ काम है ।।1।।
लोग कहते हैं निमित्त तो आत्मा,
पर अहो आत्मा ज्ञान का धाम है।
योग उपयोग की परिणति ही निमित्त,
इनमें आत्मा का आता नहीं नाम है ।।2।।
मात्र व्यवहार से ऐसा उपचार हो,
पर समझ लेना ऐसा महा भूल है।
मान कर्तव्य का स्वप्न में भी हुआ,
तो ये दुर्भाव शिवमार्ग में शूल हैं।।3।।
सारी क्रियाएँ जिनको धरम तू कहे,
करते-करते भी पाओ न भवकूल है।
मैं तो वक्ता नहीं मात्र ज्ञाता सदा,
ऐसी निज भाव श्रद्धा ही सुख मूल है ।।4।।
बोलना आत्मा का यदि भाव हो,
तो फिर प्रभु सिद्ध क्यों वचन से रहित।
वाणी अरहंतों में सबकी क्यों ना खिरे,
उनकी परिणति हुई है अनंतबल सहित ।।5।।
राग होते हुए मूक बोले नहीं,
कभी चाहे बिना भी बहुत कुछ कहे।
देखो अजीव ध्वनि यंत्र भी ध्वनि करे,
फिर भी मैं बोलता मूढ़ क्यों तू कहे ।। 6 ।।
करता अभिमान उपदेश मैंने किया,
जिससे रंजित हो सब स्तुति मम करे।
पर अरे भेद-विज्ञान नहिं चिंतता,
द्रव्य निज कार्य की स्वयं शक्ति धरे ।। 7 ।।
भव्य आत्मन् ! यदि चाहते हो भला,
झूठी निंदा प्रशंसा में अब मत फँसो ।
एक ज्ञायक निरंजन तेरा धाम है,
तोड़ नाता सभी से स्वयं में बसो ।। 8 ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह