उपदेश ग्रहण करने की पद्धति
“शास्त्रों में कहीं निश्चयपोषक उपदेश है, कहीं
व्यवहारपोषक उपदेश है। वहाँ अपने को व्यवहार का
आधिक्य हो तो निश्चयपोषक उपदेश का ग्रहण करके
यथावत् प्रवर्त्ते और अपने को निश्चय का आधिक्य हो तो
तो व्यवहारपोषक उपदेश का ग्रहण करके यथावत्
प्रवर्त्ते।
तथा पहले तो व्यवहार श्रद्धान के कारण आत्म-
ज्ञान से भ्रष्ट हो रहा था, पश्चात् व्यवहार उपदेश ही की
मुख्यता करके आत्मज्ञान का उद्यम न करें; अथवा पहले
तौ निश्चय श्रद्धान के कारण वैराग्य से भ्रष्ट होकर
स्वच्छन्दी हो रहा था, पश्चात् निश्चय उपदेश की ही
मुख्यता करके विषय-कषाय का पोषण करता है।
इस प्रकार विपरीत उपदेश ग्रहण करने से बुरा ही
ही होता है।”
—मोक्षमार्ग प्रकाशक, पृष्ठ २९८