तुम मान अनिष्ट न क्रोध करो, परिणमन वस्तु का सहजहिं हो ॥ टेक ॥
जो कर्म किए पूरब खोटे, वे सहज उदय में आए हैं।
हैं मात्र ज्ञान के ज्ञेय अहो, तुम सावधान प्रति समय रहो ॥ 1 ॥
कर्मों का कोई दोष नहीं, वे अरे अचेतन निर्विकार।
नो कर्म स्वयं से न्यारे हैं, स्वाश्रय से ज्ञाता सहज रहो ॥ 2 ॥
कल्पना अरे मिथ्या तेरी, पर द्रव्य न कुछ भी करता है।
यदि तत्त्वदृष्टि से देखो तो, आनन्दित निज में सहज रहो ॥ 3 ॥
नहिं कर्म बन्ध होवे नवीन, अरु वर्तमान में समता हो।
इसमें ही हित सबका आत्मन् ! अरु पूरब कर्म निर्जरित हो ॥ 4 ॥
जो परम पुरुष हो चुके सभी, अरु आज जगत में विद्यमान।
है उन सबका आदर्श यही निज स्वभाव मंगलमय हो ॥ 5॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’