तुम आकुलित हो रहे हो, किसकी भूल? | Tum akulit ho rahe ho, kiski bhul?

तुमने आज तक
कितने भव धारण किए और कितने छूट गए।
यह शरीर तुम्हारा न हो सका,
तुम तब भी आकुलित क्यों हो रहे हो।।
नरभव मिला, जिनधर्म मिला,
क्यों व्यर्थ गँवा रहे हो?
यह इंद्रियाँ काबू न हो सकीं,
तो फिर तुम क्यों आकुलित हो रहे हो।।
कहते हो,
माँ-बाप मेरे, धन-संपदा मेरी;
कहकर भव नष्ट किए जा रहा है।
अरे! मरते वक्त साथ ले जावेगा?
नहीं! तो फिर तू क्यों आकुलित हो रहा है।।
कभी
पल में सुखी तो कभी पल में दुःखी,
ऐसी वस्तु में अपनत्व कर रहा है।
अरे!
स्वयं को सुखी नहीं कर पा रहा,
पर तू तब भी आकुलित हो रहा है।।
अरे! संज्ञी हो, बुद्धिवान हो,
थोड़ी बुद्धि का उपयोग करो।
थोड़ा जिन-शास्त्रों में,
थोड़ा अंदर में झाँको,
पता चलेगा तुम क्यों आकुलित हो रहे हो।।

रचनाकार: प्रतिहार्य पंकजकुमार जैन (Pratiharya Pankajkumar Jain), औरंगाबाद
Instagram: @pratiharyaJain187