तू चिंतन के क्षण में, अपने आतम से कहना,
संसार बदलता रहता है, पर तू समभाव में रहना |
समभाव ही तो स्वभाव तेरा, समभाव ही दर्शन का फल है,
समभाव सधे सब कार्य सधे, समभाव क्रिया का संबल है,
आगम के एक-एक अक्षर का, तुझसे बस है ये कहना।(1)
समभाव की वृद्धि ही वृद्धि, समभाव की हानि ही हानि,
सुख दुःख हमने कई बार सहे, समभाव दशा न पहचानी,
तू जो हैं जहाँ हैं जैसा हैं, समभाव संग ही रखना।(2)
चाहे चंदन के लेप से, चाहे वासी से वास करें,
क्षण भर के सुख संयोग यहाँ, क्या द्वेष करे क्या राग करे,
समभाव ही शाश्वत भाव मेरा, सिद्धों में भी जो है ना।(3)
ना गत अगत की चिंता है, मन मे ना कोई प्रतिबंध रहे,
निश्चय है सब घट ही चुका, क्यों आश-निराश का वृंद रहे,
समभाव जिन्हें है हर क्षण में, उनके सुख का क्या कहना।(4)