अध्याय 1 — सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र
( 1 ) ‘है’ का मर्म स्पर्श
जीव भी ‘है’ अजीव भी ‘है’ जब ये दोनों हैं, तो पहले थे अब हैं और हैं तो रहेंगें और जीव स्वयं से ही जीव है और अजीव स्वयं से ही अजीव है, जीव का ‘है’ अजीव से नहीं और अजीव का ‘है’, जीव से नहीं, इस तरह दोनों की त्रैकालिक स्वतंत्रता निर्बाध है। जैसे जमीन भी ‘है’ और आसमान भी ‘है’। किन्तु जमीन आसमान से नहीं, और आसमान जमीन से नहीं, जमीन आसमान का कर्म नहीं और आसमान जमीन का कर्म नहीं – इस प्रकार दो द्रव्यों के कर्ता-कर्म की सर्वथा असिद्धि है जिस समय निमित्त-नैमित्तिक भाव बन रहा हो, उस समय भी कर्ता-कर्म भाव का सर्वथा अभाव है। ‘है’ का यही मार्मिक विश्लेषण है।
( 2 ) ‘अनेकांत एक अपराजित शस्त्र है’
अनेकांत जैनदर्शन का अस्खलित सिद्धान्त है, भगवान वीतरागी, सर्वज्ञ अरहंतदेव के अतिरिक्त और जितने भी विचारक व मन्तव्य हैं वे कल्पना तक नहीं कर पाये कि "प्रत्येक वस्तु अनंत गुणात्मक व अनंत धर्मात्मक हो सकती है इसलिए अनेकांत को बदनामी भी बहुत सहनी पड़ी, लेकिन जिसका चरित्र उज्ज्वल होता है, उसे कितना ही कलंकित किया जाये, उसके चरित्र की पवित्रता कभी किसी से प्रभावित नहीं होती, उसमें क्षति नहीं होती, वह सदा निर्दोष ही रहता है।
अनेकांत पर जिन दार्शनिकों ने प्रहार किये, वे उदय हुए और अस्त भी हो गये, लेकिन अनेकांत अनादि-अनंत अपने ध्रुव धरातल पर जिंदा खड़ा है, यह किसी काल व क्षेत्र में एकांतवादियों के भयावह गोलों से विचलित होने वाला नहीं है क्योंकि यह कोई किसी की कल्पना मात्र नहीं, बल्कि वस्तु की अकाट्य स्वयंसिद्ध व्यवस्था है।
अनेकांत के सम्यक् बोध के अभाव के कारण अज्ञान ने इस आत्मा को अनादिकाल से दबोचा, जिससे यह उसके बंधनपाश से मुक्त नहीं हो पाया, लेकिन जब सद्गुरु की करुण कृपा से अनेकांत का सही स्वरूप सुन लेता है और उसे आत्मसात् कर उस दिव्यवाणी को अपने ज्ञान में बिठा लेता है और धारावाहिक पुरुषार्थ द्वारा अनंत धर्मात्मक चैतन्य तत्त्व की अनुभूति कर लेता है तो अज्ञान समूलरूप से नष्ट हो जाता है।
सचमुच ! अनेकांत का उपयोग हमारी मुक्ति व आत्मकल्याण के लिए ही करना चाहिए, इसका स्वरूप सम्यक् रीति से हमारे मस्तिष्क में समा जाए, परन्तु हुआ क्या? इसके स्वरूप को नहीं समझ पाने से इसे पूर्वापर विरोध के साथ मिला दिया गया, लेकिन यह सिद्धांत किसी से चुनौती नहीं पा सका, यह तो अपराजित शस्त्र है, जो कभी किसी से परास्त नहीं हुआ, न ही होगा, क्योंकि स्वयं वस्तु बोलती है, उसमें परस्पर पूर्वापर विरोध कहीं नहीं है, पूर्वापर विरोध तो उसे कहते हैं कि वस्तु के संबंध में आज क्या बोले - कल क्या बोले - यह बात जैनदर्शन में कहीं ढूंढ़ने को नहीं मिलेगी, इसलिए पूर्वापर विरोध सदा ही हारा हुआ है वह विश्वास के लायक नहीं। अरे झूठा वकील भी इतना सतर्क रहता है कि पूर्वापर विरोध न आ जाए, मैं हार जाऊँगा। अनेकांत मात्र विवेचन की वस्तु नहीं, प्रयोग पद्धति है, जो हमारे भव के भय को धराशाही कर देता है, और आनंदमयी जीवन की शुरूआत हो जाती है।
अनेकांत के अंचल में प्रमाणज्ञान के द्वारा द्रव्य व पर्याय का स्वरूप जान लेने पर श्रुतज्ञान का कार्य उसमें से अपने प्रयोजन की वस्तु को चुनना होता है, पदार्थ में से जो जितना अपेक्षित होता है, उतना वह ले लेता है, शेष अंश को छोड़ देता है क्योंकि उसके आश्रय के योग्य निरंश, अखंड अभेद ज्ञायक ही होता है और ज्ञान के साथ श्रद्धा भी उसी अनंत गुणात्मक एक सामान्य अभेद, अन्वय स्वरूप शाश्वत सत्ता को अहं देती है, विकारी व निर्विकारी केवलज्ञान की शुद्ध पर्याय भी क्षणिक होने से श्रद्धा को अवलंबन नहीं दे सकती इसलिए नित्य शुद्ध पारिणामिक तत्त्व ही श्रद्धा का श्रद्धेय होता है, श्रद्धा सदैव ऐकान्तिक होती है और ज्ञान अनेकांतपूर्वक सम्यक् एकांत की ओर बढ़ता है। इस प्रकार ज्ञान व श्रद्धा दोनों शुद्धात्मा के साथ एकाकार हो जाते हैं और परम आनन्द झरने लगता है। श्रीमद्जी ने भी कहा है – ‘अनेकांत मार्ग सम्यक् एकांत ऐवा निज पदनी प्राप्ति सिवाय अन्य हेतुए कार्यकारी नथी।’
( 3 ) अरे ! ये तो गारुड़ी मंत्र है
‘हे योगी तू ध्रुव तत्त्व को भज, अध्रुव तत्त्व की चिन्ता से तुझे क्या प्रयोजन।’
देखो ! ये आप्त वचन हैं या हीरे मोती! जो विश्व के किसी शोरूम में नहीं मिलेंगे यह तो दिगंबर संतों के खजाने की अचल संपत्ति है, शुद्धात्मा की गहराईयों में उतरकर उसकी अनुभूतियों को इन मोतियों से गूंथा है, इसका एक-एक वाक्य सारे लोक की संपत्ति से अधिक है माँ जिनवाणी की असीम कृपा है, असाधारण प्यार है हम पर। जो हमें भव-विच्छेद के मंत्र देती है, इन परमागमों का यह मधुर प्रसाद है, जो मरते हुए को जिंदा कर देता है, ऐसे गारुड़ी मंत्र हैं ये, एक वचन भी जीवन में क्रियान्वित हो जाए, रोम-रोम में बस जाये तो मुक्तिश्री रूपी लक्ष्मी, अटूट मिलती है, तुम जीभर कर इसका भोग करो अरे ! बाहर की जड़ लक्ष्मी तो मिट्टी के ढेले हैं और उन ढेलों से इसे विश्व का धनपति घोषित किया जाता है। मिट्टी से उसे इज्जत देकर मान के शिखर पर चढ़ाते हैं लेकिन वह इज्जत तो खिसक जाने वाली है एक दिन लुट जायेगी, शिखर से गिर जायेगा, फिर यह भयंकर रुदन करता है। इन करुणावंत जिन गुरुओं के वचन सुन भीतर से रोमांच हो जाए कि मैं ही मोक्ष का अधिकारी हूँ अस्थानों पर पड़ी हुई श्रद्धा डोलायमान हो जाए वह कह उठे कि मैं तो लोक का सम्राट हूँ अध्रुव तत्त्व मेरे से अलोकाकाश जितना दूर है क्योंकि मैं महात्मा परिणाम को स्पर्शता ही नहीं, मुक्ति भी मुझे स्पर्शती नहीं, फिर ‘अध्रुव’ की चिन्ता के निरर्थक विकल्प क्यों ? मुमुक्षु को ऐसी धारा विदाउट ब्रेक चलती है। यही उसका जीवन है।