कवि श्री नयनसुखदास जी कृत बारह भावना | अर्थ सहित

आभार: ऋतु जैन जी, दिल्ली

बार - बार निज स्वरूप का , स्वभाव का या तत्त्व का चिंतन करना अनुप्रेक्षा या भावना है। बारह भावनाओं को वैराग्य की जननी कहा गया है।इनका चिंतन मनन हमें विषय-कषायों से विरक्त और धर्म में अनुरक्त करता है तथा जीवन के मोह और मृत्यु के भय को भी क्षीण करता है। इस संदर्भ में आचार्य शुभचंद्र जी " ज्ञानार्वण " जी में लिखते है :-

विध्याति कषायाग्नि
विगलितरागो विलियते ध्वान्तम्।
उन्मिषति बोधदीपो
ह्रदि पुंसां भावनाभ्यासात्।।

अर्थात् इन बारह भावनाओं के अभ्यास से जीवों की कषायरूपी अग्नि शांत हो जाती है , राग गल जाता है , अंधकार विलीन हो जाता है और ह्रदय में ज्ञानरूपी दीपक विकसित हो जाता है।
वास्तव में वैराग्य की स्थिरता के लिए अपने शुद्ध स्वरूप के चिंतवन से बढ़कर अन्य भावना नही है।

अनित्य , अशरण , एकत्व , अन्यत्व , संसार , लोक , अशुचित्व , आस्रव , संवर , निर्जरा , बोधिदुर्लभ और धर्म; हमें इन बारह भावनाओं का चिंतवन करना चाहिए।इनमें से प्रारंभिक छह भावनाऐं मलिनता , अस्थिरता और पर संयोगों की मिथ्या आश्रयता का बोध कराने वाली है तथा स्वभाव की ओर उन्मुख होने की प्रेरणा देती है।सातवीं और आठवीं भावना संसार को उत्पन्न करने वाले मिथ्यात्व - मोह आदि विकारी भावों से वितृष्णा का अहसास कराती हैं।संवर , निर्जरा , बोधिदुर्लभ और धर्म ये चारों भावनाऐं धर्म भावना कही गयी है , जो शुद्ध स्वरूप की उपलब्धि का मार्ग प्रशस्त करती है।

अतः बारह भावनाओं का चिंतन - मनन , पठन - पाठन ज्ञानी - अज्ञानी ; साधु और श्रावक सभी के लिए समान रूप से उपयोगी है।

कवि श्री नयनसुखदास जी कृत बारह भावना
( पोस्ट - 1 )

माता है वैराग्य की , सब जीवन हितकार।
परमारथपद दीपिका , नमूं भावनासार।।

भावार्थ :- बारह भावना के प्रारंभ में ही कविवर उसके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहते है कि बारह भावनाऐं वैराग्य को उत्पन्न करने वाली है और सभी जीवों का हित करने वाली है। इसलिए ही इन्हें वैराग्य की माता कहा गया है। पण्डित दौलतराम जी भी छहढाला जी में लिखते है :-

“वैराग्य उपावन माई , चिन्तै अनुप्रेक्षा भाई”

सब रागद्वेष मोह विकार आदि से रहित निज शुद्धात्मा की प्राप्ति का जो परमार्थ मार्ग है उसे प्रकाशित करने वाली यह जगत में साररूप बारह भावनाऐं सब अंधकार को हरकर प्रकाश देने वाले दीपक के समान है। इसीलिए सभी जीवों का उपकार करने वाली ऐसी बारह भावनाओं को कविवर नयनसुख दास जी नमस्कार कर रहे है।


( पोस्ट - २ )

अनित्य भावना

प्रथम अनित्य भावना भाऊँ ,
सकल सृष्टि से दृष्टि हटाऊँ।
चहुंगतिमय यह जगत असारा ,
क्षणभंगुर है धुन्ध पसारा।।

अजि " मै " चेतन चिद्रूप चिदानंद रूप।
जगत दुख कूप हमें क्या करना।।
अब लिया सिद्ध परमेष्ठि तुम्हारा शरणा।।टेक।।

भावार्थ :- कविवर यहाँ प्रथम अनित्य भावना भा रहे है।’ अनित्य ’ अर्थात् जो क्षणभंगुर है , अविनाशी है।जैसे ये सकल संसार , क्योंकि जो कुछ भी उत्पन्न होता है , नियम से उसका विनाश भी होता है।ऐसे ही इस संसार में हम प्रतिदिन संयोग और वियोग देखते ही है तथा उनमें हर्ष विषाद भी करते है क्योंकि हम द्रव्य की नित्यता से परिचित नही है बस पर्याय की अनित्यता देखकर ही व्यर्थ दुखी होते रहते है।इसलिए कविवर सकल संसार से अपनी दृष्टि हटाने की बात कह रहे है क्योंकि इस संसार में कहीं भी सुख नही है।चारों ही गतियाँ दुखों से भरी हुई है और इनमें कहीं कोई सार नही है।संसार की असारता और क्षणभंगुरता को कवि ने धुंध के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है।जैसे आसमान में छाई हुई धुंध थोड़े ही समय की होती है फिर छँट जाती है उसी प्रकार स्त्री , पुत्र , मकान , सम्पत्ति आदि ये सभी संयोग भी क्षणभंगुर है जो थोड़े ही समय साथ रहकर फिर वियोग को प्राप्त होते है इसलिए इनमें ममत्व , अपनत्व स्थापित करना मूर्खता है।अतः इस जीव को अपनी दृष्टि पर्याय से हटाकर स्वभाव की ओर सन्मुख करना ही श्रेयस्कर है।क्योंकि वस्तु या वस्तु का स्वभाव नित्य है , पर्याय अनित्य है।इस संदर्भ में कविवर जयचंद्र जी की पंक्तियाँ भी दृष्टव्य है :-

" द्रव्य रूप करि सर्व थिर ,परजय थिर है कौन।
द्रव्यदृष्टि आपा लखो, परजयनय करि गौन।।
पर द्रव्यन तैं प्रीति जो, है संसार अबोध।
ताको फल गति चार में, भ्रमण कहो श्रुत - शोध।।"

प्रथम पद में संसार की असारता और क्षणभंगुरता बताने के बाद दूसरे पद में कविवर निज स्वरूप पर आते है और कहते है कि मै तो चेतन हूं , चेतना ही जिसका लक्षण है जो सदा नित्य है , अखण्ड ज्ञान स्वभावी है , चिदानंद स्वरूप है और मै कभी भी अपने स्वभाव से च्युत नही होता हूं।ज्ञान का घनपिण्ड और आनंद का रसकंद मै स्वयं हूं।मेरा सुख स्वरूप मेरे पास है और शाश्वत है।सुख कहीं बाहर है ही नही ।मेरा अनंत ज्ञान , अनंत दर्शन , अनंत सुख , अनंत वीर्य मुझमें ही है।यह बाह्य जगत तो दुखों का कुँआ है , पर मुझे इस जगत से क्या करना है क्योंकि ये तो न मेरा था , न मेरा है और न ही कभी मेरा हो सकता है।इसलिए अब इस बाह्य जगत से दृष्टि हटाकर , हे सिद्ध भगवान! अब मैं आपकी शरण लेता हूं।यहाँ सिद्ध भगवान की शरण भी व्यवहार से कही गयी है , निश्चय से तो मुझे एकमात्र निज स्वरूप का ही आश्रय लेना है।क्योंकि शुद्ध निश्चयनय से आत्मा टंकोत्कीर्ण , ज्ञायक , अविनाशी है , परम शुद्ध है।


(पोस्ट-3)

अनित्य भावना

सुन जीव अरे जड़मति , भ्रम्यों चहुं गति।
रंक भूपति , सब में हलचल है।
ह्याँ सुरनर नारक तिरयग् में कलकल है।।

धन यौवन जीवन विषैं , दाँत क्यों घिसे।
हाड़ क्यों चसे , तालुआ फाटे।।
तू क्यों भ्रम भारन हेत स्वान सम चाटे।।१।।

भावार्थ :- यहाँ मिथ्यादृष्टि जीव जो पर में ही अपनत्व मानता है उसको सम्बोधित करते हुए कविवर कहते है कि हे जीव ! तू क्यों बुद्धिपूर्वक विचार नही करता , जड़बुद्धि की तरह क्यों अपने हित की बात भी नही समझता।अनादिकाल से अपनी इसी मिथ्याबुद्धि के कारण तू चारों गतियों में भ्रमण कर रहा है।इन चारों ही गतियों में कहीं भी तो लेशमात्र भी सुख नही है।चाहे राजा को देख लो या रंक को , सुखी कोई भी नही है। अपने अपने दुख से सभी दुखी ही है।नरकगति के दुखों का वर्णन करने में कोई भी समर्थ नही है और तिर्यंचगति के दुख भी किसी से छुपे हुए नही है , प्रत्यक्ष ही देखने में आते है।ऐसे ही मनुष्यगति और देवगति में भी सम्यग्दर्शन के बिना यह जीव निरंतर दुख ही सहन करता है। इसप्रकार चारों ही गतियों में निरंतर हाहाकार ही मची रहती है।

जिस प्रकार स्वान (कुत्ता) हड्डी को चबाता रहता है जिससे उसका तालुवा आदि फट जाता है और उसमें से खून बहने लगता है पर अपनी अज्ञानता और भ्रम से वह उस खून को बड़े मजे से चाटता है और खुश होता है यह सोच कर कि यह खून का स्वाद तो हड्डी में से आ रहा है जबकि वह जानता ही नही कि यह उसका अपना ही खून बह रहा है।इसी प्रकार मिथ्यात्व के वशीभूत होकर यह जीव पर में सुखबुद्धि मानकर अनादिकाल इस चतुर्गति रूप संसार में भ्रमण कर रहा है और दुख उठा रहा है।अपनी मिथ्याबुद्धि के कारण यह जीव धन-संपत्ति , स्त्री-पुत्र-बांधव तथा शरीरादि में अपनत्व स्थापित कर सुख मानता है और अपना पूरा जीवन उन्हीं की देखभाल में नष्ट कर देता है और अंत में दुख ही वहन करता है , क्योंकि यह सभी संयोग क्षणभंगुर है एक न एक दिन अवश्य ही वियोग को प्राप्त होंगे ही होंगे। अतः एकमात्र त्रिकाली शुद्धात्मा ही आराध्य है क्योंकि वही ध्रुव है अर्थात् उसका जन्म - मरण नही है।


(पोस्ट-4)

अनित्य भावना

सब सगे संगति प्यारे,हो जाएंगे तुमसे न्यारे।
ज्यों सूखे तरुवर डारे,उड़ जाए पक्षी रखवारे।।

ज्यों बिना नीर सुन वीर! न आवे तीर।
पशु बटगीर तजें सब नेहा।।
बिन स्वारथ पूछे कौन थके जब देहा।
है नदी नाव संयोग , कुटुम के लोग।
कर्म के योग से हो रहे भेले।
दिन दो इक के मेहमान हैं फेर अकेले।।

भावार्थ :- संसार की अनित्यता का बहुत ही सुंदर और यथार्थ वर्णन कवि ने इन पंक्तियों में किया है। जिस प्रकार एक वृक्ष जब हरा - भरा होता है तो बहुत से पक्षी उस पर अपना घर बना लेते है , पथिक भी उसकी ठंडी छांव में बैठना पसंद करते है।परंतु जब समय के साथ वह वृक्ष सूखने लगता है तो कोई भी उसके पास आना पसंद नही करता।पक्षी भी अपने घोंसलें छोड़ कर उस वृक्ष से चले जाते है।ठीक उसी प्रकार ये सभी बंधु - बाधव , सगे - संबंधी भी तभी तक हमारे साथ रहते है जब तक उन्हें हमसे अनुकूलता हो या कोई स्वार्थ सिद्धि हो।

सूखे वृक्ष का उदाहरण देने के बाद अब कवि सूखे तालाब का वर्णन करते हुए कहते है कि नदी या तालाब में जब तक पानी है तभी तक मनुष्य और पशु आदि सब उसके किनारों पर आना पसंद करते है और अपनी प्यास बुझाते है।किंतु सूखी हुई नदी या तालाब के किनारों पर कौन जाना पसंद करता है? जाहिर है कोई भी नही , क्योंकि उससे अब हमारा कोई मतलब नही निकलता।इसी प्रकार जब वृद्धावस्था में इंद्रियाँ शिथिल हो जाती है , शरीर थक जाता है और हम कोई काम करने योग्य नही रहते तो परिवार जनों का मोह भी हमसे समाप्त हो जाता है।उन्हें हम बोझ नज़र आने लगते है।बिना स्वार्थ के कोई किसी को नही पूछता। यह ही इस संसार की रीत है।

इस संसार में यह जीव सदा से अकेला ही है।अकेला आता है और अकेला ही चला जाता है।कर्म के योग से ये सब स्त्री , पुत्र , बंधु-बांधव , धन-संपत्ति , मकान आदि वस्तुओं का संयोग होता है और फिर वियोग भी हो जाता है।और इसी प्रकार ये संयोग - वियोग का क्रम चलता रहता है।जिस प्रकार गांवो आदि में कुछ दिन का मेला लगता है फिर समाप्त हो जाता है उसी प्रकार जीवन में ये सब कुटुंबीजनों का मेला भी लगता है।ये सब मेहमान की तरह हमारे जीवन में आते है और फिर चले भी जाते है।और यह जीव फिर अकेला रह जाता है।अतः इन सबका मोह छोड़ कर , इन्हें पर जानकर हमें निज आत्मस्वरूप की ही आराधना करनी चाहिए। कुछ ऐसी ही पंक्तियां शोभाचंद भारिल्ल कृत बारह भावना में भी देखने को मिलती है -

है संसार सराय जहाँ हैं पथिक आय जुट जाते,
लेकर टुक विश्राम राह में अपनी-अपनी जाते।
जो आये थे गये सभी जो आये हैं जायेंगे,
अपने-अपने कर्मों का फल सभी आप पायेंगें।।
तजो मोह ममता भज समता आत्मस्वरूप निहारो
ह्रदय पटल का राग-रंग धो , धर्म भाव उर धारो।


( पोस्ट - 5 )

अनित्य भावना

निज निज करनी अनुसारे!
चहुं गति के पंथ सिधारे।
सब थक रहे थामन हारे!
पर हो गये हमसे न्यारे।।४।।

माटी में मिलेगी देह , होएगी खेह।
इसी के नेह पड़ा दुख भरना।
अब लिया सिद्ध परमेष्ठि तुम्हारा शरणा।।

अजि " मै " चेतन चिद्रूप चिदानंद रूप।
जगत दुख कूप हमें क्या करना।।
अब लिया सिद्ध परमेष्ठि तुम्हारा शरणा।।टेक।।

भावार्थ :- जिस घर परिवार को अपना मान कर यह जीव कोई भी पाप करने से नही चूकता।ये भी नही सोचता कि जिनके लिए वह ये सब छल कपट , पाप आदि कर रहा है…वो सब उसके है कहाँ…वे तो उससे नितांत भिन्न है…उनके परिणाम उनके साथ और तेरे परिणाम तेरे साथ।जो जीव जैसे परिणाम करता है उसे उसका वैसा ही फल मिलता है।अपनी अपनी करनी के अनुसार कर्मबंध करके यह जीव चारों गतियों में भटकता फिरता है।आज जिस परिवार के भरण पोषण की खातिर मनुष्य व्यापार आदि में चोरी , बेइमानी आदि करके नरकादि गतियों का बंध करके अकेला ही वहाँ जाता है।उस दुख में साथ देने के लिए यह परिवार वहाँ उसके साथ नही जाएगा…वहाँ तो उसे अकेला ही जाना होगा…परिवार के लोग अपने कर्मों के अनुसार अन्य गतियों में जाएंगे।क्योंकि यह जीव कर्मों के संयोग से इस संसार में सदा अकेला आता है और अकेला ही जाता है।तिल तुष मात्र परिग्रह भी वह अपने साथ नही ले जा सकता।

जिस देह को अपना मान कर यह जीव उसके मोह में अंधा हो जाता है और निजस्वरूप को भूल कर रात-दिन इस देह की चाकरी में ही लगा रहता है।वो देह भी उसकी कहाँ है…? उसका परिणमन भी स्वतंत्र है।एक दिन उसने भी नष्ट होकर मिट्टी में ही मिल जाना है।फिर भी यह जीव देह में अपनत्व मान कर निरंतर दुख ही उठाता रहता है। इसलिए इस देह से तथा समस्त पर - पदार्थों से मोह को हटा कर हे सिद्ध परमेष्ठि अब मै आपकी शरण ग्रहण करता हूं।

यह संसार तो दुखों की अटवी है इसमें सुख की वांछा रखना भी स्वयं को छलने जैसा है।मेरा स्वरूप तो ज्ञानानंदमय है।अब इस जगत से , देहादि से मोह को हटाकर हे सिद्ध परमेष्ठि ! मै आपकी शरण में आता हूं।ये परपदार्थ मुझे क्या सुखी - दुखी करंगे…इनकी इतनी सामर्थ्य ही नही है।क्योंकि मैं स्वयं सुख स्वरूप हूं।


(पोस्ट-6)

अनित्य भावना

अरे जीव ! उदय हों कष्ट भोग हो नष्ट।
इन्द्रियाँ भ्रष्ट बिखर जब जावैं।
होंगे अनंत परमाणु पता नही पावैं।
कोई देगा जमीं में दाब कोई ले चाव।
रहैं नहिं ताव, जो फेर जिलावै।
नहिं इन्द्र चन्द्र धरनेन्द्र की पार बसावैं।।५।।

क्या कोट किले रखवारे , क्या मात पिता परवारे।
सब जन्त्र मन्त्र कर हारे वैद्यों ने सिर दै मारे।।६।।

भावार्थ - जब तक शुभ कर्मों का उदय रहता है तब तक यह जीव बाह्य संयोंगों में फूला नही समाता।लेकिन जब अशुभ कर्म उदय में आते है और जीव के सभी संयोग , भोग , संपदा आदि नष्ट हो जाती है , और तो और आयु पूर्ण होने पर इंद्रियाँ भी नष्टभ्रष्ट हो जाती है।और ये देह जो अनंत पुद्गल परमाणुओं का पिण्ड है , ये परमाणु भी बिखर कर अलग हो कहाँ चले जाते है , कोई नही जान पाता है।आयु पूर्ण होने पर कोई भी इंद्र , नरेंद्र , धरणेन्द्र आदि कुछ नही कर सकते है , कोई भी न आयु बढ़ा सकता है और न घटा सकता है।कहा भी है न -

दल बल देवी देवता ,
मात - पिता परिवार।
मरती बिरिया जीव को ,
कोई न राखनहार।।

आगे कविवर कहते है कि जिस शारिरिक सौंदर्य और बल पर यह जीव इतराता फिरता है , आयु पूर्ण होने पर इसी शरीर को या तो कोई ज़मीन में दबा देगा या कहीं ये जानवरों का भोजन बन जाएगा।या फिर इस शरीर को जला दिया जाएगा।जैसी इसकी गति होनी लिखी होगी वैसी ही इस शरीर की गति हो जाएगी , तब कोई भी कुछ नही कर पाएगा और न ही तब इस जीव का घमण्ड शेष रह पाएगा।

असाता कर्म का उदय आने पर या मृत्यु की घड़ी आने पर कोई भी बचावनहार नही मिलता।कितने ही बड़े महल-किले हो , कितनी ही धन-सम्पत्ति हो पर अंत समय में कोई काम नही आ सकती।माता-पिता , कुटुम्ब-परिवार आदि भी सिर्फ आपको तकलीफ़ में देख सकते है पर कुछ कर नही सकते।बड़े से बड़े डॉक्टर , वैद्य , तांत्रिक , विद्याऐं , मंत्र आदि भी इस जीव को मृत्यु से नही बचा सकते। पण्डित दौलतराम जी ने भी छहढाला जी में कहा है -

“मणि मंत्र तंत्र बहु होई , मरते न बचावे कोई”

इसी संदर्भ में एक भजन की चंद पंक्तियां और याद आ गयी -

" ज़र सिकंदर का यही पर रह गया ,
मरते दम लुकमान भी यूं कह गया।
यह घड़ी हरगिज़ न टाली जाएगी ,
बिन मुहुरत के उठा ली जाएगी। "
जब तेरी डोली निकाली जाएगी…

इसलिए हमें यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि इस संसार में कुछ भी शाश्वत नही है।जो भी ये शरीरादि पर द्रव्य है एक दिन अवश्य ही हमसे जुदा होंगे।अतः इन सबका मोह छोड़ कर शीघ्र ही आत्महित कर लेना चाहिए।


( पोस्ट - 7 )

अनित्य भावना

हो नष्ट धाम अरु ग्राम , पड़े रह काम।
रहै नहिं नाम चाम सड़ जावैं।
तब जाति पाति , कुल , गोत की जोत न पावें।।

सब मिटे अंक अरु वंक तथा आतंक
नही कुछ शंक रोवते दीखें।
सम्पत्ति में गावें गीत विपत्ति में झीखें।।७।।

भावार्थ - पिछले छंद में कवि ने बताया कि कैसे अशुभ कर्मों का उदय आने पर कोई भी इस जीव का सहायी नही हो सकता है।उसी का आगे वर्णन करते हुए कवि कहते है कि अशुभ कर्म किसी को नही छोड़ते है।प्राकृतिक आपदाओं में हमने देखा ही है कि किस प्रकार पूरे पूरे के गांव , मकान आदि सब नष्ट हो जाते है। आज हम धर्म न कर पाने का कारण काम की व्यस्तता आदि बताते है पर जब बुरा वक्त आता है तो वो न आपका नाम देखता है और न काम…पल भर में सब कुछ समाप्त हो जाता है।जिस शरीर पर हम अभिमान करते है , रात - दिन जिसकी चाकरी करते है वह काया भी पड़ी पड़ी सड़ जाती है।चील कौओं द्वारा नोंच ली जाती है।तब न आपकी जाति देखी जाती है और न ही आपका उच्च गोत्र या कुल।अशुभ कर्मों ने तो महान पुण्य के धारी तीर्थंकरों को भी नही छोड़ा , उनपर भी उपसर्ग हुए है , फिर आपकी और हमारी तो बिसात ही क्या है।

जब ये देह नष्ट हो जाती है तो इस देह से जुड़े सब नाते रिश्ते भी समाप्त हो जाते , इसमें कोई संदेह नही है।एक दो दिन तो सब शोक मनाते है फिर सब भूल कर अपने में ही व्यस्त हो जाते है।

आज जो भी हमारे सगे संबंधी है, जिनसे हम इतना ममत्व रखते है वे भी सब अच्छे वक्त में तो हमारा साथ देते है , खुशी - खुशी , हँसते गाते हमारे साथ रहते है पर जैसे ही कोई विपत्ति आन पड़ती है तो वे ही हमारे विपरीत हो जाते है।जो पहले हँसते गाते दिखते थे वे ही अब झींकते हुए दिखाई देते है।जहाँ पहले खुशियां दिखती थी वहाँ अब कलह दिखाई देने लगता है।यही इस दुनियाँ की रीत है।

कहते है न " सुख के सब साथी , दुख में न कोय "


( पोस्ट - 8 )

अनित्य भावना

किस किस की कहौं कहानी ,
है जगत बुदबुदा पानी।
इसकी ममता दुखदानी ,
पाथर की नाव समानी।।८।।

कहें नयनानंद सुन यार ,
तू दे धिक्कार।
सकल संसार , अनित्य स्मरण।
अब लिया सिद्ध परमेष्ठि तुम्हारा शरण।।

अजि " मै " चेतन चिद्रूप …।।टेक।।

भावार्थ - यहाँ कविवर कहते है कि किस किस की कहानी कहूं…सब कुछ प्रत्यक्ष ही तो क्षणभंगुर दिखाई देता है। धन , यौवन , जीवन को जल के बुलबुले के समान देखते हुए भी लोग उन्हें नित्य मानते हैं , यह सब बलवान मोह की ही महिमा है।उसी के कारण हम वस्तु की ठीक ठीक स्थिति का अनुभव नही कर पाते।इन सबका मोह अत्यंत दुख देने वाला है तथा पत्थर की नाव के समान संसार समुद्र में डुबो देने वाला है।

इसलिए कविवर नयनानंद जी कहते है कि हे जीव ! तू इस सारे संसार को धिक्कार दे अर्थात् इस संसार के सब रिश्ते नाते और विषय भोगों का मोह छोड़ कर , सबको क्षणभंगुर जानकर अनित्य भावना का स्मरण कर और सिद्ध भगवान की शरण में आजा।तभी तुम्हें सच्चे सुख की प्राप्ति हो सकती है।

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