सुदृष्टि तरंगिणी — पं. टेकचंद जी (दैनिक स्वाध्याय)

ग्रंथ: सुदृष्टि तरंगिणी — रचयिता: पंडित टेकचंद जी

इस विषय में प्रतिदिन ग्रंथ के दो बिंदु क्रमशः प्रस्तुत किए जाएँगे।

आस्रव की पच्चीस क्रियाएँ

जिन-जिन भावों से जीव कर्म का आस्रव करता है, उन आस्रव की पच्चीस क्रियाओं का अब वर्णन करते हैं—

1. सम्यक्त्व की क्रिया — अठारह दोष रहित शुद्धदेव की पूजा, शुद्ध गुरु की पूजा, शुद्ध धर्म की पूजा, जिनबिम्ब की पूजा, सिद्धक्षेत्र की पूजा; धर्मात्मा पुरुषों के गुणों में अनुरागभाव, वात्सल्यभाव; दीन, दुःखी, रोगी, दरिद्री इत्यादि क्लेशवान जीवों को देखकर दयाभाव करना, समताभाव बढ़ाना इत्यादि समभावना सहित जीव शुभकर्म का आस्रव करते हैं। इनका नाम सम्यक्त्व क्रिया है। यह शुभ आस्रव है।

2. मिथ्यात्वप्रवर्द्धिनी क्रिया — कुदेव पूजा, कुगुरु पूजा, कुतीर्थ पूजा, हिंसा सहित कुतप को करने की भावना, अन्य के हिंसामयी तप की प्रशंसा, कुदान करने की अभिलाषा, कुव्रतों में काय की प्रवृत्ति, सभी के प्रति विनय; सुदेव-सुगुरु, कुदेव-कुगुरु को एक समान जानना इत्यादि भावों से अशुभ कर्म का आस्रव होता है। इनका नाम मिथ्यात्व प्रवर्द्धिनी क्रिया है। ये अशुभ कर्म को उत्पन्न करती हैं।

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3. असंयम प्रवर्द्धिनी क्रिया — मन में धन-धान्य की चाह रूप अनेक विकल्प करना, भोगोपभोग में अभिलाषा रूप रहना, इन्द्रियों को पुष्ट करने की वांछा इत्यादि असंयम के विकल्प रूप मन का वेग मन असंयम है।

पाँचों इन्द्रियाँ अपने विषयों को चाहती हैं। स्पर्शन इन्द्रिय अपने अष्ट विषयों में लुब्ध है, रसना इन्द्रिय षट् रस के भोग में लुब्ध है, घ्राणेन्द्रिय सुगंध इच्छुक है, नेत्र इन्द्रिय पंच वर्ण में लुब्ध है और श्रोत्र इन्द्रिय सुस्वर शब्द वादित्रों में लुब्ध है इत्यादि रूप इन्द्रिय असंयम है।

इन मन व इन्द्रिय का आत्मा के वश में नहीं रहना तथा त्रस-स्थावर रूप षट्कायों की दया नहीं पालना — इन बारह असंयम रूप भावों के विकल्प से जीव अशुभ कर्म का आस्रव करता है। इसका नाम असंयम प्रवर्द्धिनी क्रिया है।

4. प्रमादिनी क्रिया — कोई जीव पहले तो स्वयं तप के फल का वांछक होकर संयम, व्रत, प्रतिज्ञा को धारण कर तपस्वी नाम प्राप्त कर लेता है; परन्तु बाद में समय पाकर तप के कष्ट से भयभीत हो, जल की इच्छा, अन्न की इच्छा, स्त्री की इच्छा करता हुआ, शीत-उष्ण सहने में असमर्थ हो; तथा अन्य असंयमी जीवों को खाते, पीते, स्त्री संग करते, शीत-उष्ण में शरीर के प्रति अनेक यत्न करते हुए सुखी देखकर विचार करता है कि “मैं तो संयम से दुःखी हो रहा हूँ और ये असंयमी सुखी हैं, अच्छा खाते-पीते हैं।” — ऐसे भावपूर्वक स्वयं संयमी होने पर भी, बाद में प्रमाद-योग से पापोदय के कारण, असंयम को भला जानकर, संयम से विचलित होना चाहता है; यह प्रमादिनी नाम की क्रिया है। ऐसे भाव से अशुभ कर्म का आस्रव होता है।

5. ईर्यापथ क्रिया- इसके द्वारा दो प्रकार से आस्रव होता है। अंतरंग में समस्त जीवों पर दयाभाव रख कर, गमन करते समय नीचे दृष्टि कर देखते हुए मंदगति से चलनेवाले, मार्ग में दृष्टिगोचर होनेवाले छोटे-बड़े जीवों को बचानेवाले, दयाभाव सहित यत्नपूर्वक भूमि का शोधन करते हुए गमन करनेवाले जीव को ही पुण्य का आस्रव होता है। गमन करते समय ईर्या तजकर, प्रमाद से उतावलीपूर्वक चलनेवाले; मार्ग में अपने समान अनेक छोटी कायधारी पशु, चींटा-चींटी आदि आत्माओं की रक्षा से रहित, प्रमादपूर्वक गमन करनेवाले आत्मा को अशुभ कर्म का आस्रव होता है। इसका नाम ईर्यापथ क्रिया है।

6. प्रादोषिकी क्रिया – जब यह जीव धर्मभाव का त्याग कर क्रोध के वशीभूत हो, अनेक पाप करता है। क्रोध का उदय होने पर जीवघात करता है, दया का त्याग कर देता है। क्रोधी जीव देव, गुरु, माता आदि गुरुजनों की अविनय करता है; शस्त्र से अपने तन का घात करता है। क्रोधी अग्नि से ग्राम, वन घर जलाता है। क्रोधी नर पुत्र, स्त्री, भाई आदि का घात करता है। इत्यादि पाप क्रोधभाव से करता है; उससे वह क्रोधी भी अशुभ कर्मों का आस्रव करता है। इसका नाम प्रादोषिकी क्रिया है।

सुदृष्टि तरंगिणी — आस्रव की क्रियाएँ (7-8)

7. कायिक क्रिया- इस शरीर को पाकर जिसने चोरी की, जीवघात किया, परस्त्री सेवन किया, मद्य-माँस भक्षण किया; अपने कुल निन्द्य, अपने धर्म निन्द्य, भोजन-पान निन्द्यरूप क्रिया की; द्यूत (जुआ) खेला, युद्ध किया, अन्य जीवों को भयभीत किया इत्यादि इस शरीर से बहुत अपराध किए। उसके फल में शरीर की नाक छेदन कराई, (नाक छेदी गई), पैर काटे गए इत्यादि अंगोपांग के छेदन सहित रहा; तथापि परघात का उद्यम तो करता ही रहा। -इसप्रकार बहुत पाप, अकार्य कर, भाव बिगाड़ कर अशुभ कर्म का आस्रव किया। शरीर को धारण करके शुभ कर्म तो कभी नहीं किया, अपराध ही किए; यह कायिक क्रिया है।

8. अघकरणी क्रिया - हिंसा के उपकरण अत्यधिक प्रिय लगना; तीर, तलवार, तुपक, तोप, सेल, बरछी, कटारी, छुरी इत्यादि हिंसा के अचेतन उपकरण हैं; इनके प्रति अत्यधिक अनुराग रखना; उनका श्रृंगार करने के लिए विविध द्रव्य लगाकर, आभूषण कराना; चीता, बाज, श्वान, सिंह, सूकर, मार्जार, चोर, ऐंठ बतानेवाले, घर फोड़नेवाले, ठग, फाँसी देनेवाले इत्यादि हिंसा के चेतन उपकरण प्रिय लगना; उन्हें अच्छा भोजन देना, बहुमूल्य वस्त्र देना– इत्यादि हिंसा पाप में सहायक चेतन-अचेतन रूप उपकरणों को देखकर हर्षित होना; अशुभ आस्रव को करनेवाले भाव जानना; इसका नाम अघकारिणी क्रिया है।

9. परितापिनी क्रिया – अपनी इच्छापूर्वक, जानबूझकर/सोच-समझकर अन्य जीवों को पीड़ा पहुँचानेवाली क्रिया करना। जैसे मनोरंजन के लिए हस्ती का युद्ध कराना, मेढ़ों का युद्ध कराना; क्रूर जीव नाहर-सूकर की युद्ध क्रिया, सर्प-नेवले की युद्ध क्रिया, घोटक (घोड़ा) युद्ध, महिष (भैंसा) युद्ध, ऊँटयुद्ध, नरयुद्ध इत्यादि युद्ध क्रियायें अन्य जीवों से करानी। उनसे किसी के शिर फूटते हैं, किसी के पैर खण्डित होते हैं, इत्यादि रूप में अन्य जीवों को बलात्कार (जबरदस्ती) दुखी कर स्वयं हर्षित होना; यह अशुभ आस्रव को करनेवाली परितापिनी नामक क्रिया है। अपने मनोरंजन, हर्ष के लिए नदी, कूप, वावड़ी, सरोवर में कूदकर अनेक दीन जलचर जीवों का घात करना, उन्हें दुःखी करना। सोच-समझकर किसी को पैर, मुट्ठी, लाठी, शस्त्र मार कर दुःखी करना इत्यादि क्रियायें अशुभ कर्म का आस्रव करनेवाली परितापिनी क्रियायें हैं।

10. प्राणातिपाति क्रिया – अपने तन से अन्य जीवों के तन का नाश करना; जैसे शिकार करनेवाले की क्रिया, दयारहित हो अन्य जीवों का घात करनेवाले चाण्डालादि की क्रिया, अपने हाथ से अन्य जीवों का घात करनेवाले चोर व फाँसी देनेवाले की क्रिया इत्यादि अन्य जीवों का घात करनेवाली, समस्त क्रियायें पाप का आस्रव करनेवाली प्राणातिपाति क्रिया हैं।

11. दर्शन क्रिया– अन्य का अच्छा रूप देखने की इच्छा, किसी स्त्री-पुरुष का अच्छा रूप सुनकर उसे देखने की अभिलाषा होने रूप क्रिया, पुरुष को अनेक वस्त्राभूषण पहिनाकर स्त्री का रूप-आकार बनाकर देखने के परिणाम; किसी देव, देवी, मनुष्यनी (मनुष्य स्त्री) के रूप का वर्णन सुनकर उस या वैसे रूप को देखने के लिए चित्त का विह्वल होना; अनेक प्रकार से षट् रस भोगने की अभिलाषा; रसना (जीभ) को अच्छे लगनेवाले भोजन से सुखी तथा रसना को अरति उत्पन्न करनेवाले भोजन रस मिलने पर दुःखी होनेवाले भावों से जीव अशुभ कर्म का आस्रव करता है; इसका नाम दर्शन क्रिया है।

12. स्पर्शन क्रिया - अपने शरीर के स्पर्शन हेतु कोमल शय्या के लिए सचित्त फूल, कली को तोड़कर, उनसे शैया की रचना करना; उस पर शयन कर, लोटकर आनन्द मानना; पाप का भय नहीं रखते हुए, दया का विचार नहीं करते हुए, हिंसा का विवेक नहीं करते हुए, मात्र अपनी इन्द्रिय को पुष्ट करने के लिए क्रिया करना; योग्य-अयोग्य कुल का भी विचार नहीं करना; चाहे स्पर्श योग्य हो, चाहे नीच-स्पर्श योग्य नहीं हो; तथापि उसके सुन्दर, कोमल शरीर का स्पर्शन इन्द्रिय को भोगनेवाला स्पर्श करता है; नीच-उच्च का विचार नहीं करता है, यह स्पर्शन क्रिया है।

सुदृष्टि तरंगिणी — आस्रव की पच्चीस क्रियाएँ (13-14)

13. प्रात्ययिनी क्रिया – पाप करने में कारणभूत अनेकप्रकार के शस्त्र, तीर, गोली, छुरी, कटारी, तलवार, जाल, पींजरा, (पिंजड़ा), फाँसी, फंदा, चेप, कूप, तालाब इत्यादि हिंसा में कारणभूत शस्त्रों को अत्यंत चतुराई से बनाने की कलाओं को जानना। “मैं जैसे अद्भुत, उत्तम शस्त्र बनाता हूँ; वैसे दूसरा कोई अन्य नहीं बना पाता;" इत्यादि अपूर्व दुःख की कारणभूत, महा अशुभ कर्म का आस्रव करनेवाली शस्त्रादि बनाने की कला-चतुराई प्रात्ययिनी क्रिया है।

14. समन्तानुपातिनी क्रिया - गृहस्थ के मंदिर (घर) प्रसूति के स्थानों पर सदैव सराग क्रीड़ा होते रहने के कारण ये भोगी जीव के स्पर्श योग्य हैं, त्यागियों को रहने के लिए ये स्थान नहीं हैं। ये सराग स्थान त्यागियों के लिए योग्य नहीं, अयोग्य हैं, भय के कारण हैं; अतः यदि यति आदि संयमी इन गृहस्थों के घर आते हैं; तो मात्र भोजन के लिए महासावधानीपूर्वक, प्रमादरहित हो, वीतरागदशा सहित हो आते हैं। यदि कदाचित् संयमी अपने शरीर के मल, मूत्र, श्लेष्मादि प्रमाद के वशीभूत हो गृहस्थों के घर में छोड़ते हैं तो इन प्रमादभावों से वे अशुभ का आस्रव करते हैं; इसका नाम समन्तानुपातिनी क्रिया है।

15. अनाभोग क्रिया – बिना देखे पृथ्वी पर वस्तु को रखना, बिना देखे पृथ्वी पर से उठाना; यति कमण्डलु, पिच्छी, शरीर इत्यादि यदि शोधे बिना ही पृथ्वी पर रखते हैं; पिच्छी से परिमार्जन किए बिना ही रखते हैं तो अशुभ का आस्रव करते हैं। श्रावक भी यदि बिना देखे, प्रमादसहित अनेक वस्तुओं का रखना, उठाना करते हैं, तो वे अशुभ का आस्रव करते हैं; इसका नाम अनाभोग क्रिया है।

16. स्वहस्त क्रिया – दुराचारी, दुष्ट स्वभाव के धारक, महापापी अपने हाथों से ऐसे पाप का कार्य करते हैं कि जैसे निषिद्ध, खोटे कार्य अन्य कोई नहीं कर पाते; ऐसी काया का धारक महापाप का आस्रव करता है। वह ऐसा पापी है कि यदि इसके कहे अनुसार कोई पाप कार्य नहीं करता है अथवा पाप कार्य करने से डरता है, तो यह निर्दयी ऐसी प्रेरणा देते हुए कहता है कि “हे भाई ! यह पाप हमारे शिर पर है, तुम डरो मत, इस पाप कार्य को निःशंक होकर करो।” ऐसे भाव का धारक महापाप का आस्रव करता है; इसका नाम स्वहस्त क्रिया है।

17. निसर्ग क्रिया – जिस दुरात्मा को भले कार्य तो सिखाने पर भी नहीं आते हैं, शुभ कार्यों में मूढ़ता सहित है, भली बात बोलना भी नहीं आता है; परन्तु अनेक कुकार्य बिना सिखाये अपनी बुद्धि से ही उत्पन्न करता है, पाप कार्य करने की अनेक युक्तियाँ उत्पन्न होती हैं। स्वयं करता है, अन्य को भी कुकार्य करने का उपदेश देता है। ऐसा जीव अपने भाव से पाप कर्म का आस्रव करता है; इसका नाम निसर्ग क्रिया है।

18. विदारण क्रिया – जो जीव अपने अवगुण स्वयं लोगों में प्रगट कर कहता रहता है कि मैं बड़ा चोर हूँ, मेरे समान कोई दूसरा नहीं है; अनेक संकट में, महागूढ़ स्थान पर रखे हुए धन को भी मैं ला सकता हूँ। ऐसा भी कहता है कि मेरे समान जुआ खेलनेवाला कोई अन्य नहीं है। कहता है कि हम परस्त्री सेवन करनेवाले हैं। कहता है कि मैं बड़ा पाखण्डी हूँ, मेरे समान पाखण्डी कोई अन्य नहीं है; मैं बड़ा झूठा/असत्य भाषी हूँ, मैं बड़ा दगाबाज हूँ इत्यादि रूप में अपने मुख से अपने अवगुणों की प्रशंसा करता है। ऐसा जीव अपने भावों की वक्रता से अशुभ कर्म का आस्रव करता है; इसका नाम विदारण क्रिया है।

सुदृष्टि तरंगिणी — आस्रव की क्रियाएँ (19-20)

19. जिन-आज्ञा उल्लंघन क्रिया – विषय-कषायों में उद्यमी जो जीव पंचेन्द्रिय पोषण के लिए अनेक उद्यम करते हैं। यदि कदाचित् तन की शक्ति नहीं हो तो बुद्धिबल द्वारा मन से बड़े उपाय करता है; जैसे बने तैसे, विषय-पोषण कर सुख मानता है। जिनकी सेवा से पुत्र-धन होने की सम्भावना होने पर कुदेवों की, जिससे रसायन प्राप्ति की संभावना होने पर वैद्यादि कला के धारक की, जंत्र-मंत्र आदि चमत्कार बतानेवाले गुरु की सेवा करने में सावधान होता है; उनकी आज्ञानुसार कार्य करता है। जिन-भाषित धर्मसेवन में शिथिल; स्वर्ग-मोक्ष के दाता तप, व्रत, पूजा करने में प्रमादी, कायर ऐसा कहता है कि “मेरे शरीर में शक्ति नहीं है”। अशक्ति जानकर, आलस्यपूर्वक यदि शुद्ध धर्म की क्रिया करता भी है तो उन्हें अपनी इच्छानुसार करता है, जिन-आज्ञा के अनुसार नहीं करता है। ऐसे (क्रमभंग जीवन को) भावों का धारक अशुभ का आस्रव करता है; इसका नाम जिन-आज्ञा का उल्लंघन क्रिया है।

20. अनादर क्रिया – जो जीव शास्त्रोक्त तप, संयम, पूजा, दान, चारित्र, ध्यान, पाठ आदि धर्म क्रिया करते हुए भी उन सभी को अनादर सहित करता है; वह अभाग्यी, धर्मभावना रहित पापाचारी, आर्त-रौद्र के विकल्पों से परिपूर्ण हृदयवाला चोर-जुआड़ी का तो आदर करता है; अपने समान पापी, पाखण्डी, सप्त व्यसनी, चोरों के सहायकों का आदर करता है; महालोभी, परस्त्री का इच्छुक, धन के लोभ तथा परस्त्री को वश में करने के लिए महाआदरपूर्वक अनेक मंत्र-तंत्रों की साधना करता है, तप करता है, जप करता है; परन्तु कल्याणकारक धर्म क्रियायें अनादरभाव से करता है। ऐसी परिणति का धारक अशुभ कर्म का आस्रव करता है; इसका नाम अनादर क्रिया है।

21. आरम्भ क्रिया — अपनी शक्ति आरम्भ करने की नहीं होने पर, अन्य द्वारा किए गए पापारम्भ को देखकर हर्षित होना। जैसे किसी के मंदिर, गढ़, कोट, कूप, वावड़ी, सरोवर बनते देखकर; महाआरम्भ होता देखकर स्वयं उसकी अनुमोदना करना; अन्य के विवाह में बड़ा आरम्भ देखकर उसकी प्रशंसा करना इत्यादि भावों से अशुभ कर्म का आस्रव करता है; इसका नाम आरम्भ क्रिया है।

22. परग्राहणी क्रिया — लोभ के वशीभूत हो जो जीव योग्य-अयोग्य नहीं गिनता है; तीव्र लोभ के उदय से यह लेने योग्य है, यह लेने योग्य नहीं है– ऐसा भेद-विचार नहीं कर पाता है। अपने हाथ में आयी हुई समस्त परवस्तु को ले लेता है। धर्म के निमित्त आया हुआ देव-धर्म का माल तथा बहिन, पुत्री, भानजे इत्यादि का माल लौकिक निंद्य पर द्रव्य हैं, महालोभ सहित लोभी जीव धर्म-अर्थ के द्रव्य को भी विषय में लगाता है। लोभी के हाथ में बहिन, भानजे इत्यादि का धन आने पर भी वह उसे छोड़ता नहीं है। - ऐसे पर के माल के ग्रहण रूप भावों का धारक अशुभ कर्म का आस्रव करता है। इसका नाम परग्राहणी क्रिया है।

21. आरम्भ क्रिया — अपनी शक्ति आरम्भ करने की नहीं होने पर, अन्य द्वारा किए गए पापारम्भ को देखकर हर्षित होना। जैसे किसी के मंदिर, गढ़, कोट, कूप, वावड़ी, सरोवर बनते देखकर; महाआरम्भ होता देखकर स्वयं उसकी अनुमोदना करना; अन्य के विवाह में बड़ा आरम्भ देखकर उसकी प्रशंसा करना इत्यादि भावों से अशुभ कर्म का आस्रव करता है; इसका नाम आरम्भ क्रिया है।

22. परग्राहणी क्रिया — लोभ के वशीभूत हो जो जीव योग्य-अयोग्य नहीं गिनता है; तीव्र लोभ के उदय से यह लेने योग्य है, यह लेने योग्य नहीं है– ऐसा भेद-विचार नहीं कर पाता है। अपने हाथ में आयी हुई समस्त परवस्तु को ले लेता है। धर्म के निमित्त आया हुआ देव-धर्म का माल तथा बहिन, पुत्री, भानजे इत्यादि का माल लौकिक निंद्य पर द्रव्य हैं, महालोभ सहित लोभी जीव धर्म-अर्थ के द्रव्य को भी विषय में लगाता है। लोभी के हाथ में बहिन, भानजे इत्यादि का धन आने पर भी वह उसे छोड़ता नहीं है। - ऐसे पर के माल के ग्रहण रूप भावों का धारक अशुभ कर्म का आस्रव करता है। इसका नाम परग्राहणी क्रिया है।

23. मायाक्रिया - जो जीव अन्य जीवों को ठगने में महाचतुर है; अनेक युक्ति देकर, अनेक विद्याओं द्वारा पराया धन हरण करता है; अनेक कलाओं द्वारा अपने विषय-कषाय का पोषण करता है; इत्यादि पाप कार्यों में तो प्रवीण है; परन्तु जिन भाषित धर्म की शुद्ध क्रियाओं में मूर्ख के समान भोला है। जिन-पूजन कैसे करें ? कैसे पढ़े ? यह भी नहीं जानता है। भगवान की स्तुति करना नहीं जानता, प्रभु का दर्शन करना नहीं जानता। जिनके प्रति दया करने से महापुण्य होता है, उन षट्कायिक जीवों के नाम-भेद नहीं जानता है। संसार-भ्रमण के स्थानभूत चार गतियों का स्वरूप नहीं जानता है। स्वयं जीव होने पर भी अपने जीवत्वभाव को नहीं जानता है—इत्यादि कल्याणकारी धर्मसंबंधी बातों, क्रियाओं को नहीं जानता है। पाप में चतुर, धर्म में मूढ़ रूप इन भावों का धारक पाप का आस्रव कर पर-भव बिगाड़ लेता है; इसका नाम मायाक्रिया है।

24. मिथ्यादर्शन क्रिया - जो जीव स्वयं मिथ्यात्व रूप क्रिया करते हैं तथा अन्य को भी उसी का उपदेश देते हैं। जैसे धन का लोभी स्वयं तो मान बड़ाई के लिए मिथ्या देव-गुरु की सेवा करते हैं। मुझे धन दो; मुझे पुत्र, हाथी, घोड़े दो इत्यादि वस्तुओं के लोभवश मिथ्यामार्ग का सेवन करते हैं तथा अन्य भोले अज्ञानी जीवों को उपदेश देकर कुदेवादि के अतिशय को कहते हैं कि ये देव प्रत्यक्ष वांछित देते हैं। हमने इनकी सेवा की थी, जिससे इन्होंने हमें यह वांछित वस्तु देकर हमारी वांछा पूर्ण की है, इत्यादि अतिशय जानकर कुदेवादि का स्वयं सेवन करना, अन्य को उपदेश देना-इन भावों से यह जीव संसार में दुःख देनेवाले पापकर्म का आस्रव करता है; इसका नाम मिथ्यादर्शन क्रिया है।

25. अप्रत्याख्यान क्रिया - जो जीव अज्ञानता के वशीभूत हो, परिणामों की क्रूरता से सभी पाप कार्य करते हैं, किसी भी पाप का त्याग नहीं करते हैं। उनमें से कुछ मूर्ख तो ऐसा कहते हैं कि हम तो भोले हैं, हमें पाप नहीं लगता है; जो समझते हैं, उन्हें पाप लगता है। हम तो कुछ समझते नहीं हैं कि पाप क्या है ? और पुण्य क्या है ?

कुछ जीव ऐसा कहते हैं कि 'पाप-पुण्य तो हैं ही नहीं; अतः भयभीत क्यों होना ? निःशंक होकर सुखों का भोग करना। कुछ जीव ऐसा कहते हैं कि जब मरेंगे, तब देख लेंगे। अभी तो अपनी इच्छानुसार करते रहना, मरते समय धर्म कर लेंगे।

कोई कहते हैं कि तुम चाहे जो कहो !; परन्तु पाप हो तो उसका फल हमें लगेगा। नरक हो तो इन क्रियाओं से हमें होगा ? हे भाई ! यहाँ ही मनोवांछित नहीं मिलना नरक है तथा यहाँ ही सुख मिलना स्वर्ग है; अतः सुख से रहो। वर्तमान में विद्यमान सुख का त्याग क्यों करते हो ?

इत्यादि प्रकार से स्वेच्छाचारी हो समस्त पाप करते रहते हैं, योग्य-अयोग्य का कुछ विचार नहीं करते हैं, किसी पाप का त्याग नहीं करते हैं। - ऐसे भावों के धारक अशुभ आस्रव करते हैं; इसका नाम अप्रत्याख्यान क्रिया है।

इसप्रकार आस्रव की कारणभूत पच्चीस क्रियाओं का वर्णन हुआ।


शंका 1: हे गुरुदेवजी ! यह जीव अंधा किस पाप से होता है ?

समाधानः गुरुजी कहते हैं कि जिन जीवों ने अन्य भव में अन्य जीवों के नेत्रों को दुःख दिया हो, अन्य के नेत्र फोड़े हों, अन्य की आँख दुखती हुई देखकर जो सुखी हुआ हो, अन्य को अंधा हुआ जानकर अनुमोदना की हो, अंधे जीवों की हँसी करके उन्हें चिढ़ाया हो, अंधों के धन-वस्त्र आदि छल-बल से हरण किए हों इत्यादि पापों से जीव अंधा होता है। नेत्ररहित तीनेन्द्रिय आदि अथवा अंधे जीव रूप में उत्पन्न होता है।