मंगलाचरण मंगलमय शुद्धातम जब तक न होवे प्राप्त

मंगलमय शुद्धातम, जब तक न होवे प्राप्त।
पंच प्रभु ही शरणभूत हैं मंत्र जपो नवकार।।
निश्चय से आतम ही सार जिसमें तन्मय सिद्ध समाज।
वैभव जो दिखता अरहंतों, भिन्न है उससे शुद्धातम सार।।
मुनिराजों के रहता उस चेतन का ही ध्यान।।1।।
पंच प्रभु ही शरण भूत हैं…
शरण तुम्हें प्रभु तुमको माना जो तुमने माना ना माना
जिन मंदिर के नाथ बताएं तन मंदिर का देव सहारा ।।
अप्पा सो परमप्पा का गाते जो गान।।2।।
पंच प्रभु ही शरण भूत हैं…