प्राचीन जिन मंदिरों सम्बंधित प्रश्न

दक्षिण भारत में बहुत सारे प्राचीन तीर्थ स्थल है। मुख्यतः कर्नाटक में। मूडबिद्री धर्मस्थल कारकल कुंदाद्रि आदि। ये सैकड़ो साल प्राचीन है, संभवतः १००० से भी ज़्यादा साल पुराने। इन्हें देखकर तो यही प्रतीत होता है कि ये मूल रूप से तेरापंथ मंदिर है जो समय बीतते बीतते बीसपंथ हो गये है।

इन्हें दर्शन करने की इच्छा होती है लेकिन प्रतिमाओं पर फूल आदि देखकर नहीं करते है। कुछ लोग कहते है कि पुजारियों से फूल हटवाकर दर्शन कर लें तो कोई दोष नहीं है लेकिन यह सही नहीं मालूम पड़ता है।

यह प्रश्न मात्र उन प्राचीन जिन मंदिरों संबंधित किया है जहां उनकी प्राचीनता के कारण उनके दर्शन करने हेतु राग आता है लेकिन जिन मर्यादा की सीमा का उल्लंघन भी किसी रूप में नहीं करना है।

कृपया प्रकाश डालें।

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@Sayyam Ji, @Kishan_Shah Ji, @Sanyam_Shastri Ji, @panna Ji - please share your thoughts/insights. Obviously, if there are references from Agam, that’ll be utmost helpful. :pray:

यह कैसे मालूम हो?

क्यों?

आपकी उलझन समझती हूं किन्तु मैं मात्र अपने विचार ही लिख सकती हूं जो मुजे समाधान देतें है।

प्राचीन प्रतिमाओं के दर्शन भी न कर पाऊं यह मेरा अंतराय है जो मेरे पूर्व के विराधना भाव को ही दर्शाते हैं। जैसे बहनश्री कहते है कि पंचमकाल में कोई आराधक जीव तो आते नहीं, विराधना का ही फल है जो पंचमकाल में जन्म हुआ है। यह पंचमकाल की परिस्थितियों को देख देख अधिक सावधान बनती हूँ कि कई धर्म विराधना न हो जाए।

स्पष्ट logical सत्य बात भी मनुष्यों को न समझे और बदलाव न करें यह इसकाल की पहचान है। बस प्रयास यह है कि सातिशय पुण्य द्वारा ज्ञानियोंकी कृपा से प्राप्त सत्य धर्म में दृढ़ रह पाँउ। कालसे प्रभावित न हो जाउ।

इन प्रतिमाओं के पूजन की विधियों को और उस तरह पूजन विधि करते लोगों की संख्या को देख देख लगता है कि कैसा दुर्लभ सुदेव-गुरु-धर्म-तत्त्व का ज्ञान ज्ञानियों की असीम करुणा से मुजे प्राप्त हुआ है, तो उस सत्य धर्म समझने में मेरा कोई प्रमाद व संकोच न रहे, सत्य धर्म को प्राप्त जीवों के स्वीकार और अनुमोदना में कोई संकोच न रहें। किसी पक्ष से जुड़े रहने के लोभ या भय से सत्य के पक्ष में मौन या उससे दूर न रहूं। क्योंकि यह मेरे area of influence में है। प्रतिमाओं की लोक में सत्य विधि से वंदन हो यह मेरे area of influence में नहीं। जो मेरे बस में है उसमें कभी प्रमाद आदि मुजसे न हो ऐसी भावना भाती हूँ।

उन मंदिरों और प्रतिमाओं के प्रति वंदनीय व्यवहार तो नहीं कर सकती किन्तु जिनदेव के सत्य स्वरूप का चिंतन कर दृढ़ता जरूर बढ़ जाती है।

राग? अरे ऐसी भावना तो जरूर होती है बल्कि जिनदेव प्ररूपित धर्म जैसे जैसे अधिक समझता है वैसे वैसे उनके प्रति की दर्शन वंदन पूजन महिमा की भावना और अधिक बढ़ती है। और तब तत्त्व समझ ही समाधान भी देता है। आज जितना दुर्लभ इन प्रतिमाओं के दर्शन वंदन है, उससे भी अधिक दुर्लभ ऐसी तत्त्व की स्पष्टता मुजे प्राप्त हुई है। इसलिए अब बाह्य जिनवन्दन के अंतराय के विचार में न अटक कर धर्म परिणति कर अंतर जिनदर्शन को पाँउ। वहाँ मेरा पुरुषार्थ कार्यकारी जरूर होगा।

इसतरह प्रतिमा के वंदन न मिलने के खेद भाव से दूर होकर निजस्वरूप दर्शन के पुरुषार्थ की और भावना बढ़ती है। वही सुंदर समाधान मुजे लगता है।

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मूर्तियाँ देखकर लगता है। नासा-दृष्टि, वीतराग मुद्रा आदि। मूल वेदी पर और कुछ भी विराजमान नहीं है, लेकिन आस-पास बाक़ी देवी-देवता की मूर्तियाँ लगा दे गई है। दक्षिण में काफ़ी मूर्तियों की आँख पूर्ण खुली या बंद भी दिखती है, इसलिए इन मंदिरों की समय होने पर ही विकृतियाँ हुई है ऐसा भासित होता है।

जय जिनेन्द्र भैया,
आपका प्रश्न अत्यन्त उचित और (अंतरीक्ष शिरपुर की घटना के पश्चात) शत-प्रतिशत प्रासंगिक है, यह समस्या अभी तो बहुत छोटी और सीमित है, निश्चित ही आगे हर जगह आने वाली भी होगी, तो इससे बचने का उपाय क्या हो सकता है, अपनी बुद्धि अनुसार देता हूँ।

  1. प्रथम तो संभवतः इसके सन्दर्भ में आगम में मिलना सरल नहीं है, क्योंकि ये समस्या हालहिं में उत्पन्न हुई है और पुरातन ग्रन्थों में इसके समाधान मिलना शायद ही संभव हो, परन्तु फिर भी हम अपने विवेक के प्रयोग से अपनी श्रद्धा और षट आवश्यक कर्तव्यों को सुरक्षित रखने का भरपूर यत्न तो कर ही सकते हैं।

  2. दक्षिण भारत प्रारंभ से ही प्राचीनता में अग्रणीय रहा है, इसमें कोई संदेह नही, परन्तु वर्तमान में विकृतियों में भी सबसे आगे उसे कहा जा सकता है, फिर भी हम यदि वहाँ के दर्शन-पूजन एवं यात्रा हेतु जाते हैं तो इसमें हमारा तो कोई दोष नही। हम वहाँ घटित इतिहास और जैनधर्म की प्राचीनता एवं उसके गौरव से प्रभावित होकर पहुँचे हैं।

  3. रही बात वहाँ के मन्दिरों में चढे शृंगारिक वस्तुओं को हटवाकर दर्शन करने की, तो उसमें भी एक संभावना है, कि यदि पुजारी फूल इत्यादि हटाने से इंकार करेगा तो क्या दर्शन ना करें?

  4. सीधा सच्चा प्रयोग, जो मैं स्वयं भी पालता हूँ कि यदि फूल, चन्दन इत्यादि हट जायें तो अति उत्तम और यदि ना हटें तो मात्र वीतरागी मुख मुद्रा (क्योंकि मुख पर लेपादिक नही किया जाता) देखकर दर्शन करके बाहर आ जायें।

जिनाज्ञा के उल्लंघन का दोष इसमें तो मुझे प्रतीत नहीं होता यदि जिनदर्शन होने की संभावना ऐसे है तो!..

तथापि जितनी हो सके उतनी सावधानी तो होनी चाहिये।

धन्यवाद (बाकी विद्वज्जन ज्यादा जानते हैं)

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कृपया प्रश्न के उत्तर हेतु इसका भी अध्ययन करें।

केशर पुष्प विधान - प. जौहरीलाल जी द्वारा लिखित

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