अक्षय तृतीया : एक ऐतिहासिक पर्व

अक्षय तृतीया पर्व है मंगलमय अविकार
ऋषभदेव मुनिराज का हुआ प्रथम आहार।

अक्षय तृतीया,
एक ऐतिहासिक और पर्व।
यह कथा है उस समय की जब भारत मे भरत चक्रवर्ती का शासन हुआ करता था और राजा ऋषभदेव, जो कि जैन धर्म के इस काल के प्रथम तीर्थकंर थे, नीलांजना का नृत्य देखते हुए वैराग्य हो गया और तभी समस्त राज-पाठ त्याग कर वन में आत्माराधना करने के उद्देश्य से जिन मुनि दीक्षा अंगीकार कर चुके थे, दीक्षा लेकर वन को चले गए थे। उनके साथ 4000 राजाओं ने भी दीक्षा अंगीकार की। एक बार जो मुद्रा मुनि ऋषभदेव ने धारण की तो सर्दी-गर्मी-भूख-प्यास सबको जीतकर, इंद्रियों का दमन कर तपस्या में बैठ गए, उन्हें शरीर से मोह ना था, तो शरीर पर होने वाले प्रकृति के प्रहारों का कोई असर भी नही हुआ, ऐसा एक नही, दो नही, अपितु 6 माह तक निरन्तर चलता रहा, और छह महीने बाद जब मुनि ऋषभदेव अपने ध्यान को रोकतें हैं तब ऐसा विचार करते हैं, कि इस काल मे किसी को दान(आहार दान) देने की विधि का बोध ही नही है, अतः असि मसि कृषि शिल्प कला वाणिज्य की शिक्षा के पश्चात दान तीर्थ की स्थापना का कार्य होना चाहिए ऐसा विचारकर यह कार्य अपने माथे पर ग्रहण कर नगर में आहार हेतु प्रवेश करते हैं।

आहार मुद्रा धारण कर नगर में प्रवेश करतें हैं और नगर वासी आनन्द से भर उठते हैं। कोई कहता है कि आज हमारे भाग्य जाग उठें हैं , नगर में तीर्थंकर मुनिराज का प्रवेश हुआ है।

लोगो के आनन्द का कोई पार ना था, क्योंकि छह महीने बाद तीर्थंकर मुनिराज के दर्शन का सौभाग्य जो प्राप्त हुआ , नगर में ढिंढोरा पिट गया सभी लोग अपने-अपने घरों के बाहर खड़े हो गए और सभी भगवान को भोजन के लिए आमंत्रित करने लगे।
लेकिन ये सही विधि थोड़े ही थी। कोई कहता है कि मेरे घर में आइए अनेकानेक पकवान आपका इंतज़ार कर रहें हैं ,कोई कहता है कि आप नग्न क्यों हैं? वस्त्र धारण कीजिये। कोई अपनी संपत्ति देने के लिए उत्सुक था यहां तक की नगर के सेठजी अपनी बेटी के साथ खड़ें हैं और मुनि भगवान से कहतें हैं कि आप मेरी पुत्री से विवाह कर लीजिए और इस सारी संपत्ति को भोगिये।

अब इन्हें क्या मालूम कि जिनकी सेवा स्वयं इंद्र किया करता हो ऐसे-ऐसे भोगों को त्यागकर वे मुनि हुए है, उन्हें विषय भोगों की दरकार नही है। लेकिन प्रजा को आहार विधि का ज्ञान ना था और इसी तरह छह महीने औए व्यतीत हो गए और दान तीर्थ की स्थापना का कार्य पूर्ण न हुआ।
उस समय हस्तिनापुर नगर के राजा सोमप्रभ हुआ करते थे, वे बड़े ही विवेकी और ज्ञानी राजा थे, इनका एक छोटा भाई भी था, जिनका नाम था श्रेयांस कुमार। जो विनय आदि अतिशय गुणों को धारण करते थे।
जब मुनि ऋषभदेव हस्तिनापुर नगर के समीप ही होते हैं तब रात्रि में श्रेयांस कुमार स्वप्न में सात मंगल स्वप्न देखतें हैं।
वे देखतें हैं सुमेरु पर्वत, कल्पवृक्ष, सिंह, बैल, सूर्य-चन्द्रमा, समुद्र और भूत जाती के व्यन्तर देवों की मूर्तियां। सुबह होते ही कुमार श्रेयांस इन स्वप्नों को राजा सोमप्रभ और पुरोहित जी को बताते हैं और उन्हें ज्ञात होता है कि इन स्वप्नों को अर्थ है कि अब उनके अतिशय पुण्य के उदय से उन्हें तीर्थंकर परमात्मा के दर्शन का अतिशीघ्र ही लाभ होने वाला है। दोनों भाई स्वप्न की चर्चा करते हुए बैठे ही थे कि इतने में नगर में मुनिराज ऋषभदेव का मंगल आगमन हो जाता है।

उनके आगमन के साथ ही नगर में कोलाहल मच जाता है, सभी जन आश्चर्य और आनन्द से भर उठते हैं, और हस्तिनापुर अब मुनि-भगवान ऋषभदेव की जय-जयकार से गूंज उठता है। और सम्पूर्ण नगर में विहार करते हुए भगवान ऋषभदेव राज-मंदिर में प्रवेश करते हैं।

राजा सोमप्रभ एवं कुमार श्रेयांस को मुनिराज के आगमन का समाचार प्राप्त होता है और वे अतिशीघ्र भगवान के सम्मुख खड़े हो जाते हैं। ये थी वह घड़ी जब मुनिराज ऋषभदेव अपना प्रथम पारणा ग्रहण करते हैं। दोनों भाई प्रथम ही भगवान के चरणों का प्रक्षालन करतें हैं और आहार के पूर्व की विधियों को पूर्ण करते हुए असीम आनन्द को प्राप्त करते हैं।

भगवान का रूप देखते ही श्रेयांस कुमार को जातिस्मरण हो जाता है, जिससे उन्होंने अपने पूर्व पर्याय-सम्बन्धी संस्कारों से भगवान को आहार देने की बुद्धि की।

पूर्व भव में जब ऋषभदेव वज्रजंघ की पर्याय में थे तब विदेह क्षेत्र की पुण्डरीकिनी नगरी में कुमार श्रेयांस उनकी प्रिय पत्नी श्रीमती के रूप में हुआ करते थे। उस समय दो चारण ऋद्धिधारी मुनिराजों को इस युगल ने आहार दान दिया था।

आहार के पूर्व की विधि सम्पन्न कर कुमार श्रेयांस और राजा सोमप्रभ इक्षु रस का आहार कराकर दान तीर्थ का प्रवर्तन करतें हैं।

उसी समय आकाश से पुष्प(रत्न) वर्षा होने लगती है, सम्पूर्ण पृथ्वी भगवान कि जय-जयकार से गूंज उठती है और धन्य है यह जीव, धन्य है यह पात्र, ऐसा नाद सुनाई देने लगता है। सुगन्धित वायु बहने लगती है, सम्पूर्ण नगर स्वयमेव वृद्धि को प्राप्त करता है, आकाश से देवादि मुनिराज एवं राजा की भक्ति करतें हैं।

और इस तरह मुनि ऋषभदेव का प्रथम पारणा राजा सोमप्रभ तथा श्रेयांस के द्वारा वैशाख शुक्ल तृतीया को हुआ जिसे हम अक्षय तृतीया के नाम से भी जानते हैं।

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आधार:- हरिवंश पुराण।
संकलन- @Sanyam_Shastri :blush:

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